शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ पावन दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की उपासना की विशेष परंपरा रही है। इस दौरान देशभर के देवी मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। राजस्थान में अजमेर से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तीर्थ नगरी पुष्कर में एक अत्यंत प्राचीन और पावन शक्तिपीठ मौजूद है, जिसका ऐतिहासिक और पौराणिक संबंध सीधे माता सती से माना जाता है। पुरुहूता पर्वत की गोद में स्थित राजराजेश्वरी पुरुहूता मणि वैदिक शक्तिपीठ को कुल 108 सिद्ध पीठों की सूची में 15वें सिद्ध पीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र स्थान पर माता सती की कलाइयों का स्वरूप गिरा और विराजमान हुआ था। यही कारण है कि नवरात्रि पर्व के दौरान यहां दूर-दराज से श्रद्धालु विशेष अनुष्ठान और दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
शिखर से पर्वत की तलहटी तक कैसे पहुंचीं माता
इस सिद्ध धाम की स्थापना और स्वरूप को लेकर मंदिर के पुजारी उमेंद्र पुरी एक दिलचस्प पौराणिक प्रसंग साझा करते हैं। उनके अनुसार, आदिकाल में माता इस ऊंचे पर्वत के सबसे ऊपरी शिखर पर एक पिंडी के रूप में स्थापित थीं। उस समय एक अनन्य भक्त रोजाना कठिन चढ़ाई पूरी कर पर्वत की चोटी तक पहुंचता था और नियमपूर्वक माता की सेवा और पूजा-अर्चना करता था। समय बीतने के साथ जब वह भक्त अत्यंत वृद्ध हो गया और उसके लिए रोजाना शिखर पर चढ़ना असंभव सा होने लगा, तब उसने मां से अत्यंत भावुक और निस्वार्थ प्रार्थना की।
भक्त ने निवेदन किया कि माता स्वयं नीचे तलहटी में आकर विराजें, जिससे न केवल वह अपने अंतिम समय तक सेवा कर सके, बल्कि आम श्रद्धालुओं को भी दर्शन करने में सुगमता हो। भक्त की इस सच्ची निष्ठा और निस्वार्थ विनती को देखकर माता ने प्रसन्न होकर पर्वत की तलहटी में आने का फैसला किया, जिसके बाद वर्तमान स्थल पर उनकी स्थापना हुई।
ब्रह्मा जी के ऐतिहासिक यज्ञ और देवी स्वरूपों की पूजा
पुजारी उमेंद्र पुरी के अनुसार, इस पावन शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व जगतपिता ब्रह्मा जी के पुष्कर में आयोजित महायज्ञ से भी गहरा जुड़ाव रखता है। मंदिर परिसर में माता के विभिन्न दिव्य स्वरूपों की अलग-अलग मान्यताओं के साथ विधिवत पूजा की जाती है। यहां आने वाले भक्त मां महाकाली और मां चामुंडा के उग्र व कल्याणकारी रूपों की आराधना करते हैं।
इसके अतिरिक्त, धन की देवी मां लक्ष्मी और विद्या की देवी मां सरस्वती के संयुक्त स्वरूप को यहां श्रद्धापूर्वक अम्बे-अम्बालिका नाम से पूजा जाता है। साथ ही, मां गौरी के साथ भगवान गणेश जी का विग्रह भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। अजमेर और पुष्कर के आसपास के पूरे क्षेत्र में सदियों से कई ऐसे पूजनीय मंदिर स्थापित हैं, जिनकी अपनी स्वतंत्र मान्यताएं और अटूट धार्मिक परंपराएं आज भी जीवित हैं।



















