राजस्थान के ऐतिहासिक जालोर दुर्ग की पहचान न केवल उसकी अजेय दीवारों और शौर्य गाथाओं से है, बल्कि इसके भीतर आस्था का एक अनूठा केंद्र भी विद्यमान है। दुर्ग परिसर में स्थित सोमनाथ महादेव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बेहद पूजनीय स्थल माना जाता है। क्षेत्र में प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर के गर्भगृह में स्थापित पवित्र शिवलिंग का सीधा नाता गुजरात के विश्वविख्यात सोमनाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है।
खिलजी के आक्रमण और राजा कान्हड़देव का संघर्ष
इतिहास के पन्नों में दर्ज विवरण के अनुसार, जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर हमला बोला था, तब जालोर के शासक राजा कान्हड़देव सोनगरा चौहान ने खिलजी की आक्रांता सेना को कड़ी चुनौती दी थी। दोनों पक्षों के बीच हुए भीषण सैन्य संघर्ष के दौरान उस पावन शिवलिंग को खिलजी के सैनिकों से छुड़ा लिया गया। इसके उपरांत उसे ससम्मान जालोर लाया गया और दुर्ग की सुरक्षा के बीच स्थापित किया गया। यही मुख्य कारण है कि दुर्ग में बने इस धार्मिक स्थल को सोमनाथ महादेव मंदिर के नाम से पुकारा जाता है।
एक ही पत्थर से तराशा गया विग्रह
मंदिर के पुजारी गजेंद्र शर्मा के अनुसार, यह मान्यता पूरी तरह स्थापित है कि यह शिवलिंग सोमनाथ से संबंधित है और इसे राजा कान्हड़देव के शासनकाल में जालोर लाया गया था। इस विग्रह की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह शिवलिंग एक ही अखंड पत्थर से निर्मित है। दुर्ग की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण मंदिर का परिवेश बेहद शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा प्रतीत होता है, जो इतिहास और भक्ति का एक दुर्लभ संगम प्रस्तुत करता है।
मनोकामना पूर्ति की गहरी आस्था
स्थानीय समाज में यह अटूट विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन और निष्ठा के साथ यहां प्रार्थना करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। वर्तमान समय में भी मंदिर में नियमित रूप से पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। जालोर दुर्ग का भ्रमण करने आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर प्राचीन इतिहास और धार्मिक निष्ठा को करीब से देखने का माध्यम बना हुआ है।


















