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राजस्थान निकाय प्रमुख चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका, 9 जिलों में नहीं बन सका एक भी बोर्डराजस्थान
22 सित॰ 2026, 6:03 pm (1 दिन पहले)· 1

राजस्थान निकाय प्रमुख चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका, 9 जिलों में नहीं बन सका एक भी बोर्ड

राजस्थान में नगरीय निकाय प्रमुखों के चुनाव परिणामों में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली है, जहाँ संगठन सृजन अभियान के बावजूद नौ जिलों में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका।

राजस्थान के नगरीय निकाय प्रमुखों के चुनाव परिणामों ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों की तैयारी के तहत पार्टी ने जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने के इरादे से संगठन सृजन अभियान शुरू किया था। पार्टी का दावा था कि इस मुहिम के जरिए संगठन को नीचे से लेकर ऊपर तक नई ऊर्जा मिलेगी, लेकिन जब निकाय प्रमुखों के चयन की बारी आई, तो जमीनी स्तर पर इस अभियान का कोई खास असर दिखाई नहीं दिया। पार्षद स्तर के मतदान तक मुकाबले में मजबूती से डटी दिख रही कांग्रेस निकाय प्रमुख के चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते बिखर गई। नतीजतन, प्रदेश के नौ जिलों में पार्टी का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया, जबकि छह अन्य जिलों में वह केवल एक-एक निकाय पर ही सिमट कर रह गई।

नौ जिलों में खाता भी नहीं खोल पाई मुख्य विपक्षी पार्टी

सोमवार को जारी हुए नगरीय निकाय प्रमुखों के चुनावी नतीजों में कांग्रेस को कई अहम इलाकों में भारी नाकामी झेलनी पड़ी। प्रदेश के नौ जिले ऐसे रहे जहां दर्जनों निकायों के बावजूद पार्टी एक भी बोर्ड बनाने में सफल नहीं हो सकी। इनमें पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, बालोतरा, फलौदी और पाली जिले शामिल हैं, जहां पार्टी को शून्य पर संतोष करना पड़ा। इसके अलावा पूर्वी राजस्थान के भरतपुर और डीग जिलों में भी कांग्रेस अपना खाता नहीं खोल पाई। हाड़ौती अंचल के प्रमुख केंद्र कोटा, आदिवासी बहुल डूंगरपुर और अजमेर के समीप स्थित ब्यावर जिले में भी पार्टी को ऐसी ही पराजय का सामना करना पड़ा। इन सभी नौ जिलों में कांग्रेस के हाथ पूरी तरह खाली रहे।

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छह जिलों में केवल एक-एक बोर्ड तक सिमटी कांग्रेस

नौ जिलों में पूरी तरह बाहर होने के साथ-साथ प्रदेश के आधा दर्जन जिलों में कांग्रेस को बेहद सीमित कामयाबी मिली। अजमेर, बांसवाड़ा, जैसलमेर, जालोर, प्रतापगढ़ और सिरोही में पार्टी किसी तरह केवल एक-एक निकाय प्रमुख का पद ही अपने नाम कर सकी। इस अप्रत्याशित हार से पार्टी खेमे में गहरी निराशा और हलचल है। पार्टी नेतृत्व ने इन नतीजों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व सीएम अशोक गहलोत समेत तमाम वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने सरकारी तंत्र और सत्ता का दुरुपयोग करके निकाय बोर्डों पर कब्जा किया है और यह सीधे तौर पर जनता के जनादेश का अनादर है।

रणनीति की विफलता और पार्षदों में बिखराव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनावी शिकस्त के पीछे केवल सत्ता का प्रभाव नहीं, बल्कि कांग्रेस का अंदरूनी ढांचा और कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट जिम्मेदार रहा। पार्टी निकाय प्रमुखों के चुनाव के दौरान जरूरी संख्या बल जुटाने और सही चुनावी गणित बैठाने में पूरी तरह चूक गई। कांग्रेस न तो निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने की प्रभावी रणनीति बना पाई और न ही अपने खुद के जीते हुए पार्षदों को टूटने से रोक सकी। अजमेर नगर निगम चुनाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रहा, जहां पार्टी ने अपना मेयर बनाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन मतदान के वक्त पार्षद बिखर गए और पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके अलावा टिकट वितरण के समय उपजा असंतोष निकाय प्रमुख चुनाव में खुलकर सामने आ गया। बगावत कर निर्दलीय या अन्य रूप से जीते कई कार्यकर्ताओं ने स्थानीय नेतृत्व से नाराज होकर पार्टी के समीकरणों को नुकसान पहुंचाया।

