राजस्थान के जालोर जिले में बजरंगबली के कई ऐसे पवित्र धाम मौजूद हैं, जिनकी धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि श्रद्धालुओं को हैरान कर देती हैं। सैकड़ों साल पुराने इन तीर्थस्थलों में किसी की ख्याति जमीन से अपने आप प्रकट हुई प्रतिमा के कारण है, तो किसी धाम पर आज भी छत का निर्माण नहीं किया गया है। अलग-अलग स्वरूपों में पूजे जाने वाले इन मंदिरों में नियमित रूप से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं।
आलासन गांव का 300 साल पुराना मंदिर और 35 फीट ऊंची प्रतिमा
जालोर के आलासन गांव में स्थित हनुमान मंदिर लगभग 300 साल पुरानी अटूट धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, एक बार जब यह पूरा क्षेत्र भीषण अकाल के संकट से जूझ रहा था, उसी दौरान जाल के पेड़ के नीचे जमीन से अचानक हनुमान जी की मूर्ति प्रकट हुई थी। इस चमत्कारिक घटना के बाद गांव के लोगों ने एकजुट होकर वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वर्तमान समय में मंदिर परिसर के भीतर स्थापित 35 फीट ऊंची हनुमान जी की विशाल प्रतिमा यहां का मुख्य आकर्षण है। दूर-दराज के इलाकों से आने वाले भक्तों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु यहां सच्चे मन से मन्नत मांगता है, उसकी हर मनोकामना निश्चित तौर पर पूरी होती है।
कानीवाड़ा का पातालेश्वर मंदिर, जहां 800 साल से नहीं बनी छत
जालोर शहर से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर कानीवाड़ा गांव में पातालेश्वर हनुमान जी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस तीर्थ की मान्यता है कि यहां स्थापित प्रतिमा इंसानों द्वारा नहीं रखी गई, बल्कि स्वयं पाताल यानी धरती के भीतर से प्रकट हुई थी। मंदिर के पुजारी के अनुसार, जमीन से स्वयं प्रकट होने के कारण ही इन्हें पातालेश्वर हनुमान जी का नाम दिया गया और यह परंपरा कई पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 800 साल पुराना माना जाता है, मगर सबसे अनूठी बात यह है कि आज तक प्रतिमा के ऊपर किसी तरह की छत नहीं बनाई गई है। हर मंगलवार और शनिवार के दिन यहां विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पैदल चलकर दर्शन करने पहुंचते हैं।
सायला में द्रविड़ वास्तुकला और दक्षिण भारतीय शैली का संगम
जालोर से लगभग 35 किलोमीटर दूर सायला कस्बे के मुख्य मार्ग पर बना हनुमान मंदिर अपनी भव्य और आकर्षक बनावट के लिए जाना जाता है। इस मंदिर की अनूठी सुंदरता हर राहगीर को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर का पूरा निर्माण तमिलनाडु से आए कुशल कारीगरों ने पारंपरिक द्रविड़ शैली में किया है। राजस्थान की धरती पर दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला और नक्काशी की यह झलक इस मंदिर को क्षेत्र के बाकी सभी धार्मिक स्थलों से बिल्कुल अलग और दर्शनीय बनाती है।
जागृत स्वरूप में बालाजी और सिरोही सीमा पर महाभारत कालीन जुड़ाव
जालोर क्षेत्र में बालाजी का एक अन्य पवित्र धाम भी जनमानस के बीच गहरी आस्था का विषय है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यहां बालाजी महाराज पूर्णतः जागृत स्वरूप में विराजमान हैं, जहां भक्त अपनी पीड़ा और प्रार्थनाएं लेकर आते हैं। यहां बालाजी को किसी पारंपरिक बंधन के बजाय स्वतंत्र और चैतन्य रूप में पूजे जाने का अनोखा विधान है।
इसके अलावा, जालोर से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य मंदिर अपनी भौगोलिक स्थिति और पौराणिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का एक मुख्य प्रवेश द्वार जालोर जिले की सीमा में खुलता है, जबकि दूसरा द्वार सिरोही जिले की तरफ बना हुआ है। लोकमान्यता के अनुसार, महाभारत काल के दौरान अपने अज्ञातवास के समय पांडवों ने यहां कुछ समय रुककर विश्राम किया था। इस मार्ग से गुजरने वाली निजी गाड़ियां और राज्य परिवहन की रोडवेज बसें भी मंदिर के सम्मान में कुछ पलों के लिए रुकती हैं और यात्री शीश नवाकर आगे बढ़ते हैं।



















