पश्चिमी राजस्थान के सीमांत भूभाग में रेल पटरी पर हुए हालिया धमाके ने सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह सतर्क कर दिया है, लेकिन इस सुरक्षा संकट के बीच एक गांव की अनूठी पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के कौतूहल का केंद्र बन गई है। अनूपगढ़ और सूरतगढ़ के बीच पड़ने वाले इस रेलवे क्षेत्र में मौजूद जिस बस्ती के निकट यह धमाका हुआ, उसे सरकारी कागजों और बोलचाल में 50 जीबी के नाम से पहचाना जाता है। पहली नजर में किसी कंप्यूटर फाइल साइज अथवा आधुनिक तकनीकी संकेत जैसा प्रतीत होने वाला यह नाम दरअसल एक सदी पुराने नहरी बंदोबस्त, भूमि पैमाइश और सिंचाई तंत्र का एक व्यवस्थित गणितीय पता है।
सरहद से निकटता और सामरिक संवेदनशीलता
भौगोलिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो 50 जीबी नामक यह रिहायशी इलाका भारत और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज 15 से 20 किलोमीटर के फासले पर स्थित है। सीमा रेखा के इतने पास होने तथा रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में पड़ने के कारण ही रेलवे ट्रैक पर बारूदी विस्फोट की घटना को सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने बेहद गंभीरता से लिया है। घटना के तुरंत बाद रेल यातायात प्रभावित हुआ, जिसके चलते कई रेलगाड़ियों की आवाजाही रद्द करनी पड़ी और कुछ गाड़ियों का मार्ग बदला गया। जब समूचे देश का ध्यान इस सरहदी हलचल पर गया, तब लोगों के सामने यह अजीबोगरीब नाम कौतूहल बनकर उभरा कि आखिर किसी भारतीय गांव का नाम पारंपरिक शब्दों के बजाय अंकों और अक्षरों के मेल पर कैसे टिका हो सकता है।
रेगिस्तान का कायाकल्प और चकों का विभाजन
उत्तरी राजस्थान के श्रीगंगानगर, अनूपगढ़ और बीकानेर जैसे सीमावर्ती जनपदों में पारंपरिक नामों वाले गांवों के मुकाबले ऐसे कोड आधारित नाम बहुतायत में पाए जाते हैं। इस व्यवस्था की शुरुआत 1920 के दशक में हुई थी, जब बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने इस बंजर मरुभूमि तक पानी पहुंचाने के लिए ऐतिहासिक गंग नहर का निर्माण करवाया था। आजादी के बाद जब इस क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर परियोजना का व्यापक विस्तार हुआ, तब तक यहां कोई पुरानी या घनी आबादी मौजूद नहीं थी। समूचा परिदृश्य एक विशाल, सूखा और निर्जन रेगिस्तान था, जहां इंसानी बस्तियां बसाने से पहले योजनाबद्ध सिंचाई की नींव रखी गई।
प्रशासनिक अधिकारियों और इंजीनियरों ने नहरी जल के न्यायसंगत बंटवारे और मालगुजारी के सही हिसाब के लिए पूरी बंजर भूमि को व्यवस्थित चौकोर टुकड़ों में बांटने की योजना बनाई। जमीन के इन चौकोर हिस्सों को चक नाम दिया गया। मुख्य नहरों से जब पानी को खेतों तक ले जाने के लिए वितरिकाएं और छोटी शाखाएं निकाली गईं, तो इन सभी जलधाराओं को अंग्रेजी अक्षरों के कोड दिए गए। इन वितरिकाओं से सींचे जाने वाले प्रत्येक चक को एक क्रम संख्या दी गई। कालांतर में जैसे-जैसे किसान और कामगार इन सिंचित चकों पर अपने आशियाने बनाकर बसते गए, वही नहरी चक नंबर और कोड धीरे-धीरे इन बस्तियों के पक्के और आधिकारिक नाम में तब्दील हो गए।
