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ढाई सौ साल पुराना सीकर का विजय गणेश मंदिर, रियासतों की जंग और तोप के गोलों को बेअसर करने की अनूठी कहानीराजस्थान
13 सित॰ 2026, 7:00 am (1 घंटे पहले)· 0

ढाई सौ साल पुराना सीकर का विजय गणेश मंदिर, रियासतों की जंग और तोप के गोलों को बेअसर करने की अनूठी कहानी

सीकर का विजय गणेश मंदिर करीब 250 साल से अधिक पुराना है और इसका इतिहास रियासतों के दौर की लड़ाइयों से जुड़ा है। यहां स्थापित मिट्टी की मूर्ति पर तोप के गोलों का असर नहीं हुआ था और यह पानी में भी नहीं गलती है।

सीकर के फतेहपुरी गेट पर स्थित विजय गणेश मंदिर का इतिहास स्थानीय रियासतों के संघर्ष और चमत्कारी कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह प्राचीन मंदिर ढाई सौ साल से भी अधिक पुराना माना जाता है और इसकी स्थापना की दास्तान युद्ध तथा आस्था के अनूठे मेल को दर्शाती है। यह मूर्ति अपनी ऐतिहासिक यात्रा के दौरान पाटोदा और कासली से होते हुए सीकर पहुंची थी, जिसके चलते इसे तीन अलग-अलग रियासतों का सफर तय करने वाली प्रतिमा के रूप में भी याद किया जाता है।

वर्ष 1840 का रियासती संघर्ष

इस अद्भुत प्रतिमा के इतिहास का सबसे दिलचस्प अध्याय वर्ष 1840 के आसपास का है। उस समय सीकर की कमान राव देवी सिंह के हाथों में थी, जबकि कासली क्षेत्र पर पूरणमल का प्रभाव था। इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार पूरणमल अपने समय का एक बेहद शक्तिशाली शासक था जिसने राव देवी सिंह के कई दिग्गज योद्धाओं को रणक्षेत्र में धूल चटाई थी। वह अक्सर नानी दरवाजे पर आकर भाला पटकता था और राव देवी सिंह को खुलेआम युद्ध की चुनौती देता था, जिसके परिणामस्वरूप दोनों रियासतों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था।

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बातचीत की कोशिशें और युद्ध की शुरुआत

मामले को शांति से हल करने के लिए राव देवी सिंह ने शुरुआत में संवाद का रास्ता चुना, लेकिन बात बन नहीं पाई। इसके बाद उन्होंने अलवर नरेश प्रताप सिंह को मध्यस्थता के लिए आगे आने को कहा जो पूरणमल के मौसेरे भाई थे। जब कूटनीतिक प्रयास भी विफल हो गए तब सीकर की सेना ने कासली पर धावा बोल दिया। इसी सैन्य अभियान के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने इस स्थल को हमेशा के लिए रहस्य और श्रद्धा के केंद्र में ला खड़ा किया। कासली पर दागे जाने वाले तोप के गोले पूरी तरह बेअसर साबित हुए और युद्ध स्थल पर मौजूद लोग इस करिश्मे को देखकर हैरान रह गए।

तोप के गोलों के बेअसर होने का रहस्य

जब इन तोप के गोलों के असरहीन रहने का कारण खंगाला गया तब वहां स्थापित विघ्न हरण गणेशजी की प्रतिमा की चर्चा चारों तरफ फैल गई। ऐसी गहरी मान्यता थी कि भगवान गणेश की यही अलौकिक मूर्ति कासली को हर बाहरी आक्रमण और संकट से महफूज रख रही थी। इस खुलासे के बाद पंडितों के मार्गदर्शन में राव देवी सिंह ने रणभूमि में ही घुटनों के बल बैठकर गणेशजी की आराधना की। उन्होंने विजयश्री का आशीर्वाद मांगा और नए सिरे से युद्ध आरंभ किया, जिसके बाद सीकर की सेना को निर्णायक जीत मिली और कासली रियासत का सीकर में विलय हो गया।

फतेहपुरी गेट पर स्थापना और विजय गणेश नाम

युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद गणेशजी की इसी प्रतिमा को सीकर लाया गया और फतेहपुरी गेट के नजदीक स्थापित कर दिया गया। तभी से इन भगवान को विजय गणेश के नाम से पूजा जाने लगा। इस मूर्ति की सबसे अनोखा पहलू यह है कि मिट्टी की बनी होने के बावजूद यह पानी में गलती नहीं है। ऐसा बताया जाता है कि सीकर में स्थापना के पश्चात बरसात के मौसम में जब मंदिर परिसर में जलभराव हुआ, तब यह प्रतिमा कई बार पूरी तरह पानी में डूब गई थी, परंतु इसे खरोंच तक नहीं आई। हालांकि अब इस मूर्ति को जलभराव से बचाने के पुख्ता इंतजाम कर लिए गए हैं।

विजय गणेशजी की यह यात्रा कासली से भी पुराने काल की मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार यह प्रतिमा मूल रूप से पाटोदा में थी, जिसे प्राचीन समय में पाटकद्वव कहा जाता था। पाटोदा में भी इस मूर्ति से जुड़े कई चमत्कारी किस्से प्रचलित हैं, जिसके बाद यह कासली पहुंची और विघ्न हरण गणेश के रूप में पूजी जाने लगी। पाटोदा से यह प्रतिमा कब और किस प्रकार लाई गई थी, इसका कोई ठोस या प्रमाणित इतिहास लिखित रूप में उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण इसके ढाई सौ वर्ष से भी अधिक प्राचीन होने का अनुमान लगाया जाता है.

गणेश चतुर्थी पर भव्य आयोजन

गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर विजय गणेश मंदिर में एक बार फिर भारी उत्साह और आस्था के साथ विशेष आयोजनों की तैयारी की गई है। आगामी 13 सितंबर को सिंजारा पर्व के मौके पर शाम 5:15 बजे भगवान गणेशजी को मेहंदी अर्पित की जाएगी और यही मेहंदी श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में वितरित होगी। इसके बाद शाम 7 बजे छप्पन भोग की आरती का भव्य कार्यक्रम संपन्न होगा। अगले दिन यानी 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के मुख्य पर्व पर महाआरती, एक भव्य शोभायात्रा और रात्रि के समय भजन-जागरण का आयोजन किया जाएगा।

सवाल-जवाब

विजय गणेश मंदिर कहाँ स्थित है?
विजय गणेश मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में फतेहपुरी गेट के पास स्थित है।
यह मंदिर कितने साल पुराना है?
यह मंदिर करीब 250 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है।
गणेशजी का नाम विजय गणेश कैसे पड़ा?
वर्ष 1840 के युद्ध में सीकर की जीत के बाद इस प्रतिमा को सीकर लाया गया और तभी से इन्हें विजय गणेश कहा जाने लगा।
इस मूर्ति की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
मिट्टी की बनी होने के बावजूद यह मूर्ति पानी में नहीं गलती है और कई बार पानी में डूबने पर भी सुरक्षित रही है।
गणेश चतुर्थी पर मंदिर में कौन से मुख्य कार्यक्रम होंगे?
13 सितंबर को सिंजारा पर्व पर मेहंदी अर्पण और 56 भोग आरती होगी, जबकि 14 सितंबर को महाआरती, शोभायात्रा और जागरण आयोजित किया जाएगा।
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