राजस्थान के झुंझुनूं जिले में बिसाऊ तहसील का कस्बा महनसर एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत को संजोए हुए है, जिसका आकर्षण सामान की बिक्री नहीं बल्कि उसकी कलात्मक बनावट है। इस कस्बे में स्थित करीब 190 साल पुरानी यह संरचना सोने की साळ के नाम से विख्यात है। आमतौर पर किसी दुकान में लोग खरीद-फरोख्त के लिए जाते हैं, लेकिन यहां आने वाले लोग सामान देखने के बजाय सिर उठाकर छत और दीवारों पर नजरें टिकाए रहते हैं। इस दुकान की छतों और दीवारों पर रामायण, महाभारत और कृष्णलीला से जुड़े प्रसंगों को सोने की स्याही से अत्यंत बारीकी के साथ चित्रित किया गया है, जिसकी चमक लगभग दो सदियों के बाद भी बरकरार है।
सोने-चांदी के बड़े कारोबारी थे सेठ हरकंठराय पोदार
इस अनूठी दुकान का निर्माण विक्रम संवत 1905 में सेठ हरकंठराय पोदार ने करवाया था। उन्होंने इसे मूल रूप से व्यापारिक गतिविधियों के संचालन के लिए तैयार कराया था। उस दौर में सेठ हरकंठराय सोने और चांदी के बहुत बड़े व्यापारी थे, जिनका कारोबार भारत तक ही सीमित नहीं था बल्कि वे व्यापार के सिलसिले में जापान और चीन तक यात्राएं करते थे। देश-विदेश के दूर-दराज इलाकों से व्यापारी उनके पास लेनदेन और व्यापार के लिए आया करते थे। सेठ हरकंठराय जितने बड़े व्यापारी थे, उतने ही गहरे धार्मिक स्वभाव के व्यक्ति भी थे। इसी वजह से उन्होंने अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में भगवान राम और भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अटूट आस्था को भव्य रूप देने का फैसला किया।
यूनान से कारीगर बुलाकर चार साल तक कराई गई थी सोने की चित्रकारी
दुकान की दीवारों और छतों को सजाने के लिए सेठ हरकंठराय ने विशेष रूप से यूनान से उन कारीगरों को आमंत्रित किया था, जो सोने की स्याही से चित्रकारी करने में माहिर थे। इस प्रतिष्ठान के भीतर चित्रकारी का यह विशाल कार्य लगभग चार साल तक लगातार चलता रहा। कारीगर विदेशी थे, इसलिए उन्हें रामायण और कृष्णलीला के हर प्रसंग, पात्र और संवादों को विस्तार से समझाया जाता था। भारतीय पौराणिक आख्यानों को भली-भांति समझने के बाद उन कारीगरों ने एक-एक दृश्य को शुद्ध सोने की स्याही से दीवारों और छत पर उकेर दिया। सेठ के दृष्टिकोण में सोने की धातु से भी कहीं अधिक मूल्य उन दक्ष कारीगरों की कला और उनकी असाधारण लगन का था।
तीन हिस्सों में बंटी 100 फीट लंबी दुकान और 52 अवतारों का चित्रण
यह पूरी इमारत लगभग 100 फीट लंबी और करीब 20 फीट चौड़ी है, जिसे वास्तुशिल्प के लिहाज से तीन अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया है। दुकान के पहले हिस्से में भगवान श्री राम के जन्म से लेकर लंका दहन तक के रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंगों को चित्रित किया गया है। इसके दूसरे हिस्से में भगवान श्री गणेश के साथ-साथ विभिन्न देवी-देवताओं के 52 अवतारों की छवियां उकेरी गई हैं। इसी हिस्से में श्रवण कुमार द्वारा अपने वृद्ध और दृष्टिहीन माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थयात्रा कराने का मार्मिक दृश्य भी अंकित है। इसके तीसरे हिस्से में पूरी कृष्णलीला, कंस वध और महाभारत के भीषण युद्ध के वृत्तांतों को चित्रित किया गया है।
गोलाकार छत पर सजीव दिखता है महाभारत और बाललीला का इतिहास
इमारत के भीतर की छत गोलाकार स्वरूप में बनी हुई है। इस पूरी छत पर भगवान कृष्ण के जन्म से लेकर महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध तक का संपूर्ण घटनाक्रम कलात्मक चित्रों की एक व्यवस्थित श्रृंखला में नजर आता है। इनमें विवाह के बाद कंस द्वारा देवकी को रथ में बैठाकर ले जाने, मथुरा के कारागार में भगवान कृष्ण का प्राकट्य होने और पिता वासुदेव द्वारा नवजात कृष्ण को सूप में रखकर उफनती यमुना पार कराकर गोकुल पहुंचाने का दृश्य प्रमुखता से शामिल है। इसके अलावा कान्हा की माखन चोरी और बाललीलाओं को भी सोने की बारीक रेखाओं से सजाया गया है।
छठी पीढ़ी और ट्रस्ट के हाथों में ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण
वर्तमान समय में सेठ हरकंठराय पोदार की छठी पीढ़ी के प्रतिनिधि कुलदीप पोदार के अनुसार, इस ऐतिहासिक साळ की संपूर्ण देखरेख और प्रबंधन का कार्य शिवबक्स राय पोदार ट्रस्ट संभाल रहा है। शेखावाटी की समृद्ध कला और धार्मिक आस्था के इस अनूठे संगम को देखने के लिए हर साल भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी बड़ी संख्या में सैलानी पहुंचते हैं। ट्रस्ट द्वारा इसके रखरखाव और संरक्षण को ध्यान में रखते हुए आगंतुकों से एक निश्चित प्रवेश शुल्क लिया जाता है। लगभग दो सौ साल पहले तैयार की गई यह स्वर्णिम चित्रकारी आज भी आने वाले पर्यटकों को उस कालखंड के हुनरमंद कारीगरों की उत्कृष्ट शिल्पकला से रू-ब-रू कराती है।



















