राजस्थान के सीकर में खाटूश्यामजी के समीप स्थित कैलाश गांव इन दिनों प्राचीन भारतीय परंपरा और स्वास्थ्य पद्धतियों का वैश्विक केंद्र बना हुआ है। गांव के श्री देवपुरी जी आश्रम में पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शांति एवं आयुर्वेद भारतीय वैदिक संस्कृति सम्मेलन चल रहा है, जहां भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा जापान, रूस और नेपाल समेत कई राष्ट्रों के प्रतिभागी डेरा डाले हुए हैं। इस आयोजन में विभिन्न देशों के विद्वान, चिकित्सक, शोधकर्ता, छात्र और युवा वर्ग पारंपरिक भारतीय जीवन शैली को गहराई से समझने के लिए एक मंच पर एकत्र हुए हैं।
वैश्विक स्तर पर पहुंचा भारतीय ज्ञान परंपरा का संदेश
इस पांच दिवसीय समागम के तहत 2 अक्टूबर को भारतीय वैदिक संस्कृति और आयुर्वेद पर केंद्रित एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि इसका सीधा प्रसारण लगभग 21 देशों में एक साथ किया गया। इस विस्तृत विमर्श में योग, आयुर्वेद, संतुलित जीवनशैली और वैश्विक शांति से जुड़े अनेक आयामों पर गहराई से चर्चा हुई। सम्मेलन की मूल सोच यही है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के सदियों पुराने सूत्रों को समकालीन परिवेश में नई पीढ़ी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक प्रभावी तरीके से संप्रेषित किया जाए।
व्यक्तिगत शांति से ही संभव है विश्व शांति
सम्मेलन के दौरान महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी महाराज ने 2 अक्टूबर के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का स्मरण कराया। योग एवं आयुर्वेद को आंतरिक शांति का मुख्य माध्यम बताते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति के भीतर शांति की भावना जाग्रत नहीं होगी, तब तक पूरे समाज और दुनिया में शांतिपूर्ण वातावरण की रचना नहीं की जा सकती। उन्होंने आयुर्वेद तथा वैदिक दर्शन को मात्र चिकित्सा पद्धति न मानकर समग्र जीवन जीने की एक सुदृढ़ परंपरा के रूप में व्याख्यायित किया और कहा कि विभिन्न महाद्वीपों से आए प्रतिनिधि इस संस्कृति के मूल मर्म को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर रहे हैं।
नई पीढ़ी को पारंपरिक आदतों से जोड़ने का प्रयास
कार्यक्रम के समन्वयक और श्री माधवानंद वर्ल्ड पीस काउंसिल के राजदूत कपिल अग्रवाल ने मौजूदा दौर की युवा पीढ़ी यानी Gen-Z को आध्यात्मिकता, योग और वैदिक मूल्यों से परिचित कराने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में ऐसी अनेक वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पद्धतियां मौजूद थीं जो कभी आम दिनचर्या का सहज हिस्सा हुआ करती थीं, मगर आधुनिक आपाधापी के चलते वे आदतें पीछे छूट गईं। इस सम्मेलन का प्रमुख लक्ष्य उन्हीं भूली-बिसरी जीवन रीतियों को नए और समकालीन अंदाज में आज के युवाओं तक पहुंचाना है।
संस्कृत की जटिलता से निकालकर सरल भाषा में आयुर्वेद
डॉ. सुजाता चौधरी के अनुसार, 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर तक चलने वाले इस शिविर में युवाओं को आयुर्वेदिक नियमों के अनुसार आहार, नित्य क्रिया और स्वस्थ दिनचर्या के व्यावहारिक सूत्र सिखाए जा रहे हैं। उन्होंने यह महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि आयुर्वेद का एक विशाल ज्ञान भंडार लंबे समय तक संस्कृत भाषा तक सीमित रहा, जिसके कारण यह आम जनमानस की दैनिक गतिविधियों से कटता चला गया। अब इस प्राचीन चिकित्सा दर्शन को सहज और सुबोध रूप में युवा वर्ग तक ले जाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।
पारंपरिक दातून, देसी खानपान और विदेशी प्रतिनिधियों का अनुभव
इस सम्मेलन में विदेशी प्रतिभागियों की सक्रिय उपस्थिति ने आयोजन को एक अनूठा वैश्विक आयाम दिया है। बाहर से आए मेहमान आश्रम में रहकर आयुर्वेद पर आधारित सात्विक भोजन, भारतीय व्यायाम और नीम अथवा बबूल की पारंपरिक दातून के दैनिक उपयोग के लाभों को व्यक्तिगत रूप से जान रहे हैं। विदेशी प्रतिभागी टीना लैम्पे ने आधुनिक स्वास्थ्य संकटों के बीच आयुर्वेद की वैश्विक प्रासंगिकता और रोजमर्रा की उपयोगिता पर अपने विचार व्यक्त किए। इसके साथ ही खाटूश्यामजी नगर पालिका की चेयरमैन विनिता पूनिया और स्वामी चंद्रपुरी ने भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक इस भारतीय ज्ञान संपदा और प्राकृतिक जीवनशैली को पहुंचाने की अपील की।



















