रेगिस्तानी आबोहवा और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतरीन इस्तेमाल के लिए मशहूर पश्चिमी राजस्थान की पाक कला में कई ऐसे अनूठे व्यंजन शामिल हैं, जो औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। मारवाड़ के ग्रामीण अंचलों और ढाणियों से लेकर शहरी घरों तक, कांटेदार बबूल के पेड़ की नई और मुलायम पत्तियों का इस्तेमाल एक खास तरकारी पकाने में किया जाता है। जिसे आम तौर पर केवल लकड़ी या छाया देने वाला दरख्त समझा जाता है, उसके नए अंकुर पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और मौसमी बदलावों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में बेहद कारगर माने जाते हैं। स्थानीय परंपराओं में रचे-बसे इस भोजन को प्रकृति के साथ संतुलन बिठाने वाली रसोई का बेहतरीन नमूना माना जाता है।
स्वास्थ्य और स्वाद का सदियों पुराना घरेलू नुस्खा
थार के परिवेश में विकसित हुआ खान-पान प्राकृतिक नियमों और आयुर्वेद के सिद्धांतों के बेहद करीब रहा है। बुजुर्गों के पारंपरिक ज्ञान के अनुसार बबूल की ताजी कॉपलों और मुलायम पत्तों में ऐसे तत्व होते हैं जो उदर विकारों से राहत दिलाने के साथ-साथ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं। जब रोजमर्रा की हरी सब्जियों से कुछ अलग पकाने की इच्छा होती है, तब मारवाड़ के रसोइयों में इन पत्तियों को मसालों के साथ सहेजकर यह खास व्यंजन तैयार किया जाता है। मौसम की मार झेलने वाले मरुस्थलीय इलाकों में यह भोजन शरीर को ठंडक और आंतरिक शक्ति दोनों मुहैया कराता है।
व्यंजन पकाने के लिए जरूरी सामग्री
इस अनूठी मारवाड़ी रेसिपी को पारंपरिक विधि से तैयार करने के लिए रसोई में निम्नलिखित सामग्रियों की जरूरत पड़ती है
- ताजी पत्तियां: लगभग 1 कटोरी कोमल और नई बबूल की पत्तियां।
- बेसन: ग्रेवी को जरूरी गाढ़ापन और चिकनाई देने के लिए 2 से 3 चम्मच बेसन।
- दही या छाछ: तरकारी में हल्का खट्टा स्वाद और संतुलन लाने के लिए 1 कप मट्ठा अथवा दही।
- तेल या घी: तड़के और छौंक के लिए 2 बड़े चम्मच शुद्ध सरसों का तेल या देसी घी।
- मसाले: पिसा हुआ लहसुन, कटी हरी मिर्च, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और नमक जरूरत के मुताबिक।
पकाने का चरणबद्ध मारवाड़ी तरीका
इस व्यंजन को बनाने की शुरुआत बबूल की टहनियों से मुलायम, हल्के हरे रंग की नई पत्तियों को सावधानीपूर्वक चुनने के साथ होती है। पत्तियों को तोड़ने के बाद उन्हें साफ पानी से दो-तीन बार धोया जाता है ताकि धूल-मिट्टी पूरी तरह साफ हो जाए। इसके बाद इन पत्तियों को थोड़े से पानी में हल्का खौलाया जाता है, जिससे इनका प्राकृतिक कसैलापन और कड़वा स्वाद पानी में घुलकर अलग हो सके। उबलने के तुरंत बाद पत्तियों को पानी से छानकर हल्के हाथों से दबाते हुए अतिरिक्त पानी निकाल लिया जाता है।
अगले चरण में कड़ाही में देसी घी या सरसों के तेल को गर्म किया जाता है। गर्म वसा में जीरा, हींग और कटी हुई हरी मिर्च डालकर तड़का तैयार किया जाता है। इसके पश्चात लहसुन का पेस्ट और सूखे मसाले डालकर धीमी आंच पर भुनाई की जाती है। एक अलग कटोरे में दही अथवा छाछ के साथ बेसन को एकसार घोल लिया जाता है ताकि कोई गांठ न रहे। भुने हुए मसाले में उबली हुई पत्तियां और यह बेसन-दही का मिश्रण मिला दिया जाता है। इस कढ़ीनुमा रस को मंद आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक कि तरी किनारों पर तेल न छोड़ दे और खुशबूदार गाढ़ापन न आ जाए। तैयार होने के बाद इसे गरमा-गरम बाजरे के सोगरे या मक्के की रोटी के साथ परोसा जाता है, जिससे इसका देसी जायका पूरी तरह निखरकर आता है।
























