सावन का महीना भगवान शिव की आराधना और कांवड़ यात्रा के लिए विशेष रूप से पहचाना जाता है। इस दौरान देश भर से लाखों श्रद्धालु कठिन और लंबी पदयात्रा करते हुए शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं। इतनी लंबी दूरी तय करने के कारण कई बार कांवड़ियों को रास्ते में शारीरिक थकान, पैरों में दर्द, सूजन, छाले या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं घेर लेती हैं। ऐसे में राजस्थान के नागौर जिले से एक बेहद प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जहां परबतसर उपखंड के ढाढ़ोता गांव के रहने वाले 29 वर्षीय सुखाराम सारण इन शिव भक्तों के लिए मसीहा बनकर खड़े हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिन कांवड़ियों की सेहत की फिक्र सुखाराम कर रहे हैं, वे खुद जिंदगी और मौत के बीच एक गंभीर जंग लड़ रहे हैं।
सुखाराम की अपनी शारीरिक स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं और पिछले करीब एक साल से उनका नियमित रूप से डायलिसिस किया जा रहा है। इसके अलावा उन्हें रोज भारी मात्रा में दवाइयां भी लेनी पड़ती हैं। मकराना के एक स्थानीय अस्पताल में उनका लगातार इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के अनुसार उन्हें खुद आराम और बेहद कड़ी चिकित्सकीय देखरेख की आवश्यकता है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी इस जानलेवा बीमारी को दूसरों की मदद करने के आड़े नहीं आने दिया है।
सावन में कांवड़ियों की मुफ्त चिकित्सा सेवा
सावन का महीना शुरू होते ही चारों तरफ कांवड़ यात्रियों का रेला निकल पड़ता है। मीलों का सफर पैदल तय करने वाले इन श्रद्धालुओं के पैरों में छाले पड़ना, मांसपेशियों में खिंचाव आना, कमजोरी महसूस होना या मामूली चोट लगना बेहद आम बात है। इन तमाम परेशानियों से जूझ रहे यात्रियों को प्राथमिक उपचार और दवाइयां मुहैया कराने का बीड़ा सुखाराम ने उठाया है। वे सड़क किनारे तंबू लगाकर या उचित स्थान पर बैठकर कांवड़ियों को पूरी तरह नि:शुल्क मेडिकल सेवाएं दे रहे हैं। इस नेक काम के लिए वे किसी भी यात्री से एक भी रुपया नहीं लेते हैं और न ही उनके मन में सेवा के बदले किसी प्रकार की कोई अपेक्षा या लालसा होती है।
खुद दर्द सहकर दूसरों के चेहरे पर ला रहे मुस्कान
सुखाराम की यह मिसाल इसलिए भी अनूठी और वंदनीय बन जाती है क्योंकि वे खुद हर पल शारीरिक पीड़ा में रहते हैं। एक तरफ जहां अस्पताल के चक्कर लगाना, डायलिसिस कराना और समय पर दवाखाना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने सावन के इन पावन दिनों में कांवड़ यात्रियों की सेवा को अपना मुख्य कर्तव्य मान लिया है। इस बारे में उनका मानना है कि यदि किसी जरूरतमंद की तकलीफ को थोड़ा सा भी कम करने का अवसर आपके हाथ लगे, तो उसे कभी भी नहीं गंवाना चाहिए।
संकट चाहे जितने हों, जज्बा और संवेदनाएं बड़ी
सुखाराम का साफ तौर पर कहना है कि इंसान के जीवन में हालात चाहे जितने भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि दिल में दूसरों के प्रति सच्ची सहानुभूति और सेवा का भाव है तो राह खुद-ब-खुद निकल आती है। उनकी यह संघर्ष गाथा आज के समाज के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। अमूमन लोग छोटी-मोटी परेशानियों या व्यस्तता का हवाला देकर जरूरतमंदों की मदद करने से पीछे हट जाते हैं, लेकिन महज 29 साल की कम उम्र में दोनों गुर्दे फेल हो जाने और जिंदगी जीने के लिए डायलिसिस पर निर्भर रहने के बावजूद सुखाराम ने जिस तरह का जज्बा दिखाया है, वह हर किसी को हैरान करता है। गंभीर बीमारियों से घिरे होने के बावजूद वे न केवल सावन के दौरान कांवड़ियों की सेवा करते हैं, बल्कि आम दिनों में भी जरूरतमंद लोगों को मुफ्त चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराते रहते हैं।




















