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राजस्थान के मारवाड़ में बबूल की कोमल पत्तियों से तैयार होती है सेहतमंद पारंपरिक तरकारी, जानें बनाने का तरीकाराजस्थान
27 अक्तू॰ 2026, 7:10 am (12 घंटे पहले)· 1

राजस्थान के मारवाड़ में बबूल की कोमल पत्तियों से तैयार होती है सेहतमंद पारंपरिक तरकारी, जानें बनाने का तरीका

मरुधरा के पारंपरिक खान-पान में बबूल के नए पत्तों की सब्जी स्वाद और सेहत का अनोखा संगम पेश करती है। पेट की तंदुरुस्ती और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली इस डिश को बाजरे की रोटी के साथ खूब पसंद किया जाता है।

रेगिस्तानी आबोहवा और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतरीन इस्तेमाल के लिए मशहूर पश्चिमी राजस्थान की पाक कला में कई ऐसे अनूठे व्यंजन शामिल हैं, जो औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। मारवाड़ के ग्रामीण अंचलों और ढाणियों से लेकर शहरी घरों तक, कांटेदार बबूल के पेड़ की नई और मुलायम पत्तियों का इस्तेमाल एक खास तरकारी पकाने में किया जाता है। जिसे आम तौर पर केवल लकड़ी या छाया देने वाला दरख्त समझा जाता है, उसके नए अंकुर पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और मौसमी बदलावों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में बेहद कारगर माने जाते हैं। स्थानीय परंपराओं में रचे-बसे इस भोजन को प्रकृति के साथ संतुलन बिठाने वाली रसोई का बेहतरीन नमूना माना जाता है।

स्वास्थ्य और स्वाद का सदियों पुराना घरेलू नुस्खा

थार के परिवेश में विकसित हुआ खान-पान प्राकृतिक नियमों और आयुर्वेद के सिद्धांतों के बेहद करीब रहा है। बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान के अनुसार बबूल की ताजी कॉपलों और मुलायम पत्तों में ऐसे तत्व होते हैं जो उदर विकारों से राहत दिलाने के साथ-साथ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं। जब रोजमर्रा की हरी सब्जियों से कुछ अलग पकाने की इच्छा होती है, तब मारवाड़ के रसोइयों में इन पत्तियों को मसालों के साथ सहेजकर यह खास व्यंजन तैयार किया जाता है। मौसम की मार झेलने वाले मरुस्थलीय इलाकों में यह भोजन शरीर को ठंडक और आंतरिक शक्ति दोनों मुहैया कराता है।

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व्यंजन पकाने के लिए जरूरी सामग्री

इस अनूठी मारवाड़ी रेसिपी को पारंपरिक विधि से तैयार करने के लिए रसोई में निम्नलिखित सामग्रियों की जरूरत पड़ती है

  • ताजी पत्तियां: लगभग 1 कटोरी कोमल और नई बबूल की पत्तियां।
  • बेसन: ग्रेवी को जरूरी गाढ़ापन और चिकनाई देने के लिए 2 से 3 चम्मच बेसन।
  • दही या छाछ: तरकारी में हल्का खट्टा स्वाद और संतुलन लाने के लिए 1 कप मट्ठा अथवा दही।
  • तेल या घी: तड़के और छौंक के लिए 2 बड़े चम्मच शुद्ध सरसों का तेल या देसी घी।
  • मसाले: पिसा हुआ लहसुन, कटी हरी मिर्च, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और नमक जरूरत के मुताबिक।

