सीकर जिले के खंडेला स्थित ब्रह्मपुरी में सुशोभित बांके बिहारी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लगभग 600 साल पुरानी कृष्ण भक्ति की एक विलक्षण और ऐतिहासिक गाथा को अपने अंदर संजोए हुए है। इस पवित्र धाम में विराजी भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्रतिमा का सीधा संबंध प्रसिद्ध भक्त करमैती बाई के जीवन और उनकी अनन्य साधना से है। हर साल जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इस प्राचीन मंदिर में होने वाले विशेष अनुष्ठान और उत्सव इस स्थान की पुरानी परंपराओं और जनआस्था को और अधिक जीवंत तथा खास बना देते हैं।
जन्माष्टमी पर 108 जड़ी-बूटियों से होता है अभिषेक
मंदिर के पुजारी बिहारी लाल पारीक के अनुसार, जन्माष्टमी के पवित्र दिन पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना दिन में दो बार संपन्न होती है। पर्व की सुबह सबसे पहले पूरे मंदिर परिसर को आम के पत्तों और कंडील की डालियों से अत्यंत आकर्षक एवं मनमोहक तरीके से सजाया जाता है। इसके पश्चात भगवान की प्रतिमा का कुल 108 विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियों के मिश्रण से भव्य अभिषेक किया जाता है। यह अनूठा अभिषेक लगभग ढाई से तीन घंटे की लंबी अवधि तक चलता है, जिसके पूर्ण होने के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया जाता है।
मध्य रात्रि में जन्मोत्सव और गूंजते जयकारे
जैसे-जैसे रात गहरी होती जाती है, मंदिर परिसर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की तैयारियां अपने चरम पर पहुंच जाती हैं। ठीक रात के 12 बजते ही भगवान श्रीकृष्ण के प्रकट होने के पावन अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर में गूंजती घंटियों की आवाज और श्रद्धालुओं के जयकारों के बीच पूरे हर्षोल्लास के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। हालांकि इस मंदिर का आकर्षण केवल जन्माष्टमी का पर्व ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे जुड़ी वह प्राचीन और रहस्यमयी कथा है जो यहां स्थापित श्रीकृष्ण की प्रतिमा को करमैती बाई की अनन्य भक्ति से जोड़ती है।
श्रीनाभाजी के भक्तमाल ग्रंथ में मिलता है उल्लेख
भक्त शिरोमणि करमैती बाई की साधना और भक्ति का विस्तृत उल्लेख श्रीनाभाजी द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ भक्तमाल में देखने को मिलता है। इस ग्रंथ की एक विशेष पंक्ति - कठिन काल कलियुग में, करमैती निष्कलंक रही - उनकी कृष्ण भक्ति की गहराई और पवित्रता को भली-भांति दर्शाती है। प्राप्त विवरण के अनुसार, खंडेला की ब्रह्मपुरी में जन्मी करमैती बाई बचपन के शुरुआती दिनों से ही भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्त थीं। जब उनकी आयु मात्र 12 वर्ष की हुई, तब उनका विवाह सांगानेर के एक जोशी परिवार में तय कर दिया गया, परंतु गौने की पहली ही रात उन्होंने सांसारिक जीवन का मोह त्यागकर वृंदावन की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।
पैदल वृंदावन यात्रा और कठिन तपस्या
कहा जाता है कि करमैती बाई अन्य तीर्थयात्रियों के साथ पैदल ही चलकर वृंदावन पहुंचीं और पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में लीन हो गईं। भक्तमाल की कथा के अनुसार उन्होंने वृंदावन में 18 दिनों तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए अत्यंत कठिन तपस्या की। उनकी इस कठिन साधना से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने एक संत के रूप में उनके समक्ष प्रकट होकर अपने हाथों से उन्हें भोजन कराया। जब करमैती बाई के वृंदावन पहुंचने की खबर उनके पिता और खंडेला के शेखावत राजा के पुरोहित परशुरामजी को मिली, तो वे अपनी पुत्री को वापस घर लाने के लिए वृंदावन पहुंचे।
यमुना नदी से प्रकट हुई श्रीकृष्ण की प्रतिमा
करमैती बाई ने अपने पिता के साथ घर लौटने से पूरी तरह इनकार कर दिया। जब उनके पिता ने यह कहा कि वे खाली हाथ वापस नहीं लौट सकते, तब करमैती बाई ने यमुना नदी से भगवान श्रीकृष्ण की एक प्रतिमा निकालकर उन्हें सौंप दी और साथ ही उन्हें कृष्ण भक्ति का सच्चा उपदेश दिया। परशुरामजी उस पवित्र प्रतिमा को लेकर खंडेला वापस आए और ब्रह्मपुरी में उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की। ऐसी गहरी मान्यता है कि आज बांके बिहारी मंदिर में जिस प्रतिमा की पूजा की जाती है, वह वही प्राचीन प्रतिमा है जिसे स्थापित हुए लगभग 600 वर्ष बीत चुके हैं। प्रतिमा मिलने के बाद पुरोहित परशुरामजी का जीवन भी पूरी तरह बदल गया और वे भी कृष्ण भक्ति में रम गए।
शेखावत राजा का वृंदावन आगमन और वैराग्य
यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि इसके आगे का अध्याय भी उतना ही प्रेरणादायक है। जब खंडेला के शेखावत राजा को करमैती बाई की अनन्य भक्ति के बारे में जानकारी मिली, तो वे भी उनसे मिलने के लिए विशेष रूप से वृंदावन पहुंचे। वहां राजा को करमैती बाई यमुना नदी के किनारे भगवान श्रीकृष्ण के वियोग में अश्रु बहाते हुए मिलीं। उनकी ऐसी गाढ़ी भक्ति और प्रेम को देखकर राजा का हृदय भी अंदर तक भाव-विभोर हो गया। राजा ने ब्रह्मकुंड के समीप करमैती बाई के रहने के लिए एक कुटी का निर्माण करवाया और खंडेला वापस लौटने के पश्चात उन्होंने स्वयं भी अपना जीवन कृष्ण भक्ति को समर्पित कर दिया।



















