बीकानेर में सोमवार की शाम को जूनागढ़ किले की प्राचीर ने एक बार फिर रियासतकालीन और 500 वर्ष से अधिक पुरानी परंपरा का जीवंत नजारा देखा। बैंड की धुनों पर गूंजते राजस्थानी लोकगीत, सजे-धजे ऊंट, शाही निशान और तलवारों से लैस सुरक्षाकर्मियों के कड़े घेरे के बीच आभूषणों से सुसज्जित तीज माता की प्रतिमा जैसे ही किले के द्वार से बाहर आई, सारा वातावरण भक्ति और उल्लास से सराबोर हो गया। कजली तीज के पावन पर्व पर निकाली गई इस पारंपरिक शाही सवारी को देखने के लिए शहरभर से लोग पहुंचे थे।
शाम के समय यह भव्य सवारी जूनागढ़ किले के मुख्य द्वार से आगे बढ़ी और सादूल सर्किल तक पहुंची, जिसके बाद वह अपने तय मार्ग से वापस जूनागढ़ लौट आई। इस पूरे मार्ग पर बड़ी संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं ने तीज माता के दर्शन किए और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। इस पारंपरिक आयोजन को लेकर महिलाओं और बच्चों में एक अलग ही उत्साह और उमंग का माहौल देखा गया। तीज माता की एक झलक पाने की चाहत में जूनागढ़ से सादूल सर्किल तक सड़क के दोनों किनारों पर भारी जनसमूह उमड़ पड़ा। इस शाही सवारी ने जहां एक तरफ बीकानेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया, वहीं दूसरी तरफ नई पीढ़ी को शहर की इस समृद्ध लोक परंपरा से गहराई से परिचित कराने का काम भी किया।
शाही पूजन और पारंपरिक लवाजमे के साथ शुरुआत
इस शाही सवारी के रवाना होने से ठीक पहले जूनागढ़ किले के भीतर राज पंडित गंगाधर व्यास ने पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तीज माता की विशेष पूजा संपन्न कराई। पूजा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद तीज माता की प्रतिमा को अत्यंत बेशकीमती आभूषणों और मनमोहक पारंपरिक शृंगार से सजाया गया और फिर उन्हें आदर के साथ पालकी में विराजमान किया गया। इसके बाद प्राचीन राजसी परंपराओं के पूरे अनुरूप शाही निशान, सजे-धजे ऊंट, सुरीले बैंड और हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के दल के साथ सवारी को आगे के लिए रवाना किया गया।
इस भव्य आयोजन में शामिल कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से राजस्थानी लोक संस्कृति की बेहद मनमोहक और अनूठी झलक प्रस्तुत की। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीतों की धुनों पर नृत्य प्रस्तुत किया। इसके साथ ही, बैंड पर गूंजते भक्तिभाव से भरे भजनों और लोकगीतों की स्वरलहरियों ने पूरे वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय बना दिया। पंचरंगी साफा धारण किए हुए पूर्व राजपरिवार के सदस्य भी इस शाही सवारी में विशेष रूप से शामिल हुए। इस दौरान शाही लवाजमे के साथ जब तीज माता की सवारी आगे बढ़ी, तो मार्ग के दोनों ओर खड़े लोगों ने अपने मोबाइल फोन के जरिए इस ऐतिहासिक पल को तस्वीरों और वीडियो में कैद किया।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम और 500 साल पुरानी रियासतकालीन परंपरा
तीज माता के अलौकिक दर्शन करने की लालसा में जूनागढ़ किले से लेकर सादूल सर्किल तक रास्ते में जगह-जगह लोगों का तांता लगा रहा। शहर के कई परिवार अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बनने पहुंचे थे। भारी भीड़ और जनसैलाब को ध्यान में रखते हुए स्थानीय पुलिस प्रशासन की ओर से सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए थे। पूरे सवारी मार्ग पर जगह-जगह पुलिसकर्मी मुस्तैदी से तैनात रहे और यातायात व्यवस्था को सुचारू रूप से नियंत्रित किया गया। कड़े सुरक्षा घेरे के बीच यह सवारी अपने निर्धारित मार्ग से होते हुए सकुशल वापस जूनागढ़ किले में आकर संपन्न हुई।
राज पंडित गंगाधर व्यास ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि तीज माता की यह शाही सवारी बीकानेर की प्राचीन रियासतकालीन परंपरा का एक अहम हिस्सा रही है। यह अनूठी परंपरा पिछले 500 वर्षों से भी अधिक समय से निरंतर चली आ रही है। पुराने समय में राजपरिवार के दौर से ही तीज माता का विशेष शृंगार करवाकर शाही लवाजमे के साथ पूरे नगर का भ्रमण करवाया जाता रहा है। आज के समय में भी इस प्राचीन परंपरा को पूरी श्रद्धा और उसी राजसी गरिमा के साथ निभाया जा रहा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, तीज माता के दर्शन करने मात्र से ही परिवार में सुख और समृद्धि का वास होता है। इस खास दिन पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। महिलाओं ने पूरे दिन निर्जला व्रत रखा और शाम को पूजा-अर्चना संपन्न करने के बाद पारंपरिक सत्तू खाकर अपने व्रत का पारण किया।



















