राजस्थान के जालोर जिले के ऐतिहासिक भीनमाल इलाके में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित क्षीमकरी माता मंदिर देश भर के श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था और भक्ति का मुख्य केंद्र बना हुआ है। पहाड़ की चोटी पर बने इस प्राचीन मंदिर की प्राकृतिक छटा देखने लायक है और यहाँ से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी काफी दिलचस्प और अलौकिक मानी जाती हैं। सदियों से यह पवित्र धाम देश के कोने-कोने से आने वाले लाखों भक्तों की अगाध श्रद्धा का प्रमुख आधार रहा है, जो हर साल बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुँचते हैं।
मंदिर के इतिहास और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस पूरे क्षेत्र में उत्तमौजा नाम का एक बहुत ही क्रूर दैत्य भयंकर आतंक मचाया करता था। उस दैत्य के अत्याचारों से तंग आकर जब आम लोग पूरी तरह परेशान हो गए, तब उन्होंने प्रसिद्ध तपस्वी ऋषि गौतम की शरण ली। लोगों की पुकार सुनकर ऋषि गौतम ने गायत्री और सावित्री मंत्रों के विशेष अनुष्ठान की शक्ति से एक विशाल महायज्ञ की अग्नि प्रज्वलित की। उस यज्ञ की अग्नि से प्रकट होकर देवी क्षीमकरी ने उस अत्याचारी दैत्य का संहार किया और क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
इस इलाके को हमेशा के लिए सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से देवी ने एक बहुत बड़ा पर्वत उस मरे हुए दैत्य के ऊपर रख दिया था। इसके बाद जब भक्तों ने माता से वहीं रुकने का विशेष आग्रह किया, तो देवी उसी पर्वत पर हमेशा के लिए स्थापित हो गईं और तभी से इस पावन स्थल पर पूजा-पाठ करने की परंपरा शुरू हुई। समय के साथ यह स्थान एक बड़े धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो गया, जहाँ दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें मांगने आते हैं।
स्थानीय स्तर पर क्षीमकरी माता को बड़े प्रेम और आदर के साथ खीमज माता के नाम से भी पुकारा जाता है और उनकी उसी रूप में आराधना की जाती है। इसके अलावा, इस देवी को प्रसिद्ध सोलंकी राजपूत वंश की कुलदेवी के रूप में भी बहुत मान्यता प्राप्त है। यही मुख्य कारण है कि राजस्थान के साथ-साथ पड़ोसी राज्य गुजरात और देश के अन्य विभिन्न राज्यों से सोलंकी वंश के तमाम वंशज और अन्य श्रद्धालु माता के दरबार में हाजिरी लगाने पहुँचते हैं।
खास तौर पर शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पवित्र दिनों के अलावा अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर इस मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ती है और यहाँ एक बड़े मेले जैसा माहौल देखने को मिलता है। इस मंदिर से जुड़ी सबसे खास और अनूठी बात यह है कि यहाँ आने वाले भक्तों के लिए माता के प्रति भक्ति सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि यह उनके रोजमर्रा के जीवन और व्यापारिक कामकाज से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
गुजरात के पाटन शहर से यात्रा पर आईं एक महिला श्रद्धालु ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम माता के नाम पर ही रखा है। उनका यह पक्का विश्वास है कि उनके कारोबार में जो लगातार अपार सफलता और बरकत मिल रही है, वह सब क्षीमकरी माता की ही विशेष कृपा का परिणाम है। इस क्षेत्र के व्यापारियों और आम लोगों का यह अटूट विश्वास बन चुका है कि माता का नाम लेकर यदि किसी नए काम की शुरुआत की जाए, तो उसमें सफलता अवश्य मिलती है और व्यक्ति को जीवन में एक अद्भुत मानसिक संबल प्राप्त होता है।
























