दीपावली का त्योहार रोशनी, उत्साह और उमंग का प्रतीक है, जिसमें घरों को दीपों से रोशन करने की परंपरा सदियों पुरानी है। राजस्थान के करौली जिले में भी दीवाली के पावन अवसर पर मिट्टी के दीयों से घरों और मंदिरों को सजाया जाता है। हालांकि इस बार त्योहार के मौके पर एक खास किस्म का मिट्टी का दीया लोगों के बीच खासी चर्चा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इस अनूठे दीये की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें सिर्फ एक बार ही घी भरना पड़ता है और इसके बाद यह पूरी रात लगातार जलता रहता है। करौली के स्थानीय कुम्हार परिवारों द्वारा दीवाली से काफी हफ़्ते पहले ही इन विशेष दीपकों के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाता है। पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए इन दीयों को पूरी तन्मयता से गढ़ा जाता है।
कारीगरी का यह हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है जिसमें मिट्टी को सही आकार देकर सुखाया जाता है और फिर उसे भट्ठी में पक्का करके मजबूत बनाया जाता है। इन दीयों की बनावट खास तौर पर इस तरह से डिजाइन की जाती है कि उसके भीतर अधिक मात्रा में घी समा सके और उसकी बाती बिना बुझे लंबे वक्त तक प्रकाश फैलाती रहे।
दीवाली की रात घरों में माता लक्ष्मी के पूजन के दौरान दीये प्रज्वलित करने का विशेष धार्मिक विधान है। करौली के तमाम परिवार लक्ष्मी पूजा के लिए इन विशेष मिट्टी के दीयों की खरीदारी करते हैं। ऐसी गहरी मान्यता है कि दीवाली की रात घर में अखंड प्रकार के ये दीये जलाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इसी आस्था के चलते त्योहार के दिनों में इनकी मांग में जबरदस्त उछाल देखा जाता है।
कुम्हार समुदायों के लिए दीवाली का यह सीजन बेहद महत्वपूर्ण और व्यस्तता भरा होता है। त्योहार के आगमन से पहले सामान्य दीयों के अलावा इन विशेष डिजाइनों और आकारों वाले दीपकों को भी बड़ी मेहनत से ढाला जाता है। स्थानीय बाजारों में इन दीयों की दुकानें सजती हैं और उपभोक्ता अपनी जरूरत के मुताबिक इनकी खरीदारी करते हैं.
मिट्टी के ये दीये केवल दीवाली की सजावट भर का साधन नहीं हैं, बल्कि यह पारंपरिक कुम्हारों की आजीविका और उनकी प्राचीन कला का एक मजबूत आधार भी हैं। वक्त के साथ बाजार में रंग-बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइटों और चीनी झालरों की भरमार बढ़ गई है, इसके बावजूद दीवाली पर मिट्टी के दीयों का क्रेज और मांग आज भी कम नहीं हुई है। यही कारण है कि कुम्हार परिवार त्योहार के इस सीजन में बड़े पैमाने पर दीये तैयार करते हैं।
इन दीपकों की अनूठी बनावट और उनके धार्मिक महत्व के कारण करौली वासी दीवाली की पूजा के लिए इन्हें प्राथमिकता देते हैं। आज के आधुनिक दौर में जब हर तरफ कृत्रिम और बिजली की रोशनी का बोलबाला है, तब मिट्टी का यह पारंपरिक दीया हमारी प्राचीन संस्कृति और विरासत को पूरी शान से जीवंत रखे हुए है।



















