पाली जिले के मांडावास गांव में भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच महिलाओं और मासूम बच्चों का पानी के लिए संघर्ष करना रोजमर्रा की एक दुखद हकीकत बन चुका है। ग्रामीणों की माने तो इलाके में पाइपलाइन बिछाने का कार्य पिछले काफी समय से पूरी तरह से रुक गया है, जिसका सीधा असर पेयजल की आपूर्ति पर पड़ा है। जगरवाल मदन सिंह ने हाल ही में मांडावास गांव का दौरा कर वहां की बदहाल स्थिति को करीब से देखा। उन्होंने गांव की महिलाओं और प्रभावित लोगों से बात की, जिन्होंने अपनी आपबीती सुनाई कि उन्हें पानी जुटाने के लिए कितनी भारी मशक्कत करनी पड़ती है। अब ग्रामीणों की ओर से राज्य सरकार से यह मांग जोर पकड़ रही है कि 'जल जीवन मिशन' के तहत अटके हुए कार्यों को तत्काल गति दी जाए ताकि उन्हें इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिल सके।
कागजों में आदर्श, हकीकत में प्यासा गांव
'हर घर जल' का सपना दिखाने वाली सरकार की 'जल जीवन मिशन' योजना रोहट क्षेत्र में दम तोड़ती नजर आती है। मांडावास गांव इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसे फाइलों में पाइपलाइन बिछाकर एक 'आदर्श गांव' के रूप में विकसित करने की योजना थी। हालांकि, वास्तविकता यह है कि ठेकेदार को भुगतान न मिलने की वजह से बीते दो वर्षों से काम ठप पड़ा है। लाखों रुपयों की कीमत वाले सरकारी पाइप गलियों और रास्तों पर लावारिस अवस्था में पड़े हुए धीरे-धीरे बर्बाद हो रहे हैं, जबकि स्थानीय निवासी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।
आधी आबादी प्यासी, पुरानी व्यवस्था भी भंग
जगरवाल मदन सिंह का मानना है कि मांडावास गांव में पीएचईडी विभाग और संबंधित ठेकेदार की उदासीनता का खामियाजा आम जनता को चुकाना पड़ रहा है। इस योजना को जमीन पर उतारने के चक्कर में गांव में पहले से चल रही जलापूर्ति लाइनों को बंद कर दिया गया था। परिणाम यह निकला कि नई पाइपलाइन आज भी अधूरी है और पुरानी लाइनें ठप पड़ी हैं। नतीजतन, गांव के एक हिस्से में जैसे-तैसे पानी पहुंच रहा है, जबकि आधा गांव पिछले दो वर्षों से पूरी तरह सूखे की चपेट में है।
इंसान और पशु दोनों संकट में
रोहट और उसके आसपास के दर्जनों गांवों की स्थिति मांडावास से अलग नहीं है। हर जगह काम बीच में ही छोड़कर ठेकेदार नदारद हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन केवल पशुधन के लिए पानी की खेलियों को भरने का नाटक कर रहा है, जबकि वास्तविक धरातल पर इंसानों की प्यास बुझाने के लिए कोई ठोस योजना क्रियान्वित नहीं की जा रही है।
महंगे टैंकरों से बढ़ रहा आर्थिक बोझ
भीषण गर्मी के इस दौर में ग्रामीणों के पास महंगे निजी पानी के टैंकर मंगवाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। गरीब परिवार एक टैंकर के लिए 1500 से 2000 रुपये तक खर्च करने को मजबूर हैं, जिससे उनके मासिक बजट पर भारी मार पड़ रही है। जो ग्रामीण इतना खर्च वहन करने में असमर्थ हैं, वे दूरदराज के कुओं से पानी ढोने को विवश हैं। रोहट के ग्रामीणों ने अब मुख्यमंत्री से सीधे हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। उनकी प्रमुख मांगों में ठप कार्यों को तुरंत शुरू करना, ठेकेदारों के लंबित भुगतान को जारी करना ताकि पाइपलाइन जुड़ सके, और स्थाई समाधान होने तक सरकारी टैंकरों की संख्या में बढ़ोतरी करना शामिल है ताकि जनता को राहत मिल सके।













