पूर्वी राजस्थान का दौसा जिला इन दिनों स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों की वजह से बेहद गर्माए सियासी माहौल का गवाह बन रहा है। ग्रामीण राजनीति की धुरी मानी जाने वाली जिला परिषद की प्रमुख सीट पर पिछले लगभग 24 सालों से लगातार विपक्षी दल कांग्रेस का परचम लहराता रहा है। इस बार प्रशासनिक स्तर पर हुए आरक्षण निर्धारण ने पूरे समीकरणों को नए सिरे से तय कर दिया है, क्योंकि जिला प्रमुख का पद अनुसूचित जाति वर्ग की महिला उम्मीदवार के लिए सुरक्षित घोषित किया गया है। राज्य के शहरी निकाय चुनावों में मजबूत प्रदर्शन दर्ज कराने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इस ग्रामीण गढ़ में सेंध लगाने की पुरजोर तैयारी में है, जबकि कांग्रेस अपने दशकों पुराने दबदबे को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती।
प्रारंभिक दौर में भगवा परचम और बाद का घटनाक्रम
दौसा के एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई बनने की पृष्ठभूमि भी बेहद दिलचस्प रही है। जब 10 अप्रैल 1991 को इसे नया जिला बनाया गया, तब उससे पूर्व यह जयपुर जिले की एक साधारण पंचायत समिति के दायरे में शामिल था। जिले का गठन होने के उपरांत यहां अलग जिला परिषद की व्यवस्था की गई। वर्ष 1995 के दौरान जब इस नवगठित परिषद के लिए पहले लोकतांत्रिक चुनाव संपन्न हुए, तब जीत का सेहरा भारतीय जनता पार्टी के सिर बंधा था। उस दौर में किरोड़ी लाल मीणा ने पहले जिला प्रमुख के तौर पर कार्यभार संभाला था। हालांकि वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में बामनवास सीट से उनके विधायक निर्वाचित होने के चलते उन्हें यह स्थानीय पद छोड़ना पड़ा। परिणामस्वरूप, उसी दल के सतीश कुमार को उप जिला प्रमुख से पदोन्नत कर जिला प्रमुख बनाया गया।
साल 2002 से लगातार बरकरार है हाथ का कब्जा
अगले आम चुनावों में भी बीजेपी के जियालाल बंशीवाल ने शीर्ष पद हासिल किया, परंतु उनका कार्यकाल अधिक लंबा नहीं चल सका। केवल दो वर्षों के भीतर ही उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया, जिसके बाद तत्कालीन उप जिला प्रमुख विनोद शर्मा को अल्पकाल के लिए प्रशासनिक बागडोर सौंपी गई। इसके बाद वर्ष 2002 में नए सिरे से हुए चुनाव में कांग्रेस के महेंद्र सांखला की विजय के साथ ही इस पद पर शक्ति का जो संतुलन बदला, वह आज तक कायम है। सांखला के बाद वर्ष 2005 में कावेरी देवी मीणा, वर्ष 2010 में अजीत सिंह महुआ, वर्ष 2015 में गीता खटाना तथा वर्ष 2021 में हीरालाल सैनी क्रमशः इस पद पर काबिज होते रहे। लगातार पांच कार्यकालों से जीत का यह सिलसिला बनाए रखना अब कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।
आरक्षण के नए नियमों से बदले संभावित दावेदारों के समीकरण
कुल 37 प्रादेशिक वार्डों पर आधारित दौसा जिला परिषद में इस मर्तबा शीर्ष कुर्सी अनुसूचित जाति की महिला प्रतिनिधि के लिए आरक्षित कर दी गई है। इस फेरबदल के कारण सभी प्रमुख सियासी दलों के भीतर टिकट वितरण को लेकर भारी मंथन चल रहा है, जहां सांगठनिक निष्ठा और जातीय संतुलन दोनों को साधना अनिवार्य हो गया है। कांग्रेस के खेमे में पूर्व मंत्री ममता भूपेश के साथ-साथ नंदलाल बंशीवाल, डीसी बैरवा, किरण डोरिया और सुल्तान बैरवा जैसे वरिष्ठ चेहरों की गतिविधियां काफी तेज दिखाई दे रही हैं। इन प्रमुख नेताओं की राय संभावित महिला प्रत्याशी के चयन में सबसे निर्णायक भूमिका निभाने की उम्मीद है।
दो कद्दावर सियासी हस्तियों की व्यक्तिगत साख की परीक्षा
यह चुनावी मुकाबला केवल स्थानीय प्रतिनिधियों तक सीमित न होकर राजस्थान के दो सबसे प्रभावशाली राजनेताओं की प्रतिष्ठा से भी सीधा जुड़ गया है। यह क्षेत्र सचिन पायलट के मजबूत जनाधार और असर वाला इलाका माना जाता है, तो वहीं वर्तमान कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा की पैतृक जन्मभूमि भी यही जिला है। कांग्रेस को जहां पायलट के साथ पूर्व मंत्री प्रसादी लाल मीणा, सांसद मुरारी लाल मीणा, ममता भूपेश, गजराज खटाना और ओमप्रकाश शुक्ला के सामूहिक प्रभाव पर भरोसा है, वहीं बीजेपी पूरी तरह से किरोड़ी लाल मीणा की जमीनी पकड़ और जिले के अपने चार सिटिंग विधायकों की ताकत पर दांव लगा रही है। दोनों ही खेमे अपनी-अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में लगे हैं।
परिसीमन के बाद 11 से बढ़कर 14 हुई पंचायत समितियां
प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया के पश्चात दौसा जिले में जमीनी स्तर की चुनावी जंग का दायरा और विस्तृत हो गया है। पहले जहां जिले के अंतर्गत केवल 11 पंचायत समितियां हुआ करती थीं, वहीं अब इनकी तादाद बढ़कर कुल 14 हो चुकी है। पूर्व की सूची में दौसा, लवाण, नांगल राजावतान, रामगढ़ पचवारा, लालसोट, सिकराय, सिकंदरा, बांदीकुई, बसवा, बैजूपाड़ा और महुआ शामिल थीं। नए पुनर्गठन के तहत मंडावर, मनोहरपुर खेड़ला और शिवसिंहपुरा नाम से तीन अतिरिक्त इकाइयां स्थापित की गई हैं। इन तीनों नवसृजित समितियों में पहली बार प्रधान के पदों हेतु मतदान करवाया जाएगा, जिससे प्रत्येक दल पर अधिक से अधिक बोर्ड गठित करने का दबाव बढ़ गया है।
आरोप-प्रत्यारोप और सभी इकाइयों पर जीत के दावे
चुनावी संग्राम के बीच कांग्रेस के स्थानीय सांसद मुरारी लाल मीणा ने पूरे जिले में एकतरफा जीत का दावा पेश किया है। उन्होंने पूर्ववर्ती नगर निकाय चुनावों के परिणामों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि उस समय कुल 11 में से 8 बोर्ड कांग्रेस ने अपने नाम किए थे। इसी जनसमर्थन के बूते उन्होंने उम्मीद जताई कि इस बार सभी 14 पंचायत समितियों में उनकी पार्टी का परचम लहराएगा। बीजेपी पर निशाना साधते हुए मुरारी लाल मीणा ने कहा कि विपक्षी दल अनुचित हथकंडे अपनाकर एकाध जगह कब्जा भले कर ले, पर आम मतदाता कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सत्तारूढ़ दल जिला परिषद और नवगठित समितियों में उलटफेर कर पाएगा या कांग्रेस का अभेद्य किला इस बार भी सुरक्षित रहेगा।























