राजस्थान के देहाती इलाकों में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो चुकी है, जिसके चलते गांवों में चुनावी रंग पूरी तरह चढ़ता नजर आ रहा है. मतदान की आधिकारिक तारीखें सामने आने से पहले ही सरपंची के भावी उम्मीदवारों ने जनसमर्थन जुटाने की खातिर बेहद असाधारण और चौंकाने वाले तौर-तरीके आजमाने शुरू कर दिए हैं. कई दावेदार जहां दशकों पुरानी रिवायत के अनुसार चौखट-चौखट जाकर मतदाताओं के बीच अपनी बात रख रहे हैं, वहीं कुछ प्रत्याशी समूचे गांव का चक्कर दंडवत परिक्रमा के जरिए लगाकर सबका ध्यान अपनी तरफ खींच रहे हैं. भरतपुर और उसके नजदीकी ग्रामीण इलाकों में वोट हासिल करने की यह अनूठी शैली इन दिनों हर चौपाल पर बहस का सबब बन चुकी है.
जमीन पर लेटकर चरणबद्ध तरीके से नाप रहे गांव की सीमाएं
पंचायत चुनाव में अपनी दावेदारी मजबूत करने उतरे कई लोग बस्तियों, प्रमुख रास्तों और संकरी गलियों में बाकायदा जमीन पर लेटकर परिक्रमा पूरी कर रहे हैं. इस कठिन कवायद के दौरान प्रत्याशी जमीन पर लेटकर दंडवत प्रणाम करते हैं, फिर उठकर उसी बिंदु से आगे बढ़कर दोबारा लेटते हैं और इसी क्रम को दोहराते हुए गांव की सीमाओं को नापते हैं. ग्रामीणों के लिए यह दृश्य कौतूहल और हैरानी का बड़ा केंद्र बना हुआ है. धूल भरी पगडंडियों, तंग गलियारों और सार्वजनिक चौराहों से इसी मुद्रा में गुजरते हुए ये दावेदार ग्रामीणों के हाथ जोड़कर अपने पक्ष में समर्थन और बड़े-बुजुर्गों से जीत का आशीर्वाद मांग रहे हैं.
सलाबाद, अवार और रूपवास के दावेदारों का अनोखा प्रचार
भरतपुर जिले के तहत आने वाली ग्राम पंचायत सलाबाद और ग्राम पंचायत अवार के सरपंच पद के दावेदार अपनी इसी दंडवत परिक्रमा को लेकर इलाके भर में विशेष चर्चा बटोर रहे हैं. इन दोनों पंचायतों के अलावा सीमावर्ती कई अन्य ग्राम पंचायतों में भी सरपंची के आकांक्षी इसी राह पर कदम बढ़ाते देखे जा रहे हैं. रूपवास इलाके में भी कई भावी उम्मीदवार पूरे गांव की परिक्रमा जमीन पर लेटकर करते दिखाई दे रहे हैं. इन प्रत्याशियों का मुख्य उद्देश्य इस अनोखे कदम के सहारे गांव के दूरदराज स्थित हर मजरे, टोले और नुक्कड़ तक पहुंचना है, ताकि आम वोटरों के जेहन में अपनी अलग और अमिट छवि बनाई जा सके.
धार्मिक निष्ठा या सियासी दांव, मतदाताओं के बीच बंटी राय
मतदान से पहले प्रत्याशियों के इस अनूठे तेवर को देखकर ग्रामीण समाज में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. बस्ती के बुजुर्ग इस तरह के प्रयास को उम्मीदवार की गहरी धार्मिक आस्था, समर्पण और लोक मर्यादा से जोड़कर आंक रहे हैं. इसके विपरीत, युवा वर्ग इसे मतदाताओं को आकर्षित करने की एक सोची-समझी और लीक से हटकर की गई प्रचार रणनीति मान रहा है. पंचायत चुनाव की आधिकारिक घोषणा से पहले गांवों में चल रही यह सांस्कृतिक और सियासी गहमागहमी अब जनमानस का मुख्य विषय बन चुकी है. अब आने वाला वक्त ही बताएगा कि जमीन पर लेटकर वोट मांगने का यह तरीका प्रत्याशियों को मतपेटी में कितनी बढ़त दिला पाता है और ग्रामीण किसे अपनी पंचायत का नेतृत्व सौंपते हैं.



















