उपवास के दिनों में कमजोरी दूर भगाएंगे मेवों से बने चूरमा लड्डू, जानिए आसान विधि और फायदेवैश्विक बाजार में छा रहा मिथिला मखाना, पांच वर्षों में 30 हजार मीट्रिक टन विदेशी बिक्री की तैयारीबस्तर के जगदलपुर में कांतारा फिल्म की तर्ज पर सजा अनोखा दुर्गा पंडाल, बांस की कारीगरी बनी मुख्य आकर्षणकांग्रेस के वरिष्ठ नेता दीपक बाबरिया का शनिवार को निधन, कई राज्यों में संभाली थी संगठन की कमानआंध्र प्रदेश में रेलवे ट्रैक किनारे असम की छात्रा का शव मिलने के बाद एसआईटी जाँच शुरूचूरू के सूरवास स्कूल में मिड-डे मील में गिरी छिपकली, 36 से ज्यादा मासूम बच्चे अस्पताल में भर्तीदिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के बीच नितिन नवीन का विपक्ष पर बड़ा हमला, विदेशी ताकतों के इशारे पर अशांति फैलाने का लगाया आरोपगाय-भैंस में थनैला रोग के लक्षण पहचानें और आजमाएं असरदार देसी नुस्खेलगातार चार विफलताओं के बाद सेना में भर्ती हुआ बेटा, आंध्र प्रदेश के मुस्लिम दंपति ने पंडाल सजाकर की गणपति पूजाबजट फ्रेंडली सेडान की तलाश में हैं तो टाटा एरिस से लेकर मारुति डिजायर तक देखें ये चार विकल्प
राजस्थान के करौली में महिलाओं ने संजोई ढाई सौ साल पुरानी सांझी लोककला, पितृ पक्ष में 15 दिनों तक दीवारों पर उकेरी जाती हैं अनूठी आकृतियांराजस्थान
10 अक्तू॰ 2026, 1:10 pm (1 घंटे पहले)· 0

राजस्थान के करौली में महिलाओं ने संजोई ढाई सौ साल पुरानी सांझी लोककला, पितृ पक्ष में 15 दिनों तक दीवारों पर उकेरी जाती हैं अनूठी आकृतियां

करौली में श्राद्ध पक्ष के दौरान लगभग 250 वर्ष पुरानी सांझी बनाने की लोक परंपरा आज भी जीवंत है, जहां महिलाएं गाय के गोबर, प्राकृतिक रंगों और फूलों से प्रतिदिन नई आकृतियां बनाकर भक्तिभाव से पूजन करती हैं।

राजस्थान के करौली जिले में आधुनिक जीवनशैली के बीच सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही हैं। पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष के दौरान करौली शहर तथा आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 250 साल पुरानी पारंपरिक सांझी कला की जीवंत छटा दिखाई दे रही है। शहर के भूड़ारा बाजार, वैशाली नगर सहित कई प्रमुख मोहल्लों में महिलाएं और नवविवाहिताएं अपने घरों के आंगनों तथा दीवारों पर गाय के गोबर एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर आकर्षक सांझी तैयार कर रही हैं और श्रद्धापूर्वक दैनिक पूजा-अर्चना कर रही हैं।

पंद्रह दिनों तक प्रतिदिन नए स्वरूप में सजती है सांझी

सनातन रीति-रिवाजों और पारंपरिक लोक मान्यताओं के अनुसार सांझी निर्माण व पूजन का यह क्रम पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होकर अमावस्या तक पूरे 15 दिनों तक निरंतर चलता है। स्थानीय महिलाएं और नवविवाहिताएं प्रतिदिन सुबह और शाम के समय गाय के ताजे गोबर से दीवारों तथा धरातल पर सुंदर कलात्मक आकृतियां उकेरती हैं। इन आकृतियों को प्राकृतिक रंगों, विभिन्न प्रकार की पत्तियों और ताजे रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है। हर दिन सांझी को एक नया रूप और विषय दिया जाता है, जिसे देखने और सामूहिक पूजन में भाग लेने के लिए आस-पड़ोस की महिलाएं बड़ी संख्या में एकत्र होती हैं।

