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जैसलमेर सीमा पर चमत्कारी तनोट माता मंदिर: सीमा सुरक्षा बल संभालता है पूजा, संग्रहालय में मौजूद हैं बिना फटे पाकिस्तानी बमराजस्थान
16 अक्तू॰ 2026, 9:15 am (2 घंटे पहले)· 0

जैसलमेर सीमा पर चमत्कारी तनोट माता मंदिर: सीमा सुरक्षा बल संभालता है पूजा, संग्रहालय में मौजूद हैं बिना फटे पाकिस्तानी बम

राजस्थान में जैसलमेर से 120 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर की देखरेख सीमा सुरक्षा बल करता है, जहां 1965 और 1971 के युद्धों में गिरे सैकड़ों बम कभी नहीं फटे।

रेगिस्तानी सरहद पर सुरक्षा में तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवान केवल सीमाओं की चौकसी ही नहीं करते, बल्कि एक बेहद आस्थावान धार्मिक स्थल की संपूर्ण आध्यात्मिक व्यवस्था भी संभालते हैं। राजस्थान के सीमावर्ती इलाके में जैसलमेर से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के समीप तनोट माता का प्रसिद्ध धाम स्थापित है। नवरात्रि के पावन दिनों में यहां दर्शनार्थियों की भारी भीड़ उमड़ती है, जहां परिवार और राष्ट्र की सलामती के लिए प्रार्थना की जाती है। इस पावन स्थल की सबसे खास पहचान यह है कि यहां नियमित पूजा-अर्चना और व्यवस्था किसी पारंपरिक पुजारी के हाथों में नहीं, बल्कि सीधे वर्दीधारी प्रहरियों के हाथों में सौंपी गई है।

सीमा सुरक्षा बल का प्रबंधन और प्रतिदिन की परंपराएं

वर्ष 1965 में दोनों देशों के मध्य हुए भीषण सैन्य संघर्ष के पश्चात इस समूचे धार्मिक स्थल का कामकाज सीमा सुरक्षा बल ने अपने संरक्षण में ले लिया था। वर्तमान समय में इस पावन धाम का दैनिक संचालन बल के तत्वावधान में स्थापित एक विशेष ट्रस्ट द्वारा संपन्न किया जाता है। दिन के तीनों पहरों यानी प्रातः काल, दोपहर और संध्या समय की मुख्य आरती का विधान स्वयं सीमा सुरक्षा बल के जवान ही पूरे विधि-विधान से निभाते हैं।

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मंदिर में आने वाले हर एक श्रद्धालु के लिए एक बड़े सामुदायिक भंडारे की व्यवस्था भी जवानों के द्वारा ही संचालित की जाती है। इस पावन लंगर की विशेषता यह है कि समाज के सभी वर्गों के लोग बिना किसी सामाजिक या आर्थिक भेदभाव के एक ही कतार में साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। जवान अत्यंत आदर और निष्ठा के साथ आगंतुकों को भोजन परोसने का दायित्व निभाते हैं। सीमा के रक्षकों के साथ इस गहरे और अटूट आध्यात्मिक रिश्ते के कारण इस धाम को सैनिकों की देवी, थार की वैष्णो देवी और रुमाल वाली देवी जैसे आदरसूचक नामों से पुकारा जाता है।

1965 और 1971 के युद्ध के ऐतिहासिक चमत्कार

धार्मिक मान्यताओं में तनोट माता को आवड़ माता का ही एक दिव्य अवतार माना जाता है। यह पवित्र परिसर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 1965 और 1971 के दोनों बड़े युद्धों का प्रत्यक्ष गवाह रहा है। वर्ष 1965 के टकराव के दौरान विरोधी सेना ने इस इलाके को निशाना बनाते हुए लगभग 4000 भारी बम बरसाए थे। इसके बाद 1971 के युद्ध में भी करीब 450 शक्तिशाली गोले इस दिशा में दागे गए थे।

