राजस्थान के नागौर जिले में स्थित डेहरू गांव का डरासिया माता मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और लोक मान्यताओं के कारण देश भर में एक विशेष स्थान रखता है। यह धार्मिक स्थल केवल एक पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यहां की हर एक प्रथा सदियों पुराने इतिहास और आस्था की कहानी कहती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भक्तों द्वारा माता की पूरी प्रतिमा के दर्शन नहीं किए जाते, बल्कि केवल उनके घुटनों के हिस्से की ही पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल दूर-दराज से आने वाले लाखों श्रद्धालु इस अलौकिक रूप के दर्शन करके खुद को धन्य मानते हैं और माता के चरणों में अपनी हाजिरी लगाते हैं।
लगभग 1800 साल पुराना है प्रकट होने का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, डरासिया माता की यह प्रतिमा आज से करीब 1800 साल पहले जमीन से प्रकट हुई थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानियों के मुताबिक, जब यह दिव्य प्रतिमा जमीन से ऊपर आ रही थी, तब वहां से एक चरवाहे का गुजरना हुआ। जैसे ही चरवाहे ने इस चमत्कार को देखकर आश्चर्य में आवाज लगाई, वैसे ही मूर्ति का जमीन से बाहर आना वहीं थम गया। ऐसा माना जाता है कि चरवाहे की उस आवाज के कारण माता का पूरा स्वरूप बाहर नहीं आ पाया और केवल घुटनों तक का हिस्सा ही धरती पर स्थिर रह गया। तभी से इस पावन स्थल पर माता के घुटनों की पूजा करने की परंपरा अटूट रूप से चली आ रही है। इस घटना से जुड़ा विशेष दिन माघ शुक्ल सप्तमी का माना जाता है, जिस दिन मंदिर में विशेष रौनक देखने को मिलती है।
कई समुदायों और समाजों की कुलदेवी का स्थान
यह प्राचीन मंदिर केवल एक ही वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई समाजों और जातियों की आस्था का मुख्य केंद्र है। ब्राह्मण समुदाय के अंतर्गत पुरोहित जाति के लोग डरासिया माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। इसके अलावा, राजपूत समाज के लोग भी माता के दरबार में गहरी आस्था रखते हैं और नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। पुष्करणा पुरोहित समाज के साथ-साथ शीलगांव जाट, पोरवाला, दागड़िया और गिलड़ा समुदायों के लोग भी माता के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह मंदिर डेहरू, लालाप और मेड़ास के संयुक्त खेड़े में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। यहां आने वाले विभिन्न समुदायों के लोग अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार जात देने, मन्नत मांगने और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं।
कांच की अद्भुत नक्काशी और भव्य स्थापत्य कला
धार्मिक महत्व के साथ-साथ डरासिया माता का यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और सुंदर नक्काशी के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में माता का मुख्य निज मंदिर पूरी भव्यता के साथ सुसज्जित है। इस पूरे धार्मिक परिसर में कांच की बेहद बारीक और आकर्षक नक्काशी की गई है, जो इसकी सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती है। मंदिर के विशाल गुंबद की ओर देखने पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर तस्वीरें और कलाकृतियां नजर आती हैं, जो आने वाले हर यात्री को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। पारंपरिक भारतीय मंदिर वास्तुकला में निर्मित यह संरचना हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।
प्राचीन तालाब, कुआं और मन्नत का धागा बांधने की परंपरा
मंदिर के परिसर की सीमा के भीतर एक प्राचीन तालाब और कुआं भी मौजूद है, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा महत्व है। जब भी कोई श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचता है, तो वह माता के दरबार में शीश नवाने के साथ-साथ परिसर में पवित्र मन्नत का धागा भी बांधता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि डरासिया माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है। इस दरबार में आने वाले लोग अपने परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं और अपनी आस्था को और अधिक मजबूत बनाते हैं।
























