भारतीय संस्कृति में पर्वों का सिलसिला हमारी प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखता है। दीपावली के खास मौके पर धन की देवी मां लक्ष्मी के पूजन में चिकनी मिट्टी से तैयार हटरी का विधान बेहद खास माना जाता है। हालांकि आज के आधुनिक बाजारों में पूजा-पाठ के लिए अनगिनत नए विकल्प उपलब्ध हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद मिट्टी की इस पारंपरिक हटरी के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा और विश्वास आज भी पूरी तरह से कायम है।
समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक
दीपावली के उल्लासपूर्ण अवसर पर घरों में मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए मिट्टी से बनी हटरी का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। इसे हमारे समाज में शुभता, सौभाग्य और घर में बरकत आने का बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस पवित्र वस्तु को तैयार करने की प्रक्रिया में कुम्हार सबसे पहले विशेष चिकनी मिट्टी को अच्छी तरह गूंथकर एक निश्चित सांचा तैयार करते हैं। इसके बाद इन आकृतियों को धूप में सुखाया जाता है और मांग के अनुसार आकर्षक रंगों से सजाया जाता है। जब ये पूरी तरह बनकर तैयार हो जाती हैं, तब इन्हें दीपावली पूजन की मुख्य सामग्री में शामिल किया जाता है। ऐसी पुरानी मान्यता चली आ रही है कि पर्व के दिन घर में हटरी स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से स्थायी सुख-समृद्धि का वास होता है।
पूजन अनुष्ठान और अन्न-धन का विधान
स्थानीय कारीगर रवि प्रजापत बताते हैं कि दीपावली के पावन पर्व पर पूजन के लिए इन हटरी को बहुत ही करीने से तैयार किया जाता है। इसे चार अलग-अलग कुलियों को आपस में जोड़कर बनाया जाता है, जिसके भीतर पूरे साल काम आने वाली रोजमर्रा की जरूरी चीजें जैसे गेहूं, चावल और नकदी जैसी वस्तुएं पूरे आदर के साथ रखी जाती हैं। इसके बाद पूरे विधि-विधान के साथ अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद इस हटरी को ऊपर से ढक्कन लगाकर घर की तिजोरी या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर संभालकर रख दिया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इस परंपरा का पालन करने से पूरे साल घर में कभी भी अन्न और धन की कोई कमी महसूस नहीं होती है और परिवार में बरकत बनी रहती है।
मेहनत और बाजार मांग का गणित
कारीगर रवि आगे जानकारी देते हुए बताते हैं कि इस पारंपरिक वस्तु को बनाने का काम मुख्य त्योहार से करीब 20 से 25 दिन पहले ही शुरू कर दिया जाता है। मिट्टी को सही आकार देने से लेकर उसे धूप में सुखाने और सुंदर रंगों से सजाने तक में कारीगरों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। आम तौर पर बाजार में इसकी कीमत करीब 50 रुपये तय रहती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे दीपोत्सव का त्योहार नजदीक आता जाता है, वैसे-वैसे इनकी मांग में अचानक तेजी आ जाती है और स्थानीय बाजार में इसके दामों में भी अंतर देखने को मिलता है।
