नहरी कोड का सटीक प्रशासनिक गणित
इस पूरे इलाके में प्रयुक्त होने वाले अक्षर और संख्याएं किसी मनमाने तरीके से नहीं चुनी गई हैं, बल्कि इसके पीछे एक बेहद सुसंगत और सटीक प्रशासनिक सिद्धांत काम करता है। गांव 50 जीबी के नाम में शामिल अंग्रेजी अक्षर और संख्या का एक स्पष्ट भौगोलिक अर्थ है
- अक्षरों की भूमिका: नाम में दर्ज अंग्रेजी अक्षर सीधे तौर पर उस मुख्य नहर, डिस्ट्रीब्यूटरी या माइनर को इंगित करते हैं जिससे उस इलाके को पानी की आपूर्ति की जाती है। उदाहरण के लिए, 50 जीबी में प्रयुक्त जीबी शब्द गजसिंहपुर बेड नामक नहर शाखा का संक्षिप्त रूप है। इसी तरह समीपवर्ती इलाकों में मिलने वाले एपीडी का मतलब अनूपगढ़ डिस्ट्रीब्यूटरी, जेएम का मतलब जैतसर माइनर तथा एच का मतलब हरिसिंहपुरा माइनर की जलधारा से है।
- संख्याओं का संकेत: नाम के आगे लगी संख्या यह स्पष्ट करती है कि संबंधित चक उस नहर या माइनर के उद्गम स्थल यानी हेड से कितनी दूरी पर अथवा किस क्रम पर स्थित है। इस प्रकार 50 जीबी का सीधा सा अर्थ है गजसिंहपुर बेड नहर के शुरुआती बिंदु से पचासवें नंबर पर स्थित चक।
विशेषज्ञों का नजरिया और चकबंदी का आधार
इस क्षेत्र के नहरी विकास और बसावट के ऐतिहासिक परिदृश्य को रेखांकित करते हुए राजकीय डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर में इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीराम नायक का कहना है
“गांवों की बसावट और उनके नामकरण के पीछे नहरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.”
नायक के मुताबिक, जब इस सीमावर्ती इलाके में नहरों का सघन जाल बिछाया गया और इसका प्रशासनिक नियंत्रण इंदिरा गांधी नहर परियोजना विभाग के हाथों में आया, तब मुख्य जलधाराओं से छोटी-छोटी नहरें और माइनर निकाली गईं। इन्हीं जलधाराओं और उनकी विभिन्न शाखाओं के आसपास इंसानी बस्तियां आबाद होती चली गईं, जिसके चलते गांवों के नाम सीधे तौर पर उन नहरों की पहचान से जुड़ गए।
वहीं भूमि बंदोबस्त, रिकॉर्ड संधारण और चकबंदी के तकनीकी पक्ष को स्पष्ट करते हुए बीकानेर स्थित जिला कलेक्टर कार्यालय के गिरदावर किशन सोनी का कहना है
“इन चकों की पहचान संख्या से होती है और इसी संख्या के आधार पर गांवों के नाम भी रखे जाते हैं, उदाहरण के तौर पर 50 जीबी चक.”
सोनी बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में नहरी पानी पहुंच चुका है, वहां चकबंदी की वैज्ञानिक व्यवस्था लागू की गई है। ऐसे नहरी इलाकों में भूखंडों का विभाजन किला और मुरब्बा प्रणाली के तहत किया जाता है, जिसमें एक किला जमीन का रकबा एक बीघा के बराबर माना जाता है। इसके विपरीत जिन इलाकों तक नहरी पानी की पहुंच नहीं हो सकी है, वहां आज भी पुरानी व्यवस्था के तहत खसरा संख्या के आधार पर ही राजस्व रिकॉर्ड तैयार किए जाते हैं। इस तरह 50 जीबी कोई संयोगवश रखा गया नाम नहीं, बल्कि मरुभूमि को उपजाऊ बनाने वाले नहरी नेटवर्क का जीवंत इतिहास है।



















