जयपुर में राजस्थान के 303 निकायों के चुनाव के सिलसिले में नामांकन प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है। भारी आंतरिक कलह और असंतोष के माहौल के बीच भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिए हैं। हालांकि इस प्रक्रिया के बाद बागी तेवर खुलकर सामने आ गए हैं। राजधानी जयपुर सहित पूरे प्रदेश में दोनों ही दलों के हजारों टिकट दावेदारों ने बगावत का रास्ता अपनाते हुए अपने नामांकन पत्र दाखिल कर दिए हैं। अब इन बागी नेताओं को शांत करना और चुनाव मैदान से हटाना दोनों दलों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। आगामी 3 सितंबर को नाम वापस लेने की अंतिम तिथि तय की गई है। ऐसे में अगले दो दिनों के भीतर इन असंतुष्ट नेताओं को मनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है और इस दिशा में काम भी तेजी से शुरू हो चुका है।
रूठों को मनाने के लिए बड़े नेताओं की फौज
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अपने नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए पार्टी के कद्दावर और प्रभावशाली नेताओं को बागी उम्मीदवारों के घर-घर भेजेंगी ताकि उनकी मान-मनोव्वल की जा सके। इस बार चुनावी मैदान में बागियों की संख्या पिछले चुनावों की तुलना में काफी अधिक बताई जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मोर्चे पर दोनों ही प्रमुख दल लगभग एक जैसी ही कार्ययोजना पर आगे बढ़ रहे हैं। टिकट चाहने वाले जिन नेताओं के माध्यम से अपनी उम्मीदवारी के लिए पैरवी कर रहे थे, अब उन्हीं खास नेताओं को उन बागी उम्मीदवारों को समझाने और मैदान से पीछे हटाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
मान-मनोव्वल और दबाव का त्रिस्तरीय फॉर्मूला
बागी उम्मीदवारों को आधिकारिक प्रत्याशी के समर्थन में अपना नाम वापस लेने के लिए मजबूर करने हेतु मुख्य रूप से तीन स्तरों पर दबाव और समझाइश के प्रयास किए जा रहे हैं। पहले चरण में पार्टी के भीतर बागी नेता को जिस व्यक्ति का करीबी माना जाता है, उसी के जरिए उसे मनाने का जिम्मा दिया जा रहा है। दूसरे चरण में संबंधित वार्ड के पार्टी से जुड़े प्रभावशाली स्थानीय नागरिकों और नुमाइंदों के माध्यम से समझाइश की जा रही है। तीसरे चरण के तहत बागी प्रत्याशी पर सामाजिक स्तर पर भी दबाव बनवाया जा रहा है ताकि पार्टी के वोट बैंक और चुनावी समीकरण को कोई नुकसान न पहुंचे। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मामला अत्यधिक पेचीदा है और बागी उम्मीदवार खासा असरदार है, वहां उन्हें भविष्य में स्थानीय स्तर पर किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक पद या अन्य लाभ का भरोसा भी दिया जा रहा है।
दबाव की राजनीति और टिकट बंटवारे की पेचीदगियां
पार्टी सूत्रों का कहना है कि कई बागी उम्मीदवार केवल इसलिए चुनावी मैदान में टिके हुए हैं ताकि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी हो सकें, चाहे वह संगठन में किसी पद के रूप में हो या फिर किसी सरकारी नियुक्ति के जरिए। यह पूरी बगावत असल में दबाव की राजनीति का एक अहम हिस्सा है। इसी सोची-समझी रणनीति के तहत इन लोगों ने चुनाव की घोषणा से पहले ही चुनावी माहौल तैयार करना शुरू कर दिया था। इसके विपरीत, कुछ बागी ऐसे भी हैं जो वास्तव में टिकट के वास्तविक हकदार थे, लेकिन मजबूत राजनीतिक पहुंच न होने के कारण वे टिकट की दौड़ में पिछड़ गए। इसके बावजूद वे पार्टी को अपना आधार और वजूद दिखाना चाहते हैं, जिस वजह से वे अभी भी मैदान में डटे हुए हैं।
रणनीति और दमदार बागियों की चुनौती
इस बार टिकट वितरण से पहले भारी बगावत की आशंका के चलते ही उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करने में सावधानी बरती गई थी। लेकिन ये दावेदार पार्टियों की इस चाल को अच्छी तरह भांप चुके थे, इसलिए उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से पहले ही अपने पर्चे दाखिल कर दिए थे। अब राजनीतिक गेंद पूरी तरह से पार्टियों के पाले में आ चुकी है कि वे इन बागी चेहरों को कितना और कैसे साध पाती हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि भले ही कुछ बागी ऐसे हैं जिनका चुनावी मैदान में कोई खास प्रभाव नहीं है, लेकिन कई बागी ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ के दम पर दोनों ही मुख्य दलों के होश उड़ा रखे हैं। शुरुआती दौर में पार्टियों का मुख्य ध्यान सिर्फ और सिर्फ उन्हीं बागियों पर है जो राजनीतिक रूप से काफी दमखम रखते हैं।





















