राजस्थान के करौली जिले में आधुनिक जीवनशैली के बीच सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही हैं। पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष के दौरान करौली शहर तथा आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 250 साल पुरानी पारंपरिक सांझी कला की जीवंत छटा दिखाई दे रही है। शहर के भूड़ारा बाजार, वैशाली नगर सहित कई प्रमुख मोहल्लों में महिलाएं और नवविवाहिताएं अपने घरों के आंगनों तथा दीवारों पर गाय के गोबर एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर आकर्षक सांझी तैयार कर रही हैं और श्रद्धापूर्वक दैनिक पूजा-अर्चना कर रही हैं।
पंद्रह दिनों तक प्रतिदिन नए स्वरूप में सजती है सांझी
सनातन रीति-रिवाजों और पारंपरिक लोक मान्यताओं के अनुसार सांझी निर्माण व पूजन का यह क्रम पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होकर अमावस्या तक पूरे 15 दिनों तक निरंतर चलता है। स्थानीय महिलाएं और नवविवाहिताएं प्रतिदिन सुबह और शाम के समय गाय के ताजे गोबर से दीवारों तथा धरातल पर सुंदर कलात्मक आकृतियां उकेरती हैं। इन आकृतियों को प्राकृतिक रंगों, विभिन्न प्रकार की पत्तियों और ताजे रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है। हर दिन सांझी को एक नया रूप और विषय दिया जाता है, जिसे देखने और सामूहिक पूजन में भाग लेने के लिए आस-पड़ोस की महिलाएं बड़ी संख्या में एकत्र होती हैं।
पारंपरिक लोकगीतों, भजन और नृत्य से जीवंत होते हैं मोहल्ले
सांझी पूजन के समय पूरे क्षेत्र में किसी बड़े उत्सव जैसा वातावरण बन जाता है। शाम की नियमित पूजा और आरती संपन्न होने के बाद महिलाएं टोलियों में एकत्रित होकर पारंपरिक लोकगीत और भजनों का गायन करती हैं। ढोलक की थाप पर महिला संगीत और लोकनृत्य का आयोजन किया जाता है, जिससे यह लोक आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहज रूप से आगे बढ़ रही है। इस पंद्रह दिवसीय अनुष्ठान का समापन पितृ अमावस्या के दिन विशेष धार्मिक कार्यक्रमों के साथ होता है। अंतिम दिन गोबर के स्थान पर केवल अबीर, गुलाल और विभिन्न रंगों से भव्य सांझी बनाई जाती है, तथा महिलाएं हाथों में मेहंदी लगाकर नृत्य-संगीत के साथ इस उत्सव को पूर्ण करती हैं।
मदनमोहन जी मंदिर से जुड़ा गहरा सांस्कृतिक महत्व
करौली की इस ऐतिहासिक सांझी परंपरा का संबंध यहां के प्रसिद्ध आराध्य देव भगवान श्री मदनमोहन जी मंदिर की सांस्कृतिक विरासत से भी अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ है। यह लोक परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं में सामाजिक एकजुटता बढ़ाने और राजस्थान की समृद्ध लोक कला को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी है। परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से कला के हुनर सीखकर नई पीढ़ी की युवतियां और बालिकाएं इस ढाई सौ साल पुरानी विरासत को बड़े उत्साह और गर्व के साथ आगे बढ़ा रही हैं।






