अद्भुत तथ्य यह रहा कि इन दोनों ही युद्धों में मंदिर परिसर और उसके आसपास गिरी कोई भी विस्फोटक सामग्री सक्रिय होकर नहीं फटी। मंदिर भवन और वहां मौजूद लोग पूरी तरह सुरक्षित रहे, जबकि भारतीय सेना ने इन ऐतिहासिक लड़ाइयों में शानदार विजय दर्ज की। उस दौर में निष्प्रभावी साबित हुए वे जीवित बम आज भी मंदिर प्रांगण में स्थापित एक विशेष लघु संग्रहालय में श्रद्धालुओं के अवलोकनार्थ सुरक्षित रखे गए हैं। युद्ध के दौरान सामने आई इस अलौकिक घटना से विरोधी सेना के ब्रिगेडियर शाहबाज हुसैन भी इतने चकित और प्रभावित हुए कि उन्होंने मंदिर में श्रद्धापूर्वक चांदी के चार छत्र अर्पित किए थे। ये उपहार आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं। लोंगेवाला चौकी के ऐतिहासिक युद्ध और इस पावन स्थल की गाथा पर हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय फिल्म बॉर्डर की पटकथा भी तैयार की गई थी।

रुमाल बांधने की मन्नत और आधुनिक युग की चौकसी

मुख्य मंदिर के सन्निकट ही मनसा देवी का पावन स्थल विद्यमान है, जिन्हें श्रद्धालु रुमाल वाली देवी के तौर पर भी पूजते हैं। भक्तों के बीच यह दृढ़ विश्वास है कि जो भी व्यक्ति सच्चे हृदय से यहां कपड़े का रुमाल बांधकर अपनी मनोकामना व्यक्त करता है, उसकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है। जब मांगी गई मुराद पूरी हो जाती है, तो भक्त दोबारा इस सीमावर्ती धाम पर आकर उस रुमाल की गांठ खोलते हैं।

बीते कुछ वर्षों के दौरान जब सीमा पर तनाव बढ़ा और विरोधी पक्ष की तरफ से आधुनिक तकनीक वाले ड्रोन तथा मिसाइलों से वार करने के प्रयास हुए, तब भी यह पूरा सीमांत क्षेत्र किसी भी नुकसान से अछूता रहा। स्थानीय मरुस्थलीय आबादी और सीमा प्रहरियों के मन में यह अटूट भरोसा बना हुआ है कि विषम परिस्थितियों वाली इस थार सीमा की सुरक्षा में जवानों के पराक्रम के साथ स्वयं देवी का अदृश्य कवच भी निरंतर कार्य कर रहा है।

सवाल-जवाब

तनोट माता मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले से करीब 120 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट स्थित है।
इस मंदिर की पूजा और दैनिक व्यवस्था कौन संभालता है?
मंदिर की पूजा-अर्चना, आरती और समस्त प्रबंधन का कार्य सीमा सुरक्षा बल द्वारा गठित एक विशेष ट्रस्ट करता है।
1965 और 1971 के युद्धों में यहां क्या चमत्कार हुआ था?
1965 के युद्ध में गिरे करीब 4000 बम और 1971 के युद्ध में दागे गए 450 बमों में से मंदिर परिसर में गिरा एक भी बम नहीं फटा था।
क्या बिना फटे बम आज भी मंदिर में देखे जा सकते हैं?
हां, दोनों युद्धों के वे जीवित बम आज भी मंदिर परिसर में बने एक छोटे संग्रहालय में श्रद्धालुओं के देखने के लिए सुरक्षित रखे हैं।
पाकिस्तानी सेना के किस अधिकारी ने यहां चांदी के छत्र भेंट किए थे?
पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर शाहबाज हुसैन देवी के चमत्कार से प्रभावित होकर यहां चांदी के चार छत्र चढ़ाए थे।
तनोट माता को रुमाल वाली देवी क्यों कहा जाता है?
मंदिर के पास मनसा देवी स्थल पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए रुमाल बांधते हैं और इच्छा पूरी होने पर उसे खोलते हैं।
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टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·56 मिनट पहले

सरहद पर तैनात जवानों की आस्था और इतिहास की यह कहानी वाकई दिल को छू लेने वाली है।

Ravikash Gupta@ravikash·56 मिनट पहले

अर्जुन भाई, चार हजार बम बिना फटे रह जाना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है!

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

चार हजार बम गिरने के बाद भी मंदिर का न फटना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करण भाई, आपकी बात बिल्कुल सही है, लेकिन क्या आज भी सीमा सुरक्षा बल के अलावा वहां कोई स्थानीय पुजारी पूजा में मदद करता है या सब कुछ जवान ही संभालते हैं?

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