राजस्थान के धौलपुर शहर में स्थित गौरव पथ सिर्फ एक व्यस्त सड़क भर नहीं है, बल्कि यह धौलपुर के गौरवशाली अतीत, बेजोड़ स्थापत्य कला और स्वतंत्रता आंदोलन के स्वर्णिम इतिहास का जीवंत गवाह है। रियासतकाल के दौरान निर्मित यह मार्ग शहर की कई अमूल्य धरोहरों को अपने अंदर समेटे हुए है। इस एक ही रास्ते से गुजरते हुए धौलपुर के विभिन्न ऐतिहासिक अध्यायों को करीब से देखा जा सकता है, जो इसे केवल एक यातायात का जरिया न बनाकर एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गलियारा बनाते हैं।
रियासती स्थापत्य और निहाल टावर की ऐतिहासिक पहचान
गौरव पथ पर कदम रखते ही धौलपुर की रियासतकालीन वास्तुकला की झलक मिलने लगती है। इस मार्ग पर भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर माना जाने वाला भव्य निहाल टावर शान से खड़ा है। निहाल टावर के साथ ही यहां ऐतिहासिक नगरपालिका भवन और प्रसिद्ध सिटी जुबली हॉल भी स्थित हैं। नगरपालिका की यह पुरानी इमारत धौलपुर में राजतंत्र से लोकतंत्र की ओर हुए बदलाव की पहचान मानी जाती है। इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि सिटी जुबली हॉल को अब राजस्थान की हेरिटेज लाइब्रेरी के रूप में बदल दिया गया है, जहाँ ज्ञान और इतिहास का संरक्षण किया जा रहा है। इसी रास्ते पर आगे बढ़ने पर तीर्थराज मचकुंड के दर्शन होते हैं। एक ही मुख्य सड़क पर इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों की मौजूदगी यह साफ दर्शाती है कि रियासतकाल में इस मार्ग का विशेष प्रशासनिक और सांस्कृतिक महत्व रहा था।
लंदन के हाइड पार्क की तर्ज पर 'ठंडी सड़क' का सपना
धौलपुर रियासत के शासक महाराज राणा उदयभान सिंह इस गौरव पथ को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान देना चाहते थे। इतिहासकार अरविंद शर्मा के अनुसार, महाराज राणा उदयभान सिंह की योजना गौरव पथ को इंग्लैंड के लंदन स्थित मशहूर हाइड पार्क की तर्ज पर विकसित करने की थी। वे इस मार्ग को नागरिकों और बच्चों के मनोरंजन व टहलने के लिए एक शानदार हरित स्थल बनाना चाहते थे, जिसके लिए यहां कई सुविधाएं विकसित की जा रही थीं। रियासत के दौर में इस मार्ग के दोनों ओर घने और बड़े पेड़ हुआ करते थे। इन पेड़ों की हरियाली और वहां बहने वाली ठंडी हवाओं के कारण स्थानीय लोग इसे बेहद प्यार से 'ठंडी सड़क' कहकर पुकारते थे। यदि महाराज राणा उदयभान सिंह को अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम करने का थोड़ा और समय मिला होता, तो गौरव पथ का यह खूबसूरत विस्तार और सौंदर्यीकरण तीर्थराज मचकुंड धाम तक पहुंच जाता।
1946 का स्वतंत्रता संग्राम और जय हिंद संघ की ऐतिहासिक शपथ
गौरव पथ केवल राजशाही और स्थापत्य कला की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि यह राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का भी एक प्रमुख केंद्र रहा है। वर्ष 1946 में इसी गौरव पथ पर स्थित ऐतिहासिक निहाल टावर की छांव में धौलपुर के निडर क्रांतिकारियों ने 'जय हिंद संघ' की स्थापना की थी। देश की आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों ने उस समय अपने ही शरीर से खून निकालकर कागजों पर दस्तखत किए थे और भारत माता को आजाद कराने के लिए अपनी अंतिम सांस तक संघर्ष करने की पवित्र शपथ ली थी। आज यद्यपि गौरव पथ पर आधुनिक धौलपुर शहर की तेज गतिविधियां और वाहनों की आवाजाही दिखाई देती है, लेकिन यहां मौजूद पुरानी ऐतिहासिक इमारतें हर आने-जाने वाले को धौलपुर के उसी पराक्रमी और स्वाभिमानी दौर की याद दिलाती हैं। यह मार्ग आज भी लोगों को धौलपुर के रियासती इतिहास, बेजोड़ स्थापत्य और आजादी के आंदोलनों से भावनात्मक रूप से जोड़ता है।





















