पुष्कर की पवित्र तीर्थनगरी में एक बेहद भावुक और समाज को नई दिशा देने वाला प्रसंग सामने आया है। आज के आधुनिक युग में भी जहां बेटा और बेटी के बीच भेदभाव की दबी हुई मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, वहीं पुष्कर की इन बेटियों ने पुरानी और रूढ़िवादी परंपराओं को सिरे से खारिज करते हुए एक ऐसा अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसने हर किसी की सोच को गहराई से झकझोर दिया है। पुष्कर की बड़ी बस्ती में स्थित मोक्ष धाम का माहौल उस समय पूरी तरह गमगीन हो गया और वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं, जब कादम्बरी बाईसा, कृष्णा बाईसा और जयन्तिका बाईसा नामक तीन सगी बहनों ने अपनी दिवंगत मां उषाकवर राणावत को नम आंखों से विदाई देते हुए मुखाग्नि दी और अंतिम संस्कार से जुड़े तमाम धार्मिक दायित्वों को पूरी दृढ़ता के साथ निभाया।
परिवार की पृष्ठभूमि और परंपराओं से हटकर लिया गया फैसला
परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, पचपन वर्षीय उषाकवर राणावत का जीवन और पारिवारिक ताना-बाना कई अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ा हुआ था। उनके भतीजे दक्ष्यराजसिंह ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि उषाकवर के कोई बेटा नहीं था। हमारे समाज में पारंपरिक रूप से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर परिवार की ओर से किसी पुरुष रिश्तेदार या भतीजे को ही अंतिम संस्कार की रस्में पूरी करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। हालांकि, इस परिवार ने समाज की इन पुरानी और संकीर्ण रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए अपनी तीनों बेटियों को ही यह मुख्य अधिकार और कर्तव्य सौंपने का साहसिक निर्णय लिया। इन तीनों बहनों ने बिना किसी झिझक या संकोच के अपनी मां को मुखाग्नि देने की परंपरा को बखूबी निभाया और यह साबित कर दिखाया कि माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और कर्तव्य निभाने के मामले में बेटियां किसी भी मोर्चे पर बेटों से पीछे नहीं हैं।
इलाज के दौरान हुआ निधन और तीर्थनगरी में हुआ अंतिम संस्कार
इस दुखद घटना पर प्रकाश डालते हुए सामाजिक कार्यकर्ता शंकरसिंह भवाल ने बताया कि उषाकवर राणावत का ससुराल जयपुर के पास मानपुरा माचेड़ी इलाके में स्थित था, जबकि उनका पीहर भीलवाड़ा के नजदीक कारोही गांव में था। पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण वे अस्वस्थ चल रही थीं और क्षेत्रपाल अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उपचार के दौरान ही पचपन वर्ष की आयु में उनका प्राणांत हो गया, जिससे उनके पूरे परिवार, नाते-रिश्तेदारों और चाहने वालों में गहरा शोक छा गया। चूंकि पुष्कर तीर्थनगरी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बेहद ऊंचा और पवित्र माना जाता है, इसलिए परिजनों ने आपसी रजामंदी से यह निर्णय लिया कि उनका अंतिम संस्कार इसी पवित्र नगरी के मुक्तिधाम में ही संपन्न कराया जाए।
बदलते समाज में बेटियों का बढ़ता कदम और सशक्त संदेश
आज के इस दौर में जब देश की बेटियां रक्षा, विज्ञान, खेलकूद और प्रशासन जैसे तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में देश का गौरव बढ़ा रही हैं, वहीं सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वहन करने के मामले में भी वे पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नजर आ रही हैं। पुष्कर में हुई यह घटना केवल एक परिवार के अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम रूढ़िवादी सोच रखने वाले लोगों के लिए एक करारा संदेश है जो आज भी बेटियों को बेटों की तुलना में कमतर आंकते हैं। इन तीनों बहनों ने अपनी मां को अंतिम विदाई देकर समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि संस्कार, प्रेम और कर्तव्य का दायरा किसी लिंग या जेंडर पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह से शुद्ध भावना और समर्पण से तय होता है।



