पकाने का चरणबद्ध मारवाड़ी तरीका

इस व्यंजन को बनाने की शुरुआत बबूल की टहनियों से मुलायम, हल्के हरे रंग की नई पत्तियों को सावधानीपूर्वक चुनने के साथ होती है। पत्तियों को तोड़ने के बाद उन्हें साफ पानी से दो-तीन बार धोया जाता है ताकि धूल-मिट्टी पूरी तरह साफ हो जाए। इसके बाद इन पत्तियों को थोड़े से पानी में हल्का खौलाया जाता है, जिससे इनका प्राकृतिक कसैलापन और कड़वा स्वाद पानी में घुलकर अलग हो सके। उबलने के तुरंत बाद पत्तियों को पानी से छानकर हल्के हाथों से दबाते हुए अतिरिक्त पानी निकाल लिया जाता है।

अगले चरण में कड़ाही में देसी घी या सरसों के तेल को गर्म किया जाता है। गर्म वसा में जीरा, हींग और कटी हुई हरी मिर्च डालकर तड़का तैयार किया जाता है। इसके पश्चात लहसुन का पेस्ट और सूखे मसाले डालकर धीमी आंच पर भुनाई की जाती है। एक अलग कटोरे में दही अथवा छाछ के साथ बेसन को एकसार घोल लिया जाता है ताकि कोई गांठ न रहे। भुने हुए मसाले में उबली हुई पत्तियां और यह बेसन-दही का मिश्रण मिला दिया जाता है। इस कढ़ीनुमा रस को मंद आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक कि तरी किनारों पर तेल न छोड़ दे और खुशबूदार गाढ़ापन न आ जाए। तैयार होने के बाद इसे गरमा-गरम बाजरे के सोगरे या मक्के की रोटी के साथ परोसा जाता है, जिससे इसका देसी जायका पूरी तरह निखरकर आता है।

सवाल-जवाब

बबूल की पत्तियों की सब्जी किन इलाकों में विशेष रूप से बनाई जाती है?
यह सब्जी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के गांवों, ढाणियों और पारंपरिक रसोईघरों में खास तौर पर बनाई जाती है।
इस तरकारी के सेवन से शरीर को क्या स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं?
बुजुर्गों की मान्यता के अनुसार यह सब्जी पेट के स्वास्थ्य को सुधारने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है।
पत्तियों को पकाने से पहले उबालना क्यों जरूरी होता है?
बबूल की ताजी पत्तियों को हल्के पानी में उबालने से उनका प्राकृतिक कसैलापन और कड़वा स्वाद आसानी से निकल जाता है।
इस व्यंजन की तरी तैयार करने के लिए किन प्रमुख चीजों का मिश्रण बनता है?
दही या छाछ में दो से तीन चम्मच बेसन और पिसे हुए मसालों को मिलाकर गाढ़ी तरी बनाई जाती है।
इस सब्जी को किस तरह की रोटी के साथ परोसना सबसे अच्छा माना जाता है?
इसे बाजरे के गरमा-गरम सोगरे या मक्के की रोटी के साथ परोसने पर इसका पारंपरिक स्वाद सबसे बेहतरीन लगता है।
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टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·8 घंटे पहले

बबूल की पत्तियों से सब्जी बनाने का यह पारंपरिक तरीका वाकई दिलचस्प है। रेगिस्तान की आबोहवा में आयुर्वेद और स्वाद का ऐसा मेल देखकर मरुधरा की जीवनशैली से प्यार हो जाता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 घंटे पहले

बबूल के पत्तों की सब्जी सुनकर थोड़ा अजीब लगा, क्या इसका कड़वापन पूरी तरह निकल जाता है?

Ravikash Gupta@ravikash·8 घंटे पहले

अर्जुन जी, उबालने के बाद पानी से धोने से इसका कड़वापन बिल्कुल निकल जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 घंटे पहले

मारवाड़ में बबूल के पत्तों की ऐसी सब्जी वाकई कमाल है। रेगिस्तान की मुश्किलों के बीच पारंपरिक खान-पान का यह नायाब तरीका है, और छाछ के साथ इसका स्वाद लाजवाब रहता होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·8 घंटे पहले

करण भाई, सच में! छाछ के साथ बबूल के पत्तों का यह मेल रेगिस्तानी ठाठ का असली स्वाद है।

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