राजस्थान के अलवर जिले के अंतर्गत टहला इलाके में आने वाले खोह-दरीबा गांव में बंदरों का उपद्रव इस कदर बढ़ गया कि स्थानीय निवासियों को खुद आगे आकर कदम उठाना पड़ा. लंबे समय से आबादी वाले इलाकों में बंदरों की तादाद तेजी से बढ़ रही थी, जिसके चलते रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो रही थी. इस गंभीर परेशानी को देखते हुए ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत के सहयोग से बंदरों को पकड़ने का एक सुनियोजित अभियान शुरू किया है.
पंचायत स्तर पर शुरू हुई कार्रवाई और 50 बंदर पकड़े गए
इस सामूहिक मुहिम के तहत अब तक लगभग 50 बंदरों को सफलतापूर्वक पकड़ा जा चुका है. पकड़े गए इन सभी बंदरों को पूरी सावधानी और सुरक्षित तरीके से गांव की सीमा से दूर दूसरे सुरक्षित प्राकृतिक इलाकों में छोड़ दिया गया है. ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यह अभियान अभी थमा नहीं है, बल्कि इलाके में बचे हुए अन्य उत्पाती बंदरों को पकड़ने के लिए अभियान को निरंतर जारी रखा गया है.
घरों में घुसपैठ, खाने की चोरी और बच्चों पर हमले का डर
गांव के निवासियों के अनुसार बंदरों के बड़े झुंड आए दिन बस्तियों में दाखिल होकर भारी परेशानी खड़ी कर रहे थे. ये बंदर बिना किसी खौफ के रिहायशी मकानों की छतों और कमरों में घुस जाते हैं और वहां रखा खाने-पीने का राशन तथा दूसरा घरेलू सामान उठाकर भाग जाते हैं. इतना ही नहीं, ग्रामीणों ने यह भी साझा किया कि कई मौकों पर बंदरों द्वारा छोटे बच्चों को काटने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं.
दहशत के साए में ग्रामीण, राहत दिलाने की पुरजोर कोशिश
बंदरों के इस आक्रामक व्यवहार की वजह से पूरे इलाके में भय का माहौल बन गया था. लोग अपने घरों से बाहर सामान्य रूप से निकलने में भी हिचकिचा रहे थे, जबकि अभिभावक अपने बच्चों को अकेले गलियों में भेजने से पूरी तरह कतरा रहे थे. चूंकि यह समस्या काफी लंबे वक्त से बनी हुई थी और कोई ठोस हल नहीं निकल रहा था, इसलिए ग्राम पंचायत के स्तर पर यह ठोस फैसला लिया गया. ग्रामीणों का मुख्य मकसद गांव को बंदरों के इस खौफ से मुक्त कराना और आम जनजीवन को फिर से सामान्य व सुरक्षित बनाना है.



















