स्मार्टफोन और कलाई घड़ी के मौजूदा दौर में समय देखना भले ही चुटकियों का काम बन चुका हो, लेकिन राजस्थान के मेवाड़ अंचल में आज भी काल गणना की एक बेहद प्राचीन व्यवस्था अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। उदयपुर के कई ऐतिहासिक मंदिरों में सदियों पुरानी जल घड़ी के जरिए दैनिक पूजा अर्चना और अनुष्ठानों का समय निर्धारित करने की परंपरा आज भी जिंदा है। सदियों पहले जब आधुनिक यांत्रिक घड़ियों का कोई वजूद नहीं था, तब देवालयों में अलग-अलग पहरों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए पानी और विशेष बर्तनों की मदद से वक्त का सटीक हिसाब रखा जाता था। यह व्यवस्था केवल समय देखने का जरिया भर नहीं थी, बल्कि मंदिर की संपूर्ण दिनचर्या और आध्यात्मिक अनुशासन का एक अनिवार्य अंग हुआ करती थी।
लकड़ी के संदूक, पीतल के बर्तन और तांबे की कटोरी का कमाल
इस पारंपरिक जल घड़ी की बनावट प्राचीन भारत की वैज्ञानिक सूझबूझ और व्यावहारिक समझ का एक बेमिसाल उदाहरण पेश करती है। इसे संचालित करने के लिए लकड़ी का एक खास संदूक या बॉक्स तैयार किया जाता है। इस लकड़ी के ढांचे के भीतर पीतल की एक बड़ी नाद या पात्र को रखा जाता है, जिसे पूरी तरह स्वच्छ जल से भर दिया जाता है। इस बड़े जलपात्र के भीतर तांबे की बनी एक हल्की और छोटी कटोरी को तैराया जाता है। कारीगरी की खूबी यह है कि तांबे की इस कटोरी के पेंदे में बेहद बारीक छेद किया जाता है। पानी इसी बारीक छेद के रास्ते से बहुत धीमी गति से कटोरी के भीतरी हिस्से में भरने लगता है।
कटोरी का डूबना और एक घटी पूरी होने पर घंटी की गूंज
जैसे ही तांबे की उस कटोरी में पानी पूरी तरह भर जाता है, वह भारी होकर पीतल के पात्र के तल में डूब जाती है। इस कटोरी के पानी में समाते ही यह स्पष्ट संकेत मिल जाता है कि काल गणना की एक निश्चित इकाई, जिसे पारंपरिक भाषा में घटी कहा जाता है, पूरी हो चुकी है। कटोरी डूबते ही मंदिर परिसर में मौजूद सेवक या पुजारी घंटी बजाकर इस बात की सूचना पूरे परिसर में फैलाते हैं। इस नियमित संकेत की सहायता से दिन और रात के विभिन्न पहरों का सटीक विभाजन किया जाता है। पहर बदलने की इस व्यवस्था से ही मंदिर के सेवादारों और दर्शनार्थियों को यह ज्ञात होता था कि अब आरती, भोग या अगले अनुष्ठान का समय आ चुका है।
पहरों में बंटा दिन और धार्मिक अनुष्ठानों का अनुशासन
प्राचीन भारतीय काल गणना के अनुसार पूरे दिन और रात को आठ पहरों में विभाजित किया जाता रहा है। मंदिरों में दैनिक सेवा, दर्शन, शयन और भोग का समय इन्हीं पहरों के क्रम पर आधारित रहता था। उदयपुर के मंदिरों में सुरक्षित यह जल घड़ी यह दर्शाती है कि पूर्वजों ने किस तरह तरल पदार्थों के प्रवाह और समय के तालमेल को विज्ञान और आस्था के साथ जोड़ा था। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के व्यापक प्रसार के बावजूद मेवाड़ की यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक थाती आज भी अपनी निरंतरता बनाए हुए है। नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के लिए पानी की बूंदों से चलने वाला यह पारंपरिक यंत्र आज भी गहरा विस्मय जगाता है।

















