राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावी शंखनाद के साथ ही देहात के अंचलों में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। राज्य भर में ग्रामीण शासन की नई बागडोर सौंपने की कवायद शुरू होते ही चौपालों पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा विमर्श यही उभर कर सामने आ रहा है कि मतदाता अपने मत का प्रयोग किन आधारों पर करेंगे। पारंपरिक तौर पर हावी रहने वाले जातिगत और सामाजिक समीकरण इस बार भी चुनावी दिशा तय करेंगे या फिर बुनियादी ढांचे का अभाव और विकास की मांग उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेगी, यह सवाल सबसे प्रमुख बना हुआ है। ग्रामीण मतदाता इस बार वादों के बजाय जमीनी हकीकत को तौल रहे हैं और अपनी रोजमर्रा की दुश्वारियों के ठोस समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
राजधानी के मुहाने पर उपेक्षा का दंश झेलता मानोता
राजस्थान की राजधानी जयपुर से महज 27 किलोमीटर की दूरी पर बसा मानोता गांव प्रशासनिक और विकास के दावों के बीच एक हैरान करने वाली तस्वीर पेश करता है। सत्ता के केंद्र और प्रशासनिक मुख्यालय के इतने करीब होने के बावजूद यह इलाका बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। गांव में पक्की सड़कों की हालत बेहद खस्ता हो चुकी है, जिसके चलते सामान्य आवाजाही भी जोखिम भरी बन जाती है। सीवर लाइन का कोई समुचित प्रबंध न होने से रास्तों पर गंदा पानी जमा रहता है। आधुनिक दौर में जहां हर सेवा ऑनलाइन हो चुकी है, वहीं राजधानी की सीमा से सटे इस गांव में मोबाइल नेटवर्क का न मिलना ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा का सिरदर्द बना हुआ है। विद्यार्थियों और युवाओं को ऑनलाइन पढ़ाई करने या सामान्य बातचीत के लिए भी छतों और ऊंची जगहों का सहारा लेना पड़ता है।
पेयजल की किल्लत और जल निकासी का संकट
मानोता गांव में जल संकट ग्रामीणों के जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। इलाके में न तो कोई बड़ा प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद है और न ही कोई व्यवस्थित तालाब, जिससे पानी की जरूरतों को पूरा किया जा सके। इसके अलावा सरकारी स्तर पर भी नियमित और पर्याप्त जलापूर्ति का ढांचा अब तक खड़ा नहीं हो पाया है। दैनिक उपयोग और पीने के साफ पानी के लिए आबादी को महंगे निजी टैंकरों पर आश्रित रहना पड़ता है या फिर दूर-दराज के स्थानों से पानी ढोकर लाना पड़ता है। गंदे पानी की निकासी के लिए नालियों और सीवरेज सिस्टम की कोई कारगर व्यवस्था नहीं है। रास्तों पर जलभराव के चलते पैदल चलने वालों और वाहन चालकों दोनों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिससे स्वच्छता और जनस्वास्थ्य से जुड़े खतरे भी लगातार बने रहते हैं।
जातिगत बंधनों से परे विकासोन्मुख नेतृत्व की मांग
गंभीर समस्याओं से जूझ रहे मानोता के बाशिंदों का रुख आगामी पंचायत चुनाव को लेकर काफी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। गांव के लोगों का कहना है कि वे अब पारंपरिक जातीय गोलबंदी या खोखले नारों के आधार पर वोट देने के मूड में नहीं हैं। मतदाताओं की प्राथमिकता ऐसे प्रत्याशी को चुनने की है जो गांव की धरातली मुश्किलों को भली-भांति समझता हो और हर वक्त जनता के सुख-दुख में मौजूद रहे। ग्रामीणों का स्पष्ट मत है कि चुनाव महज जीत-हार की कवायद नहीं, बल्कि जनता और प्रतिनिधि के बीच विश्वास का पैमाना है। आने वाली नई पंचायत सरकार से ग्रामीणों की प्रमुख मांग यही है कि वह पेयजल संकट, खस्ताहाल सड़कों, सीवर व्यवस्था और मोबाइल नेटवर्क जैसी मूलभूत समस्याओं को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखे, ताकि विकास की रोशनी गांव के हर घर तक पहुंच सके।


















