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दीपावली पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी में मोलभाव न करने का संदेश, टोंक में कुम्हारों का हुआ साफा पहनाकर सम्मानराजस्थान
31 अक्तू॰ 2026, 2:25 pm (2 घंटे पहले)· 0

दीपावली पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी में मोलभाव न करने का संदेश, टोंक में कुम्हारों का हुआ साफा पहनाकर सम्मान

टोंक में नगर परिषद की पूर्व सभापति लक्ष्मी जैन और महिला प्रतिनिधिमंडल ने कुम्हार परिवारों को साफा पहनाकर सम्मानित किया तथा लोगों से बिना मोलभाव मिट्टी के दीये खरीदने की अपील की।

दीपावली के त्योहार को लेकर राजस्थान के टोंक जिले के बाजारों में रौनक पूरी तरह परवान पर है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ आह्वान को जमीन पर उतारने के मकसद से शहर में एक विशेष और प्रेरक पहल देखने को मिली। नगर परिषद की पूर्व सभापति लक्ष्मी जैन की अगुवाई में स्थानीय महिलाओं के एक समूह ने चाक पर पसीना बहाकर मिट्टी के दीपक तैयार करने वाले कुम्हार परिवारों के बीच पहुंचकर उनका आत्मीय स्वागत किया और उन्हें पारंपरिक राजस्थानी साफा पहनाकर सम्मानित किया।

शोरूम में हजारों खर्च और कुम्हार से चंद रुपयों के लिए सौदेबाजी

इस मौके पर लक्ष्मी जैन ने आम नागरिकों से दीपोत्सव के दौरान मिट्टी के दीपक खरीदते समय मोलभाव न करने की पुरजोर गुहार लगाई। उन्होंने समाज की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोग बड़े-बड़े मॉल, शोरूम और महंगे होटलों में बिना किसी हिचकिचाहट के हजारों रुपये खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं और वहां कभी कोई छूट के लिए बहस नहीं करता। इसके विपरीत, दिन-रात कड़ी धूप और हाड़-तोड़ मेहनत से मिट्टी को आकार देने वाले एक निर्धन कुम्हार से जब 100-200 रुपये के दीये खरीदने की बात आती है, तो लोग मोलतोल करने लगते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मिट्टी का दीया भले ही छोटा नजर आता हो, मगर उसके पीछे कुम्हार का अथक परिश्रम, पसीना और गहरी भावनाएं जुड़ी होती हैं जिनकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती।

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कारीगरों का बढ़ाया मान, बांटी फल और मिठाई

आयोजित सम्मान कार्यक्रम के तहत पूर्व सभापति के नेतृत्व में पहुंची महिलाओं ने कारीगरों और उनके परिजनों को राजस्थानी परंपरा के मुताबिक साफा बांधा तथा उपहार स्वरूप फल व मिठाइयां भेंट कीं। इस अप्रत्याशित सम्मान और अपनत्व भरे व्यवहार से कुम्हार परिवारों के चेहरों पर संतोष और गर्व की लहर दौड़ गई। स्थानीय कारीगरों ने इस कदम का स्वागत करते हुए बताया कि जब समाज उनके श्रम को मान्यता देता है, तो उन्हें अपनी पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक हस्तकला को निरंतर आगे बढ़ाने का हौसला मिलता है।

चाइनीज लाइटों के स्थान पर स्थानीय दीयों को प्राथमिकता

लक्ष्मी जैन ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कुम्हार के हाथ सिर्फ मिट्टी के बर्तन या दीये नहीं गढ़ते, बल्कि वे हमारे सदियों पुराने सांस्कृतिक ताने-बाने को भी जीवंत बनाए रखते हैं। इसलिए उनके पसीने की कद्र करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने टोंक के निवासियों से आह्वान किया कि इस पर्व पर बनावटी सजावट और चाइनीज लाइटों के बजाय माटी के दीयों को तरजीह दी जाए। स्थानीय कारीगरों से की गई खरीदारी से न केवल स्वदेशी परंपराएं मजबूत होंगी, बल्कि उन मेहनतकश परिवारों के घरों में भी वास्तविक खुशहाली और पर्व का उजाला पहुंच सकेगा। इस अभियान के बाद टोंक के स्थानीय बाजारों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति उत्साह का माहौल बन रहा है।

सवाल-जवाब

टोंक में कुम्हार परिवारों का सम्मान किसने किया?
नगर परिषद की पूर्व सभापति लक्ष्मी जैन के नेतृत्व में स्थानीय महिलाओं के प्रतिनिधिमंडल ने कुम्हार परिवारों का सम्मान किया।
कुम्हारों का सम्मान किस प्रकार किया गया?
कारीगरों को पारंपरिक राजस्थानी साफा पहनाया गया और उनका हौसला बढ़ाने के लिए फल व मिठाइयां भेंट की गईं।
लक्ष्मी जैन ने लोगों से क्या मार्मिक अपील की?
उन्होंने लोगों से अपील की कि दीपावली पर मिट्टी के दीपक खरीदते समय गरीब कुम्हारों से 100-200 रुपये के लिए मोलभाव न करें।
इस पहल में किस राष्ट्रीय संदेश का उल्लेख किया गया?
इस पहल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ संदेश को धरातल पर आगे बढ़ाने का उल्लेख किया गया।
लक्ष्मी जैन ने चाइनीज लाइटों के स्थान पर क्या अपनाने का सुझाव दिया?
उन्होंने नागरिकों से कृत्रिम सजावट और चाइनीज लाइटों के बजाय स्थानीय मिट्टी के दीपकों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया।
सम्मान पाकर स्थानीय कारीगरों की क्या प्रतिक्रिया रही?
कारीगरों ने इस पहल की सराहना की और कहा कि इससे उन्हें अपनी पारंपरिक कला को निरंतर आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

दीपावली पर कुम्हार भाइयों से दीये खरीदते वक्त सौदेबाजी सचमुच दिल दुखाती है। पिछले साल जब मैं गाँव गया था, तो देखा कि कैसे वे घंटों धूप में पसीना बहाकर इन्हें बनाते हैं और फिर लोग चंद रुपयों के लिए मोलभाव करते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, एकदम सही कहा आपने। बड़े मॉल्स में लोग बिना झिझक हजारों लुटा देते हैं, पर इन मेहनतकश कुम्हारों से सौदेबाजी करने में ज़रा भी शर्म नहीं आती।

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