राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसा हैरान करने वाला और चमत्कारी प्रसंग सामने आता है जो इतिहास और गहरी आस्था को आपस में जोड़ता है। इस स्थान पर भगवान गणेश और हनुमानजी की अद्धभुत प्रतिमाएं किसी कृत्रिम निर्माण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक ही प्राकृतिक पत्थर पर स्वाभाविक रूप से उभरी हुई नजर आती हैं। इन दोनों देवताओं की आकृतियां अलग-अलग खंडों में नहीं बल्कि पूरी तरह से एक ही पाषाण पर उत्कीर्ण हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब कोई भी श्रद्धालु इस प्रतिमा को बिल्कुल सामने से देखता है, तो उसे ऐसा आभास होता है मानो भगवान गणेश और संकटमोचन हनुमान एक साथ आकाश मार्ग में गमन कर रहे हों। यह पाषाण रूप नागौर शहर में ऐतिहासिक बख्तासागर तालाब के ठीक नजदीक स्थित भाकल इच्छा शक्ति हनुमान गणेश मंदिर के भीतर विराजमान है, जो आज के समय में आस्था का एक बहुत बड़ा और खास केंद्र बन चुका है।
बख्तासागर तालाब की खुदाई और इतिहास
इस पवित्र और अनोखे मंदिर के इतिहास के तार सीधे तौर पर नागौर के बख्तासागर तालाब के निर्माण कार्य से जुड़े हुए बताए जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं और पुरानी जानकारियों के अनुसार, विक्रम संवत 1730 में तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह ने बख्तासागर तालाब को बनवाने का काम शुरू करवाया था। जब इस विशाल तालाब के लिए जमीन की खुदाई का काम तेजी से चल रहा था, तभी अचानक श्रमिकों को जमीन के भीतर से एक विशेष पत्थर प्राप्त हुआ। इस रहस्यमयी और चमत्कारी पत्थर पर भगवान गणेश और हनुमानजी के अद्वितीय स्वरूप उकेरे हुए मिले। इस पाषाण को देखते ही वहां मौजूद लोगों की श्रद्धा स्वतः ही जागृत हो उठी और बाद में इसी निश्चित स्थान पर इस दिव्य प्रतिमा की विधिवत स्थापना कर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवा दिया गया। तभी से लेकर आज तक यह पावन स्थल क्षेत्र के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है।
ज्ञान और शक्ति का अनूठा संगम
इस अनूठी प्रतिमा का सबसे खास पहलू इसका स्वरूप और धार्मिक महत्व है जो भक्तों को अपनी ओर खींचता है। सनातन परंपरा में जहां एक तरफ भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, ज्ञान और किसी भी कार्य के शुभारंभ का प्रतीक माना गया है, वहीं दूसरी तरफ हनुमानजी को असीम शक्ति, अदम्य साहस और अनन्य भक्ति का देवता माना जाता है। ऐसे में एक ही पाषाण पर इन दोनों महान देवताओं का एक साथ प्रकट होना भक्तों के लिए बुद्धि और बल यानी ज्ञान और शक्ति के महान संगम का प्रत्यक्ष प्रतीक बन जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश और हनुमानजी दोनों ऐसे पावन देव स्वरूप हैं जिन पर किसी भी प्रकार के नवग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी प्राचीन मान्यता के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि जो भी भक्त अपने जीवन की गंभीर बाधाओं, संकटों और परेशानियों से मुक्ति पाने की कामना लेकर इस संयुक्त स्वरूप की सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
दृष्टि को मोह लेने वाली बनावट
इस मंदिर में आने वाले हर एक श्रद्धालु के लिए यह प्रतिमा हमेशा से ही बड़े कौतूहल और आकर्षण का विषय रही है। कड़े पाषाण पर तराशे गए दोनों देवताओं का यह रूप ऐसा है कि जो भी व्यक्ति इसे पहली बार देखता है, उसकी नजरें वहीं ठहर जाती हैं और ध्यान स्वतः ही आकर्षित हो जाता है। विशेष रूप से प्रतिमा की शारीरिक बनावट और गति की मुद्रा देखकर ऐसा अहसास होता है मानो भगवान गणेश और हनुमानजी एक साथ वायुमार्ग से आसमान की तरफ गतिशील मुद्रा में बढ़ रहे हों। भगवान गणेश और हनुमान के इस प्रकार के संयुक्त और दुर्लभ स्वरूप का उल्लेख धार्मिक परंपराओं में भी विशेष रूप से मिलता है। देश के दक्षिण में स्थित चेन्नई शहर के एक प्रसिद्ध मंदिर में भी इसी तरह के संयुक्त स्वरूप को आद्यंत महाप्रभु के रूप में पूजा जाता है। नागौर का यह ऐतिहासिक मंदिर भी इसी प्रकार के अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत स्वरूप के कारण देश भर के श्रद्धालुओं और सनातन धर्म में गहरी रुचि रखने वाले लोगों के बीच विशेष महत्व रखता है।


















