भरतपुर स्थित विश्वविख्यात केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में जलीय जीवों के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक पहल की गई है। पक्षियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले इस दलदली क्षेत्र में पहली बार मीठे पानी के कछुओं की वैज्ञानिक आधार पर विस्तृत गणना और अध्ययन शुरू किया गया है। उद्यान प्रबंधन द्वारा संचालित इस विशेष सर्वेक्षण के माध्यम से जलचर कछुओं की विभिन्न प्रजातियों, उनकी कुल आबादी, फैलाव और उनके प्राकृतिक आवास की भौतिक स्थितियों से संबंधित प्रमाणिक आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं।
संरक्षण योजनाओं के लिए जुटाए जा रहे महत्वपूर्ण आंकड़े
इस वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान वन्यजीव विशेषज्ञ उद्यान के अलग-अलग जलाशयों तथा आर्द्रभूमि हिस्सों की गहन मैपिंग कर रहे हैं। अध्ययन का मुख्य ध्यान यह चिह्नित करने पर है कि उद्यान के कौन से हिस्से कछुओं के अनुकूल हैं और कहाँ उनकी सघनता अधिक पाई जाती है। इसके साथ ही शोधकर्ता कछुओं की आहार संबंधी प्राथमिकताओं, उनके प्रजनन चक्र, सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं और पानी की गुणवत्ता का भी बारीक मूल्यांकन कर रहे हैं। इन एकत्रित जानकारियों के आधार पर आने वाले वर्षों में कछुओं की सुरक्षा और उनके संवर्धन के लिए एक सुदृढ़ वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
राजस्थान की जलीय जैव विविधता में केवलादेव का योगदान
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार पूरे राजस्थान राज्य में मीठे पानी के कछुओं की कुल 11 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 7 प्रजातियां अकेले केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के पारिस्थितिकी तंत्र में दर्ज की जा चुकी हैं। राज्य में मौजूद कुल प्रजातियों में से लगभग दो-तिहाई की उपस्थिति इस राष्ट्रीय उद्यान को कछुआ संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण बनाती है। मीठे पानी के कछुए जलीय पर्यावरण में खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखने और जैविक अपशिष्ट को साफ करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इसलिए किसी आर्द्रभूमि में कछुओं की पर्याप्त संख्या वहां के संपूर्ण पर्यावरण के स्वस्थ होने का प्रत्यक्ष प्रमाण मानी जाती है।
पक्षियों के साथ जलीय जीवों का एकीकृत संरक्षण
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की पहचान लंबे समय से हर साल आने वाले हजारों देशी और विदेशी प्रवासी पक्षियों के सुरक्षित ठिकाने के रूप में रही है। हालांकि कछुओं पर केंद्रित इस पहले वैज्ञानिक सर्वेक्षण से उद्यान की जैविक विविधता को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत हुआ है। इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से न केवल कछुओं के प्राकृतिक आवास में सुधार होगा, बल्कि बदलते मौसम, तापमान और जलस्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव का जलीय आबादी पर पड़ने वाले असर को भी सटीकता से समझा जा सकेगा। इस पहल से केवलादेव अब पक्षी अभयारण्य के साथ-साथ जलीय वन्यजीवों के संरक्षण का भी एक बड़ा शोध केंद्र बनकर उभर रहा है।



















