राजस्थान के भरतपुर जिले के देहाती इलाकों में सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत आज भी अपनी पूरी चमक बिखेर रही है। आधुनिक चकाचौंध के बीच ग्रामीण अंचलों में टेसू और झांझी का खेल बेहद उत्साह के साथ खेला जा रहा है। जैसे ही सूरज ढलता है, गांवों की पगडंडियों और गलियों में नन्हे-मुन्ने बच्चों की टोलियां निकल पड़ती हैं। हाथों में सजे-धजे टेसू और झांझी लिए ये बच्चे हर चौखट पर दस्तक देते हैं, मधुर आवाज में पारंपरिक लोकगीत गुनगुनाते हैं और ग्रामीणों से उपहार व दान मांगते हैं। गांव के परिवार भी इन बाल टोलियों का खुले दिल से स्वागत करते हैं और अपनी हैसियत के हिसाब से बाजरा, अनाज या नकदी देकर उन्हें विदा करते हैं।
महाभारत काल और वीर बर्बरीक के बलिदान से जुड़ा इतिहास
क्षेत्रीय मान्यताओं और लोक परंपराओं के जानकारों का कहना है कि टेसू और झांझी का यह रिवाज द्वापर युग यानी महाभारत काल की गाथा से सीधे जुड़ा है। लोक संस्कृति में टेसू को महाभारत के अजेय योद्धा वीर बर्बरीक के प्रतीक रूप में पूजा और माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के मुताबिक, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उतरने से पहले बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण से यह संकल्प व्यक्त किया था कि वे संग्राम में हमेशा कमजोर और पराजित हो रहे पक्ष की ढाल बनेंगे। भगवान श्रीकृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि इस प्रतिज्ञा से युद्ध की दिशा और परिणाम पूरी तरह उलट सकते हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा ली और अंततः उनसे दान में उनका शीश मांग लिया। बर्बरीक के इसी अप्रतिम त्याग और वचनबद्धता की स्मृति में आज भी ग्रामीण इलाकों में टेसू की परंपरा गहरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
शाम ढलते ही गूंजते हैं लोकगीत, घरों पर उमड़ता है उल्लास
टेसू के साथ झांझी का चलन भी ग्रामीण परिवेश के बच्चों में गहरा आकर्षण रखता है। दिन ढलते ही बच्चे झुंड बनाकर टोलियों के रूप में पूरे गांव का चक्कर लगाते हैं। जब ये बच्चे किसी ग्रामीण के आंगन अथवा द्वार पर पहुंचते हैं, तो उनके लोकगीतों की तान से पूरा परिवेश जीवंत हो उठता है। दरवाजे पर बच्चे टेसू और झांझी का पारंपरिक खेल प्रस्तुत करते हैं। गांव के बुजुर्ग और महिलाएं पीढ़ियों पुरानी इस परंपरा का आदर करते हुए बच्चों की हौसलाअफजाई करते हैं। उन्हें खाने-पीने की स्वादिष्ट वस्तुएं, नया अनाज अथवा पैसे भेंट किए जाते हैं। यह नजारा केवल एक रस्म भर नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में गहरे आपसी जुड़ाव, सौहार्द और परस्पर अपनत्व को भी उजागर करता है।
हाथ की कारीगरी से बाजार तक, रेडीमेड स्वरूप में भी कायम है आकर्षण
बदलते जमाने का असर इस लोक परंपरा की बनावट पर भी साफ नजर आने लगा है। पूर्व में ग्रामीण अथवा स्वयं बच्चे बांस की तीलियों, रंगीन कागजों और चिकनी मिट्टी की मदद से घरों में ही टेसू तैयार किया करते थे। हालांकि अब बाजारों में तरह-तरह के रेडीमेड और चटक रंगों वाले टेसू आसानी से मिलने लगे हैं। इस तरह के बदलावों के बावजूद राहत की बात यह है कि नई पीढ़ी अपनी इस समृद्ध विरासत से कटी नहीं है। भरतपुर और ब्रजंचल के गांवों में बच्चे आज भी इस प्राचीन प्रथा को पूरी निष्ठा से संजोए हुए हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह परंपरा केवल बच्चों का खिलौना नहीं, बल्कि समूचे अंचल की लोक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता का जीता-जागता प्रमाण है।



















