दीपावली के त्योहार के दौरान जहां आम तौर पर लोग अपने लिए नए वस्त्र, सोने-चांदी के जेवर और घर की सजावट की चीजें खरीदते हैं, वहीं राजस्थान के करौली जिले में एक बिल्कुल अलग सांस्कृतिक परंपरा देखने को मिलती है। यहां के प्रसिद्ध सर्राफा बाजार में मवेशियों के श्रृंगार के लिए खास दुकानें लगाई जाती हैं। इस बाजार में इंसान नहीं, बल्कि गाय, भैंस और बैलों को सजाने के लिए पारंपरिक आभूषणों की व्यापक बिक्री होती है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े किसान और पशुपालक दूर-दूर से अपने पशुओं को संवारने के लिए इन दुकानों पर खरीदारी करने पहुंचते हैं।
साल में केवल सात दिनों के लिए सजती हैं दुकानें
करौली के सर्राफा बाजार में यह रौनक पूरे बारह महीने नहीं रहती। यह विशेष बाजार केवल दीपावली के उत्सव के दौरान महज सात दिनों की अवधि के लिए ही संचालित होता है। ग्रामीण इलाकों में जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए मवेशी केवल दूध उत्पादन या खेतों में हल जोतने का जरिया भर नहीं हैं, बल्कि वे उनकी आजीविका और आर्थिक मजबूती की मुख्य धुरी माने जाते हैं। खेती और दैनिक जीवन में पशुधन के इस अमूल्य योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किसान दीपावली का चयन करते हैं। ग्रामीण परंपरा के अनुसार, लक्ष्मी पूजन संपन्न होने के बाद पशुपालक अपने मवेशियों को साफ पानी से नहलाते हैं, उनका विधि-विधान से पूजन करते हैं और फिर नए आभूषण पहनाकर उनका सुंदर श्रृंगार करते हैं। किसानों की यह दृढ़ मान्यता है कि यदि घर का पशुधन स्वस्थ और प्रसन्न रहेगा, तो पूरे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास बना रहेगा।
मालाओं, घंटियों और घुंघरुओं की विस्तृत श्रृंखला
जिस प्रकार महिलाओं के सौंदर्य को निखारने के लिए बाजार में तरह-तरह के हार, कंगन, झुमके और पायल उपलब्ध होते हैं, ठीक उसी तर्ज पर इस बाजार में पशुओं के लिए भी पारंपरिक आभूषणों की विस्तृत किस्में तैयार की जाती हैं। मवेशियों के श्रृंगार के लिए दुकानों पर गले में बांधी जाने वाली रंग-बिरंगी मालाएं, पीतल व लोहे की घंटियां, खनकते घुंघरू और माथे पर सजाए जाने वाले कई पारंपरिक सजावटी उत्पाद सजाए गए हैं। पशुपालक अपने जानवरों की बनावट, व्यक्तिगत पसंद और अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार इन वस्तुओं का चयन करते हैं।
दस रुपये से लेकर हजारों रुपये तक के विकल्प
पशुओं के इन आभूषणों का मूल्य उनकी सामग्री, नक्काशी और कारीगरी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। साधारण सजावटी वस्तुएं बेहद मामूली दरों पर मिल जाती हैं, जबकि खास कारीगरी और नक्काशी वाले जटिल आभूषणों का दाम काफी ऊपर तक जाता है। स्थानीय व्यापारी पंकज गुप्ता के अनुसार, दीपावली के इस सात दिवसीय बाजार में मवेशियों के जेवर 10 रुपये से शुरू होकर हजार रुपये और उससे भी अधिक तक की कीमत में बिकते हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से बाजार में आने वाले किसान प्रायः एक से अधिक गहने पसंद करते हैं, ताकि वे अपने पूरे पशुधन का भव्य श्रृंगार कर सकें।


















