जोधपुर में रहने वाली छोटी उम्र की मृदुल ने अपनी रचनात्मकता के दम पर यह साबित कर दिया है कि लगन और सोच से साधारण चीजें भी अनमोल बन सकती हैं। घर में अक्सर बेकार समझकर फेंक दी जाने वाली वस्तुओं को वह खूबसूरती से कलाकृतियों में ढाल रही हैं। मात्र 13 साल की उम्र में आठवीं कक्षा में अध्ययनरत मृदुल ने अपनी कल्पनाशीलता और कला प्रेम से हर किसी को हैरान कर दिया है।
कोविड-19 के दिनों से हुई थी शुरुआत
यह दिलचस्प सफर उस समय शुरू हुआ जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के कारण अपने घरों में बंद थी और लोगों के पास काफी खाली समय था। जहां अधिकांश लोग इस दौरान अपना समय मोबाइल फोन पर व्यतीत कर रहे थे, वहीं मृदुल के लिए यह समय एक नई रचनात्मक शुरुआत का जरिया बन गया। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते वक्त उनके सामने आने वाले पेंटिंग और डीआईवाई वीडियो ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इन वीडियो से प्रेरणा लेकर उन्होंने घर पर ही अपनी कलात्मक यात्रा का श्रीगणेश किया।
विभिन्न माध्यमों और कलाओं में आजमाइश
वक्त के साथ मृदुल का यह घरेलू शौक उनकी एक अलग पहचान बनता चला गया। उन्होंने कागज पर सुंदर पेंटिंग्स उकेरने के साथ-साथ कैनवास पर भी अपनी कल्पना को रंगों के जरिए जीवंत किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्लास्टिक के पाइप्स का रचनात्मक उपयोग कर आकर्षक मंडाला आर्ट तैयार की और पारंपरिक लिप्पन कला में भी अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने डिजिटल आर्टवर्क के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया है और इस कम उम्र में लगातार नए प्रयोग करने का उनका उत्साह सराहनीय है.
बेकार वस्तुओं में नया जीवन तलाशना
मृदुल का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि संसार में कोई भी वस्तु पूरी तरह से बेकार नहीं होती है, बशर्ते उसे देखने का दृष्टिकोण सकारात्मक हो। पेंसिल की टूटी हुई लेड, बची हुई स्याही, बेकार पाइप या फिर साधारण खाली बोतल, वह हर एक चीज में अपनी मेहनत और कल्पना के बल पर नया सौंदर्य तलाश लेती हैं। उनका यह सफर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि खाली समय का सदुपयोग सही दिशा में किया जाए, तो बाल्यकाल में भी असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। महामारी के दौर में घर की चारदीवारी के भीतर जन्मा यह छोटा सा प्रयास आज उनकी पहचान बन चुका है।



















