खेती की पूरी बुनियाद जमीन की उर्वरक क्षमता पर टिकी होती है, क्योंकि यदि खेत की मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर और जीवंत होगी तो फसलों का उत्पादन भी भरपूर मिलेगा। मौजूदा दौर में अधिक पैदावार की होड़ में रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों का अनियंत्रित उपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही कृषि के तौर-तरीकों में आए बदलावों ने मिट्टी के प्राकृतिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। कई इलाकों में किसान हर मौसम में एक ही तरह की फसल की बुवाई कर रहे हैं और खेतों की बार-बार जरूरत से ज्यादा जुताई कर रहे हैं, जिससे जमीन की स्वाभाविक उपजाऊ शक्ति लगातार घट रही है। इस गिरावट का सीधा और नकारात्मक असर फसलों की पैदावार और किसानों की शुद्ध कमाई पर देखने को मिल रहा है। इस संकट से उबरने के लिए किसानों को अपनी पारंपरिक समझ के साथ आधुनिक कृषि विज्ञान के नियमों का तालमेल बैठाना होगा।
जांच के आधार पर ही करें पोषण प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञ रामनिवास शर्मा का कहना है कि किसी भी खेत की उपजाऊ क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए सबसे बुनियादी कदम नियमित मिट्टी परीक्षण करवाना है। खेत की मिट्टी की वैज्ञानिक जांच कराने से यह साफ पता चल जाता है कि उसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और दूसरे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व किस मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके अलावा परीक्षण से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जमीन में किस विशेष तत्व की कमी है, जिससे अनावश्यक खादों के छिड़काव से बचा जा सकता है।
किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या सरकारी मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में जाकर अपने खेत की मिट्टी के नमूने की जांच करवा सकते हैं। प्रयोगशाला से मिलने वाली जांच रिपोर्ट के अनुसार ही फसलों में खाद और पोषक तत्वों का प्रयोग करना चाहिए। इस वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने से खेती में रासायनिक खादों पर होने वाला फालतू खर्च काफी घट जाता है और फसल को उसकी वास्तविक जरूरत के मुताबिक संतुलित पोषण मिल पाता है।
जैविक खाद से सुधारें मिट्टी की भौतिक संरचना
जमीन को दोबारा सेहतमंद बनाने में देशी और जैविक खादों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। किसानों को अपने खेतों में केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद, कंपोस्ट और केंचुआ खाद यानी वर्मी कंपोस्ट का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। इन जैविक खादों के नियमित प्रयोग से जमीन में कार्बनिक और जैविक पदार्थों का स्तर बढ़ता है, जिससे मिट्टी की आंतरिक बनावट और संरचना में जबरदस्त सुधार आता है।
जैविक खाद मिट्टी की नमी सोखने और पानी को लंबे समय तक रोके रखने की क्षमता को भी काफी बढ़ा देती है, जिससे सूखे के समय भी फसलों को सहारा मिलता है। जो किसान प्राकृतिक खेती की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वे बीजामृत, जीवामृत और घनजीवामृत जैसे देसी जैविक घोलों और मिश्रणों का प्रयोग करके भी खेत में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
फसल चक्र और हरी खाद की ताकत
खेत में हर साल और हर सीजन में एक ही प्रकार की फसल उगाने की आदत जमीन के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होती है, क्योंकि इससे मिट्टी से कुछ चुनिंदा पोषक तत्व पूरी तरह खत्म होने लगते हैं। इस समस्या का सबसे सटीक समाधान वैज्ञानिक फसल चक्र को अपनाना है। किसानों को धान और गेहूं जैसी मुख्य अनाजी फसलों के बीच में दलहनी फसलों को जरूर शामिल करना चाहिए। इनमें मूंग, उड़द, चना, मटर और बरसीम जैसी फसलें सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं।
दलहनी फसलों की जड़ों में राइजोबियम नामक विशेष जीवाणु पाए जाते हैं, जो हवा में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर उसे प्राकृतिक रूप से मिट्टी में स्थिर कर देते हैं। इससे जमीन को बिना किसी रासायनिक खाद के मुफ्त में नाइट्रोजन मिल जाती है। इसके साथ ही किसान खेत में ढैंचा की बुवाई करके हरी खाद तैयार कर सकते हैं। जब ढैंचा की फसल में फूल आने वाले हों, उससे ठीक पहले उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा देना चाहिए। ऐसा करने से जमीन में भारी मात्रा में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन का समावेश होता है।
सिंचाई का संतुलन और जल निकासी
मिट्टी की ऊपरी परत की गुणवत्ता को सुरक्षित रखने के लिए खेत में जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। खेत में जरूरत से ज्यादा पानी भर देने या बेहिसाब सिंचाई करने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व पानी के साथ घुलकर जमीन की निचली सतहों में चले जाते हैं, जहां तक पौधों की जड़ें नहीं पहुंच पाती हैं। वहीं दूसरी तरफ फसल को आवश्यकता से कम पानी मिलने पर पौधों का विकास रुक जाता है। इसलिए हमेशा मिट्टी की नमी और फसल की अवस्था के अनुसार ही संतुलित सिंचाई करनी चाहिए। साथ ही खेत में पानी के निकास का उचित प्रबंध होना भी जरूरी है, ताकि जलभराव की स्थिति में मिट्टी के अंदर हवा का संचार बाधित न हो।
फसल अवशेष प्रबंधन और जुताई पर नियंत्रण
फसल की कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों और पराली को आग के हवाले करने से बचना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ रामनिवास शर्मा के अनुसार फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें खेत में ही सड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए या फिर जमीन पर मल्चिंग की तरह फैला देना चाहिए। जब यह अवशेष सड़ते हैं तो वे जमीन में कार्बनिक खाद का काम करते हैं और मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा को बढ़ाते हैं।
किसानों को अपने खेतों की बार-बार बहुत गहरी जुताई करने से भी परहेज करना चाहिए। जरूरत से ज्यादा गहरी जुताई करने से मिट्टी की प्राकृतिक बनावट बिखर जाती है और जमीन के भीतर रहने वाले मित्र कीट व लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। जब किसान नियमित रूप से मिट्टी की जांच करवाएंगे, जैविक खादों को प्राथमिकता देंगे, फसल चक्र अपनाएंगे और उचित सिंचाई के साथ अवशेषों का प्रबंधन करेंगे, तभी जमीन की उत्पादकता पीढ़ियों तक बरकरार रहेगी और खेती की लागत में कमी आएगी।



















