झीलों की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर में विजयादशमी के पावन पर्व को भव्य रूप से मनाने की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। हर साल की तरह इस बार भी शहर का प्रसिद्ध गांधी ग्राउंड रावण दहन और रामलीला के शानदार मंचन का मुख्य केंद्र बनने जा रहा है। उत्सव को यादगार बनाने के लिए यहां लगभग 30 फीट ऊंची रावण, कुंभकरण और मेघनाथ की विशालकाय प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। खास बात यह है कि इन गगनचुंबी पुतलों को तराशने के लिए उत्तर प्रदेश के बरेली से मुस्लिम कारीगर अपने पूरे परिवार के साथ उदयपुर पहुंचे हैं, जो पिछले कई वर्षों से इस कला और परंपरा को संजोए हुए हैं।
सिंधी समाज का आयोजन और कारीगरों का हुनर
दशहरे पर इन विशाल प्रतिमाओं के निर्माण की पूरी जिम्मेदारी और व्यवस्था सिंधी समाज द्वारा संभाली जाती है। बरेली से आए ये कुशल शिल्पकार दिन-रात पूरी लगन, निष्ठा और मेहनत के साथ पुतलों को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं। उनकी शिल्पकारी इतनी बारीक और सजीव होती है कि रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के चेहरे के भाव, उनके मुकुट, पारंपरिक पहनावे और समूचे स्वरूप को देखकर दर्शक दंग रह जाते हैं। यही बारीकी और जीवंतता हर साल गांधी ग्राउंड में जुटने वाले हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बनती है।
डेढ़ महीने की कठिन साधना से तैयार होते हैं पुतले
तीस फीट ऊंचे पुतलों को तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण और तकनीकी समझ का काम है। शिल्पकारों के अनुसार, इन तीनों प्रतिमाओं को पूर्ण आकार देने में लगभग एक से डेढ़ महीने का लंबा वक्त लगता है। निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत मजबूत बांस और लकड़ियों से विशाल ढांचा खड़ा करने से होती है। ढांचा तैयार होने के बाद विभिन्न हिस्सों को आपस में संतुलित तरीके से जोड़ा जाता है। इसके पश्चात कागजी परतों, कपड़ों, रंगों और पारंपरिक सजावटी सामग्रियों से पुतलों का पूरा स्वरूप निखारा जाता है। इतने विशाल आकार के पुतलों को संतुलित खड़ा रखना और हर विवरण को संवारना वर्षों के अनुभव, धैर्य और हुनर की मांग करता है। बरेली के इन कारीगरों के लिए यह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक अनूठी सांस्कृतिक परंपरा का अटूट हिस्सा है।
गांधी ग्राउंड में भव्य रामलीला और लंका दहन
विजयादशमी के मुख्य समारोह के दिन इन सभी प्रतिमाओं को गांधी ग्राउंड के विशाल परिसर में पूरी शानो-शौकत के साथ स्थापित किया जाएगा। इस अवसर पर यहां भव्य और सजीव रामलीला का मंचन किया जाता है। समारोह में रामायण के ऐतिहासिक प्रसंगों को जीवंत करने के लिए एक विशेष लंका नगरी का निर्माण भी किया जा रहा है, जिससे उपस्थित जनसमूह को धार्मिक प्रसंगों का वास्तविक अहसास हो सके। लंका दहन और उसके बाद 30 फीट ऊंचे रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन इस समूचे उत्सव का चरम आकर्षण रहता है। इसे देखने के लिए उदयपुर शहर के कोने-कोने के अलावा आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी भारी भीड़ पहुंचती है।
उदयपुर की साझा संस्कृति और पर्यटकों का उत्साह
झीलों के शहर उदयपुर में घूमने आने वाले देश-विदेश के सैलानियों के लिए भी गांधी ग्राउंड का यह उत्सव एक अनोखा आकर्षण पेश करता है। भारतीय संस्कृति के इस रंगारंग उत्सव, पुतलों की विशालता और भक्तिमय माहौल का आनंद लेने के लिए बड़ी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक गांधी ग्राउंड पहुंचते हैं। सिंधी समाज का आयोजन, मुस्लिम कारीगरों का समर्पित हुनर और विभिन्न समुदायों का यह आपसी जुड़ाव उदयपुर की गौरवशाली गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक सौहार्द को खूबसूरती से दर्शाता है। यही सामाजिक एकता और भव्यता हर साल लोगों में इस आयोजन के प्रति गहरा उत्साह बनाए रखती है।


















