राजस्थान के कोटा शहर में नगर निगम की सियासत अचानक गरमा गई है। कांग्रेस कार्यालय में पार्षदों के साथ आयोजित एक संगठनात्मक बैठक के दौरान कांग्रेस नेता अमित धारीवाल द्वारा नवनिर्वाचित महापौर अनुसुइया गोस्वामी को लेकर दिए गए बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा रुख अख्तियार कर लिया है। इस बैठक में धारीवाल पार्टी पार्षदों को विकास कार्यों के लिए महापौर पर आश्रित न रहने और प्रशासनिक अधिकारियों से सीधे काम निकलवाने का सुझाव दे रहे थे। इसी चर्चा के बीच उन्होंने अनुसुइया गोस्वामी के अनुभव पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह अभी नई महापौर बनी हैं और उन्हें क्या लखण है। इस बयान के सामने आते ही कोटा नगर निगम का प्रशासनिक विमर्श दोनों प्रमुख दलों के बीच कड़े राजनीतिक और भाषाई टकराव में तब्दील हो गया है।
पार्षदों की बैठक में अधिकारियों पर दबाव बनाने की रणनीति
कांग्रेस पार्टी के स्थानीय कार्यालय में बुलाई गई पार्षदों की बैठक का मुख्य उद्देश्य नगर निगम के भीतर पार्टी के चुने हुए प्रतिनिधियों को अधिक प्रभावी बनाना था। बैठक के दौरान अमित धारीवाल ने वार्ड स्तर के कार्यों को गति देने की रूपरेखा पेश की। उन्होंने पार्षदों से स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपने वार्डों की समस्याओं और विकास कार्यों के लिए महापौर पर निर्भर रहने का रुख छोड़ें। इसके स्थान पर पार्षदों को सीधे संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क साधने और अपने काम पूरे करवाने के निर्देश दिए गए। धारीवाल ने यह भी कहा कि यदि जनता से जुड़े काम समय पर पूरे नहीं होते हैं, तो पार्षदों को अधिकारियों का घेराव करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। इसी संबोधन के दौरान उन्होंने महापौर अनुसुइया गोस्वामी के कामकाज और समझ को लेकर टिप्पणी की, जिस पर अब विवाद गहरा गया है।
विधायक संदीप शर्मा का पलटवार और भाषा की मर्यादा पर सवाल
अमित धारीवाल के बयान पर कोटा दक्षिण के विधायक संदीप शर्मा ने कड़ा ऐतराज जताया और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को आड़े हाथों लिया। विधायक शर्मा ने कहा कि हालिया चुनावी नतीजों में मिली पराजय के कारण कांग्रेस पार्टी में भारी हताशा और बौखलाहट नजर आ रही है, जिसके चलते उसके नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर बोलने का सलीका नहीं रह गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में दलों और जनप्रतिनिधियों के बीच वैचारिक अथवा नीतिगत मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में संवाद की शुचिता, भाषा की मर्यादा और परस्पर सम्मान का दायरा कभी लांघा नहीं जाना चाहिए।
संदीप शर्मा ने इस टिप्पणी को सीधे तौर पर महिला जनप्रतिनिधियों के प्रति दृष्टिकोण से जोड़ा। उन्होंने कहा कि महापौर पूरे नगर की प्रथम नागरिक होती हैं और अनुसुइया गोस्वामी एक महिला जनप्रतिनिधि के रूप में उस सर्वोच्च पद पर आसीन हैं। शर्मा के अनुसार, ऐसी टिप्पणियां कांग्रेस नेताओं की महिलाओं के प्रति अनुचित मानसिकता को उजागर करती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि धारीवाल को प्रशासनिक अनुभव के अभाव पर ही अपनी बात रखनी थी, तो वे शालीन शब्दों में यह कह सकते थे कि महापौर अभी नई हैं और उन्हें समूची प्रशासनिक व्यवस्था को समझने में थोड़ा वक्त लगेगा। इस प्रकार के अपमानजनक शब्दों का प्रयोग लोकतांत्रिक मर्यादाओं के पूरी तरह खिलाफ है।
बीजेपी पार्षद नवीन माथुर ने भी संवैधानिक पद की गरिमा का दिया हवाला
इस पूरे घटनाक्रम पर बीजेपी पार्षद नवीन माथुर ने भी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। नवीन माथुर ने कहा कि नगर निगम का महापौर पद शहर का सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद होता है और उस पद की अपनी एक विशिष्ट गरिमा है। जनता द्वारा चुने गए किसी भी जनप्रतिनिधि के विरुद्ध व्यक्तिगत या अशोभनीय टिप्पणी करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करता है। माथुर ने जोर देकर कहा कि नगर निगम के सदन में जनहित के मुद्दों, शहर के विकास और बजट को लेकर तीखी राजनीतिक बहस हो सकती है, जो स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। किंतु किसी जनप्रतिनिधि पर निजी कटाक्ष करना केवल अनावश्यक कटुता और विवाद को जन्म देता है।
स्थानीय राजनीति में प्रशासनिक रणनीति बनाम भाषाई मर्यादा
कोटा की स्थानीय राजनीति में यह मामला अब केवल प्रशासनिक खींचतान तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह संवैधानिक पदों के सम्मान और राजनीतिक विमर्श की भाषा पर केंद्रित हो गया है। एक तरफ कांग्रेस अपनी रणनीति के तहत पार्षदों को अधिकारियों से सीधा तालमेल बैठाने, उन पर दबाव बनाने और जरूरत पड़ने पर घेराव करने के लिए लामबंद कर रही है, ताकि निगम प्रशासन में उनकी दखलअंदाजी मजबूत बनी रहे। वहीं दूसरी ओर बीजेपी इस बयान को महिला महापौर और शहर के प्रथम नागरिक के सीधे अपमान के रूप में प्रस्तुत कर रही है। दोनों पक्षों की इस तकरार ने कोटा में शहरी प्रशासन के कामकाज के साथ-साथ राजनीतिक शिष्टाचार पर नई बहस छेड़ दी है।



