ये भी पढ़ें

पारंपरिक लोकगीतों, भजन और नृत्य से जीवंत होते हैं मोहल्ले

सांझी पूजन के समय पूरे क्षेत्र में किसी बड़े उत्सव जैसा वातावरण बन जाता है। शाम की नियमित पूजा और आरती संपन्न होने के बाद महिलाएं टोलियों में एकत्रित होकर पारंपरिक लोकगीत और भजनों का गायन करती हैं। ढोलक की थाप पर महिला संगीत और लोकनृत्य का आयोजन किया जाता है, जिससे यह लोक आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहज रूप से आगे बढ़ रही है। इस पंद्रह दिवसीय अनुष्ठान का समापन पितृ अमावस्या के दिन विशेष धार्मिक कार्यक्रमों के साथ होता है। अंतिम दिन गोबर के स्थान पर केवल अबीर, गुलाल और विभिन्न रंगों से भव्य सांझी बनाई जाती है, तथा महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाकर नृत्य-संगीत के साथ इस उत्सव को पूर्ण करती हैं।

मदनमोहन जी मंदिर से जुड़ा गहरा सांस्कृतिक महत्व

करौली की इस ऐतिहासिक सांझी परंपरा का संबंध यहां के प्रसिद्ध आराध्य देव भगवान श्री मदनमोहन जी मंदिर की सांस्कृतिक विरासत से भी अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ है। यह लोक परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं में सामाजिक एकजुटता बढ़ाने और राजस्थान की समृद्ध लोक कला को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी है। परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से कला के हुनर सीखकर नई पीढ़ी की युवतियां और बालिकाएं इस ढाई सौ साल पुरानी विरासत को बड़े उत्साह और गर्व के साथ आगे बढ़ा रही हैं।

सवाल-जवाब

करौली में सांझी बनाने की परंपरा कितने वर्षों से चली आ रही है?
करौली में सांझी बनाने और पूजन की यह ऐतिहासिक लोक परंपरा लगभग 250 वर्षों से निरंतर चली आ रही है।
सांझी का निर्माण और पूजन किस अवसर पर किया जाता है?
यह परंपरा श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) के दौरान प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तक लगातार 15 दिनों तक निभाई जाती है।
सांझी बनाने में किन प्राकृतिक सामग्रियों का प्रयोग होता है?
महिलाएं गाय के गोबर से आकृतियां उकेरती हैं और उन्हें ताजे फूलों, पत्तियों, अबीर, गुलाल तथा प्राकृतिक रंगों से सजाती हैं।
करौली के किन प्रमुख इलाकों में यह परंपरा प्रमुखता से देखी जाती है?
करौली शहर के भूड़ारा बाजार और वैशाली नगर सहित विभिन्न मोहल्लों तथा ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा पूरी आस्था के साथ निभाई जाती है।
इस परंपरा का संबंध किस प्रसिद्ध मंदिर से है?
करौली की सांझी परंपरा का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व यहां के प्रसिद्ध आराध्य देव भगवान श्री मदनमोहन जी मंदिर से गहराई से जुड़ा है।
पंद्रह दिवसीय सांझी उत्सव का समापन किस दिन होता है?
इस परंपरा का समापन पितृ अमावस्या पर होता है, जहां अंतिम दिन केवल रंगों व अबीर-गुलाल से भव्य सांझी बनाकर उत्सव मनाया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 मिनट पहले

आजकल की भागदौड़ में ऐसी पुरानी कला और परंपराओं को सहेज कर रखना वाक़ई बहुत बड़ी बात है। करौली की महिलाओं ने जिस तरह ढाई सौ साल पुरानी सांझी कला को जीवित रखा है, वह देखकर बहुत अच्छा लगा।

Ravikash Gupta@ravikash·5 मिनट पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने! वैसे वैशाली नगर और भूड़ारा बाजार वाली बात सच में बढ़िया लगी.

Karan Malhotra@karan-malhotra·24 मिनट पहले

ढाई सौ साल पुरानी परंपरा आज भी घरों में जिंदा है, यह देखकर बहुत अच्छा लगा। गोबर और फूलों से दीवारों पर ऐसी कलाकारी करना सच में कमाल है।

Rohan Verma@rohan-verma·24 मिनट पहले

करन जी, बात तो आपकी सही है। पर क्या नई पीढ़ी की युवतियां भी इसे आगे बढ़ा रही हैं?

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp