जयपुर जिले के सांभर और जोबनेर इलाके में पानी की किल्लत और फ्लोराइड वाला भूजल लंबे समय से ग्रामीण आबादी के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ था। पीने योग्य पानी की भारी कमी के कारण यहां के लोगों को रोजाना कड़ा संघर्ष करना पड़ता था, लेकिन अब वर्षा जल संचयन की एक मजबूत पहल ने इस पूरे क्षेत्र की सूरत बदलनी शुरू कर दी है। इस बदलाव की कहानी की नींव एक किसान गायत्री देवी यादव ने रखी थी। करीब 30 साल की उम्र वाली गायत्री देवी ने पानी की इस गंभीर समस्या को केवल एक लाचारी मानकर चुप बैठने के बजाय इसका खुद मुकाबला करने का फैसला किया और बारिश के पानी को बूंद-बूंद सहेजने का बीड़ा उठाया।
शुरुआत अपने खेत से और फिर परिवार को जोड़ा
जब उन्होंने अपने आसपास के इलाकों में गिरते भूजल स्तर और पानी की विकराल होती समस्या को देखा, तो सबसे पहले उन्होंने अपने परिवार के भीतर ही जल संरक्षण की अलख जगाई। उन्होंने अपने पति को राजी किया और अपनी घरेलू व कृषि संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खेत में ही एक तालाब का निर्माण करवाया। उनका यह छोटा सा निजी कदम आगे चलकर एक व्यापक जन अभियान की शक्ल ले लेगा, इसकी शुरुआत उन्होंने खुद से की थी। उन्होंने आसपास के ग्रामीणों को यह समझाना शुरू किया कि आसमान से गिरने वाले बारिश के पानी को बेकार बह जाने देने के बजाय यदि खेतों और घरों में सुरक्षित रख लिया जाए, तो इस सूखे और पानी की कमी की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
700 से ज्यादा महिला किसानों को जोड़ा
अपने इस मिशन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने विभिन्न सामाजिक संगठनों और सरकारी योजनाओं का साथ लिया और गांव-गांव जाकर महिलाओं तथा किसानों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करना शुरू किया। उनकी इस प्रेरणादायक मुहिम से देखते ही देखते क्षेत्र की 700 से अधिक महिला किसान जुड़ गईं। इन महिलाओं को अपने-अपने खेतों में फार्म पॉन्ड यानी खेत तालाब बनवाने के लिए प्रेरित किया गया, जिससे इलाके में एक नया बदलाव आया। इन तालाबों में जैसे ही बारिश का पानी इकट्ठा होने लगा, उससे न सिर्फ फसलों की सिंचाई का काम आसान हुआ बल्कि भूजल स्तर को रिचार्ज करने में भी बहुत बड़ी मदद मिलने लगी।
फ्लोराइड की समस्या पर वर्षा जल से प्रहार
सांभर और जोबनेर क्षेत्र के कई हिस्सों में भूजल में अत्यधिक फ्लोराइड होना भी स्थानीय लोगों के सामने एक बहुत बड़ी स्वास्थ्य चुनौती थी, जिससे लोगों को बीमारियां घेरती थीं। ऐसी विकट स्थिति में गायत्री ने वर्षा जल संचयन को केवल सिंचाई तक सीमित न रखकर पेयजल संकट के समाधान का भी मुख्य हथियार बना लिया। उन्होंने ग्रामीणों को घरों के अंदर पानी के टांके बनवाने और उनमें बरसात का शुद्ध पानी सुरक्षित रखने के लिए प्रोत्साहित किया। इस आसान तकनीक के बदौलत कई परिवारों को मीठा और पूरी तरह शुद्ध वर्षा जल मिलने लगा। इसके अलावा पानी की तलाश में दूरदराज के इलाकों में भटकने वाली महिलाओं के समय और उनकी शारीरिक मेहनत की भी भारी बचत होने लगी।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिलाओं के जीवन में बदलाव
उनका स्पष्ट तौर पर यह मानना है कि जल संचयन केवल पानी बचाने भर का कोई साधारण अभियान नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और महिलाओं की पूरी जिंदगी को संवारने का एक बड़ा माध्यम है। खेतों में तैयार हुए इन छोटे तालाबों ने किसानों को बारिश के पानी का बेहतरीन उपयोग करने का सुनहरा अवसर दिया है, जिसका सकारात्मक असर अब खेती और ग्रामीण जीवनशैली दोनों पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। अब महिलाओं को पानी के लिए घंटों तक कड़ा परिश्रम नहीं करना पड़ता, बल्कि उन्हें अपने ही घर और खेत पर आसानी से पानी की उपलब्धता का संबल मिल गया है।
राष्ट्रपति अवार्ड से मिल चुका है सम्मान
उनके इन सराहनीय और उत्कृष्ट प्रयासों को देखते हुए जल संरक्षण और संवर्धन की दिशा में उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए उन्हें देश के राष्ट्रपति अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनके द्वारा शुरू की गई यह छोटी सी व्यक्तिगत पहल अब किसी एक परिवार या गांव की सीमा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सांभरलेक और जोबनेर के पूरे इलाके में खेत तालाब, मिनी तालाब और घरेलू टांकों के माध्यम से वर्षा जल सहेजने का संदेश तेजी से फैल रहा है। एक महिला की दृढ़ इच्छाशक्ति और व्यक्तिगत सोच आज सैकड़ों परिवारों और 700 से अधिक महिला किसानों को एकजुट कर एक बड़े जल संरक्षण आंदोलन का रूप ले चुकी है।


















