देशभर में जहां विजयदशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और रावण के पुतले फूंके जाते हैं, वहीं सूर्यनगरी जोधपुर में एक ऐसा समाज भी है जो इस दिन शोक मनाता है। यह अनोखी परंपरा गोधा श्रीमाली ब्राह्मण समाज के गोधा गोत्र के लोगों से जुड़ी हुई है। इस समाज के लोग लंका नरेश रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और ऐतिहासिक नगर मंडोर को उनका ससुराल मानते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मंडोर में ही रावण और मंदोदरी का विवाह संपन्न हुआ था और आज भी मंडोर की पहाड़ी पर स्थित रावण की चंवरी को उसी विवाह मंडप के रूप में देखा जाता है। इसी गहरी मान्यता के चलते इस समाज के परिवार विजयदशमी के दिन रावण दहन जैसी परंपरा से दूर रहते हैं और इसे शोक दिवस के रूप में मनाते हैं। इस खास दिन पर समाज के लोग सुबह स्नान करने के बाद अपना जनेऊ बदलते हैं और विधि-विधान के साथ रावण की पूजा-अर्चना करते हैं।
मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में स्थित है मंदिर
ऐतिहासिक मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में स्थित रावण का यह मंदिर इस पूरी परंपरा और अनुष्ठान का मुख्य केंद्र है। इस स्थान को उत्तर भारत का पहला रावण मंदिर होने का गौरव प्राप्त है। इस मंदिर के भीतर रावण और महारानी मंदोदरी की विशाल प्रतिमाओं के साथ-साथ मां खरानना की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। समाज के जानकारों और पुजारियों के अनुसार, रावण को केवल एक पौराणिक खलनायक के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें एक परम ज्ञानी विद्वान, प्रकांड शिवभक्त, कुशल संगीतज्ञ और ज्योतिष विद्या के बड़े जानकार के रूप में याद किया जाता है। यहाँ आने वाले लोग उनकी विद्वत्ता और शिवभक्ति के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं और उनके जीवन के इन सकारात्मक पहलुओं को ही समाज के सामने रखते हैं।
ग्यारह फीट ऊँची प्रतिमा की होती है पूजा
जोधपुर के मंडोर क्षेत्र को मंदोदरी का मायका माना जाता है और इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण वर्ष 2008 में मेहरानगढ़ दुर्ग से कुछ ही दूरी पर इस दशानन मंदिर का निर्माण कराया गया था। यहाँ रावण के वंशज होने का दावा करने वाले लोग और दूर-दूर से अन्य भक्त दर्शन के लिए नियमित रूप से आते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जोधपुर के प्रसिद्ध पत्थरों से तराशी गई रावण की 11 फीट ऊंची और करीब 2,000 किलो वजनी विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। इस मूर्ति में रावण को भगवान शिव के शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए मुद्रा में दर्शाया गया है और ठीक उसके सामने महारानी मंदोदरी की प्रतिमा भी विराजमान है। यह अनूठा स्वरूप स्पष्ट रूप से रावण की अगाध शिवभक्ति को दर्शाता है और आने वाले पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
दशहरे के दिन वंशज मनाते हैं शोक
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, विजयदशमी के दिन रावण के वंशज माने जाने वाले ये लोग मंदिर परिसर में ही रहकर अपना शोक व्यक्त करते हैं। शहर में जब रावण दहन के दौरान आसमान में धुआँ दिखाई देता है, तो ये लोग पारंपरिक रूप से स्नान करते हैं, दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए तर्पण करते हैं, अपना जनेऊ बदलते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि गोधा गोत्र के श्रीमाली ब्राह्मण कभी रावण की बारात के साथ लंका से आए थे और फिर यहीं हमेशा के लिए बस गए। आज भी इस समाज के लोग अपनी इस प्राचीन परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि जोधपुर शहर में लगभग 100 परिवार और फलोदी में करीब 60 परिवार खुद को रावण का सीधा वंशज मानते हैं और आज भी उन्हें एक महान विद्वान, संगीतज्ञ और शिवभक्त के रूप में पूजते हैं।
