बीजेपी की मजबूत बाड़ाबंदी और गुटबाजी का नुकसान

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने इन चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए सुनियोजित बाड़ाबंदी की और उसमें किसी भी प्रकार की सेंधमारी नहीं होने दी। अधिकतम निकायों में अपना बोर्ड स्थापित करने के लिए बीजेपी ने अपने तमाम वरिष्ठ नेताओं और रणनीतिकारों को मैदान में सक्रिय कर दिया था। इसके विपरीत कांग्रेस में आपसी गुटबाजी के चलते सभी प्रमुख नेता एक मंच पर एकजुट नजर नहीं आए। शीर्ष स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक तालमेल की इस कमी के कारण संगठन सृजन अभियान का कोई ठोस प्रभाव जमीन पर नहीं दिखा। पहले पार्षदों के चुनाव और फिर निकाय प्रमुखों के चयन के समय सामने आई इस बिखराव भरी स्थिति का सीधा फायदा बीजेपी को मिला, जिसने भजनलाल सरकार की योजनाओं और संगठनात्मक पकड़ को भुनाते हुए कई निकायों पर अपना परचम लहरा दिया।

सवाल-जवाब

राजस्थान निकाय प्रमुख चुनाव में कांग्रेस को कितने जिलों में शून्य सीटें मिलीं?
कांग्रेस नौ जिलों बाड़मेर, बालोतरा, फलौदी, पाली, भरतपुर, डीग, कोटा, डूंगरपुर और ब्यावर में एक भी निकाय बोर्ड नहीं बना सकी।
किन जिलों में कांग्रेस केवल एक-एक निकाय तक सीमित रही?
कांग्रेस अजमेर, बांसवाड़ा, जैसलमेर, जालोर, प्रतापगढ़ और सिरोही में केवल एक-एक बोर्ड ही जीत पाई।
कांग्रेस नेतृत्व ने इस हार पर क्या आरोप लगाया है?
पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा, टीकाराम जूली और अशोक गहलोत ने बीजेपी पर सत्ता के दुरुपयोग और जनादेश के अपमान का आरोप लगाया है।
राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस की हार की मुख्य वजह क्या बता रहे हैं?
विश्लेषकों के अनुसार कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट, निर्दलीयों को साधने में नाकामी, टिकट असंतोष और गुटबाजी हार के मुख्य कारण रहे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·1 दिन पहले

बाड़मेर और कोटा जैसे बड़े इलाकों में भी पार्टी का पूरी तरह खाता न खुल पाना सचमुच चौंकाने वाला है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

कांग्रेस के नेता अब कह रहे हैं कि सरकार ने तंत्र का दुरुपयोग किया, लेकिन सच तो यह है कि उनके अपने पार्षद ही पार्टी के साथ नहीं टिक पाए। सिर्फ सत्ता पर ठीकरा फोड़ने से हार नहीं छिपने वाली।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

अर्जुन जी, बात तो बिल्कुल सही कही आपने। जब घर के लोग ही साथ न दें, तो बाहर वालों पर दोष मढ़ने का क्या फायदा?

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

संगठन सृजन अभियान के बावजूद राजस्थान में कांग्रेस का ऐसा सफाया हैरान करने वाला है। जमीन पर पार्षदों को संभाल नहीं पाए और अब हार का ठीकरा सत्ता के दुरुपयोग पर फोड़ा जा रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा। पिछली बार जब मैं बाड़मेर गया था, स्थानीय कार्यकर्ताओं में ही आपस में सिरपट्टवल चल रही थी, नतीजा तो सामने आना ही था।

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