सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य विविध प्राकृतिक वन संपदा और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस संरक्षित वन क्षेत्र में कई ऐसे पेड़-पौधे उगते हैं, जिनका प्रयोग सदियों से पारंपरिक चिकित्सा, लोक उपचार तथा विभिन्न घरेलू उपयोगों में होता आया है। इन्हीं महत्वपूर्ण वनस्पतियों में रतनजोत का पौधा भी शामिल है। औषधीय दृष्टिकोण से रतनजोत को अनेक गुणों का भंडार माना जाता है, लेकिन इसके उपयोग को लेकर बेहद सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। जहां एक ओर इसकी जड़ों और पत्तियों का बाहरी उपयोग शरीर के कई विकारों में राहत देता है, वहीं दूसरी ओर इसके बीजों में प्राकृतिक रूप से विषैले तत्व मौजूद होते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन्हें खाने की भूल कर दे, तो यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।
बीजों की प्रकृति और बायोडीजल में इसका उपयोग
रतनजोत के पौधे के बीजों में तैलीय अंश की प्रचुरता पाई जाती है। तकनीकी और औद्योगिक स्तर पर, विशेष रूप से जेट्रोफा किस्म के पौधों के बीजों से बड़े पैमाने पर तेल निष्कर्षण किया जाता है। इस तेल का मुख्य और व्यावहारिक उपयोग पर्यावरण अनुकूल बायोडीजल तैयार करने में किया जाता है। हालांकि, तकनीकी रूप से उपयोगी होने के बावजूद ये बीज इंसानों और पशुओं दोनों के आंतरिक उपभोग के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं। सिरोही के सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी डॉ. दामोदर प्रसाद चतुर्वेदी का कहना है कि रतनजोत के बीजों में स्वाभाविक रूप से जहरीले गुण होते हैं। यदि कोई इंसान या बच्चा अनजाने में इन्हें साबुत निगल ले या चबा ले, तो शरीर में विषाक्तता फैल सकती है। इसके प्रत्यक्ष लक्षणों में लगातार उल्टी होना, तेज दस्त लगना और पेट में असहनीय मरोड़ व गंभीर गड़बड़ी शामिल हैं। इसी कारण इन बीजों को पालतू जानवरों और छोटे बच्चों की पहुंच से हमेशा सुरक्षित दूरी पर रखने की सलाह दी जाती है।
जड़ों का लाल रंग और पारंपरिक उपयोग
रतनजोत की विशिष्ट प्रजातियों की जड़ें एक गहरे प्राकृतिक लाल रंग का स्रोत होती हैं। प्राचीन काल से ही इस लाल अर्क का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के तेलों को रंगने, सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण और कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने में किया जाता रहा है। पारंपरिक ज्ञान के अनुसार, रतनजोत की जड़ों में ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं जो सूजन को घटाने और त्वचा को पोषण देने में सहायक सिद्ध होते हैं। पूर्व के समय में जब आधुनिक दवाएं सुलभ नहीं थीं, तब ग्रामीण और स्थानीय लोग त्वचा से जुड़े घावों, खरोंचों और सामान्य समस्याओं के प्राथमिक घरेलू उपचार के लिए रतनजोत की जड़ों से बने लेप या अर्क पर निर्भर रहते थे।
केश सज्जा और स्कैल्प के विकारों में भूमिका
बालों की सुरक्षा और मजबूती के लिए रतनजोत का उपयोग अत्यंत प्रचलित रहा है। पारंपरिक घरेलू नुस्खों के अनुसार, रतनजोत की सूखी जड़ों या छाल को शुद्ध नारियल तेल अथवा सरसों के तेल में धीमी आंच पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया से तेल का रंग लाल हो जाता है और पौधे के गुण तेल में समाहित हो जाते हैं। इस तैयार तेल से नियमित रूप से बालों और स्कैल्प की मालिश करने से रक्त संचार सुधरता है, बालों का गिरना नियंत्रित होता है और नए बालों के विकास में सहायता मिलती है। इसमें मौजूद एंटी-माइक्रोबियल तत्वों की वजह से यह स्कैल्प पर होने वाले फंगल संक्रमण और रूसी की समस्या को दूर रखने में भी प्रभावी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, समय से पहले सफेद होते बालों को रोकने के लिए रतनजोत के पाउडर को आंवला पाउडर के साथ मिलाकर लगाने का नुस्खा भी लंबे समय से आजमाया जाता रहा है। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन सभी पारंपरिक फायदों को लेकर वर्तमान में पर्याप्त और ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
त्वचा की रंगत निखारने और सौंदर्य देखभाल में प्रयोग
सौंदर्य निखार के क्षेत्र में रतनजोत के पाउडर का उपयोग फेस पैक के रूप में खूब किया जाता रहा है। पारंपरिक विधि में इस बारीक चूर्ण को शुद्ध गुलाब जल के साथ मिलाकर एक मुलायम पेस्ट तैयार किया जाता है और चेहरे पर लगाया जाता है। मान्यता है कि यह लेप त्वचा की रंगत में सुधार लाता है, चेहरे की मृत कोशिकाओं को हटाता है और त्वचा पर एक प्राकृतिक चमक प्रदान करता है। पौधे में मौजूद एंटी-माइक्रोबियल क्षमता के कारण इसे त्वचा की खुजली, एक्जिमा, लालिमा और फोड़े-फुंसियों जैसी परेशानियों के पारंपरिक समाधान के तौर पर भी देखा जाता है। इसके बावजूद, संवेदनशील त्वचा या गंभीर डर्मेटोलॉजिकल विकारों से ग्रस्त लोगों को इसका प्रयोग करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक वैद्य या चर्म रोग विशेषज्ञ से विधिवत परामर्श अवश्य लेना चाहिए।
जोड़ों के दर्द और अन्य बीमारियों के घरेलू दावे
रतनजोत के बीजों से निकलने वाले तेल का बाहरी इस्तेमाल पुराने जोड़ों के दर्द, गठिया की सूजन और मांसपेशियों की ऐंठन व खिंचाव को कम करने के लिए मालिश तेल के रूप में किया जाता रहा है। दूसरी ओर, इसकी जड़ों और ताजी पत्तियों को सुखाकर तैयार किए गए बारीक मंजन को मसूड़ों की कमजोरी और मुंह की तकलीफों के घरेलू उपचार में उपयोगी बताया गया है। पारंपरिक लोक चिकित्सा में इसकी जड़ों के हल्के काढ़े का प्रयोग तेज बुखार को उतारने, रक्तचाप को सामान्य बनाए रखने और हृदय के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए भी किया जाता था। परंतु इन सभी चिकित्सकीय दावों के समर्थन में व्यापक वैज्ञानिक शोध या नैदानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं। चूंकि रतनजोत के बीजों और इसके आंतरिक तत्वों में विषैलापन हो सकता है, इसलिए किसी भी रूप में इसका काढ़ा या कोई अन्य उत्पाद बिना किसी पंजीकृत विशेषज्ञ की सलाह और निगरानी के सीधे मुंह से सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।



















