पाकिस्तान को हर हाल में दुश्मन माने देशवासी, फारूक अब्दुल्ला के बयान पर भड़के दानिश आजाद अंसारीहैरी केन ने जीता बैलोन डी'ओर, इंग्लैंड के लिए 25 साल का लंबा सूखा हुआ समाप्तटाटा संस में एन चंद्रशेखरन के सेवा विस्तार पर विवाद, नोएल टाटा ने बोर्ड के फैसले पर उठाई आपत्तिजनेश्वर मिश्र पार्क को लेकर अखिलेश यादव का गंभीर आरोप, भाजपा सरकार पर लगाए बड़े सवालमूलांक 8 दैनिक अंकज्योतिष 27 अक्टूबर 2026: रिश्तों में बढ़ेगा सहयोग और आर्थिक मामलों में बरतें सावधानीबेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर जनता का फैसला, गाजा युद्ध और सेना भर्ती विवाद के बीच नई संसद चुनने निकला इजरायलपर्यावरण के अनुकूल उद्यमों से करें मोटी कमाई, सौर ऊर्जा और कचरा प्रबंधन पर मिल रही बंपर सरकारी छूटअमृतसर के चीते कलां में आम आदमी पार्टी सरपंच के बेटे की गोली मारकर हत्या, साथी जख्मीरिपल को मिला ओसीसी का अंतिम अप्रूवल, नेशनल ट्रस्ट बैंक के जरिए स्टेबलकॉइन आरएलयूएसडी को मिलेगा सीधा फेडरल सपोर्टगोंदिया में टिफिन और शरीर पर गांजा छिपाकर तस्करी करने वाले दो तस्कर गिरफ्तार
राजस्थान के इस अनूठे मंदिर में होती है सिर्फ घुटनों की पूजा, 1800 साल पुराना है इतिहासराजस्थान
27 अक्तू॰ 2026, 7:22 am (4 घंटे पहले)· 3

राजस्थान के इस अनूठे मंदिर में होती है सिर्फ घुटनों की पूजा, 1800 साल पुराना है इतिहास

नागौर जिले के डेहरू गांव में स्थित डरासिया माता मंदिर में मां के पूरे स्वरूप के बजाय केवल घुटनों की पूजा की जाती है। करीब 1800 साल पुरानी इस मूर्ति के प्रकट होने से जुड़ी एक दिलचस्प लोककथा प्रचलित है।

राजस्थान के नागौर जिले में स्थित डेहरू गांव का डरासिया माता मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और लोक मान्यताओं के कारण देश भर में एक विशेष स्थान रखता है। यह धार्मिक स्थल केवल एक पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यहां की हर एक प्रथा सदियों पुराने इतिहास और आस्था की कहानी कहती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भक्तों द्वारा माता की पूरी प्रतिमा के दर्शन नहीं किए जाते, बल्कि केवल उनके घुटनों के हिस्से की ही पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल दूर-दराज से आने वाले लाखों श्रद्धालु इस अलौकिक रूप के दर्शन करके खुद को धन्य मानते हैं और माता के चरणों में अपनी हाजिरी लगाते हैं।

लगभग 1800 साल पुराना है प्रकट होने का इतिहास

धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, डरासिया माता की यह प्रतिमा आज से करीब 1800 साल पहले जमीन से प्रकट हुई थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानियों के मुताबिक, जब यह दिव्य प्रतिमा जमीन से ऊपर आ रही थी, तब वहां से एक चरवाहे का गुजरना हुआ। जैसे ही चरवाहे ने इस चमत्कार को देखकर आश्चर्य में आवाज लगाई, वैसे ही मूर्ति का जमीन से बाहर आना वहीं थम गया। ऐसा माना जाता है कि चरवाहे की उस आवाज के कारण माता का पूरा स्वरूप बाहर नहीं आ पाया और केवल घुटनों तक का हिस्सा ही धरती पर स्थिर रह गया। तभी से इस पावन स्थल पर माता के घुटनों की पूजा करने की परंपरा अटूट रूप से चली आ रही है। इस घटना से जुड़ा विशेष दिन माघ शुक्ल सप्तमी का माना जाता है, जिस दिन मंदिर में विशेष रौनक देखने को मिलती है।

ये भी पढ़ें

कई समुदायों और समाजों की कुलदेवी का स्थान

यह प्राचीन मंदिर केवल एक ही वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई समाजों और जातियों की आस्था का मुख्य केंद्र है। ब्राह्मण समुदाय के अंतर्गत पुरोहित जाति के लोग डरासिया माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। इसके अलावा, राजपूत समाज के लोग भी माता के दरबार में गहरी आस्था रखते हैं और नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। पुष्करणा पुरोहित समाज के साथ-साथ शीलगांव जाट, पोरवाला, दागड़िया और गिलड़ा समुदायों के लोग भी माता के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह मंदिर डेहरू, लालाप और मेड़ास के संयुक्त खेड़े में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। यहां आने वाले विभिन्न समुदायों के लोग अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार जात देने, मन्नत मांगने और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं।

कांच की अद्भुत नक्काशी और भव्य स्थापत्य कला

धार्मिक महत्व के साथ-साथ डरासिया माता का यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और सुंदर नक्काशी के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर के गर्भगृह में माता का मुख्य निज मंदिर पूरी भव्यता के साथ सुसज्जित है। इस पूरे धार्मिक परिसर में कांच की बेहद बारीक और आकर्षक नक्काशी की गई है, जो इसकी सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती है। मंदिर के विशाल गुंबद की ओर देखने पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर तस्वीरें और कलाकृतियां नजर आती हैं, जो आने वाले हर यात्री को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। पारंपरिक भारतीय मंदिर वास्तुकला में निर्मित यह संरचना हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।

प्राचीन तालाब, कुआं और मन्नत का धागा बांधने की परंपरा

मंदिर के परिसर की सीमा के भीतर एक प्राचीन तालाब और कुआं भी मौजूद है, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा महत्व है। जब भी कोई श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचता है, तो वह माता के दरबार में शीश नवाने के साथ-साथ परिसर में पवित्र मन्नत का धागा भी बांधता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि डरासिया माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है। इस दरबार में आने वाले लोग अपने परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं और अपनी आस्था को और अधिक मजबूत बनाते हैं।

सवाल-जवाब

डरासिया माता मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर राजस्थान के नागौर जिले के डेहरू गांव में स्थित है।
इस मंदिर में माता के किस हिस्से की पूजा की जाती है?
यहाँ माता के पूरे स्वरूप के बजाय केवल उनके घुटनों के हिस्से की पूजा की जाती है।
मंदिर की प्रतिमा से जुड़ी क्या लोककथा है?
मान्यता है कि करीब 1800 साल पहले जब प्रतिमा प्रकट हो रही थी, तब एक चरवाहे की आवाज से उसका बाहर आना रुक गया था।
यह मंदिर किन समाजों के लिए महत्वपूर्ण है?
यह मंदिर पुरोहित ब्राह्मण, राजपूत, शीलगांव जाट, पोरवाला, दागड़िया और गिलड़ा समुदायों के लिए कुलदेवी और आस्था का केंद्र है।
मंदिर परिसर में कौन सी मुख्य संरचनाएँ हैं?
परिसर में एक प्राचीन तालाब, एक कुआँ और कांच की नक्काशी से सजा हुआ मुख्य गर्भगृह स्थित है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·54 मिनट पहले

राजस्थान यात्रा के दौरान नागौर के इस मंदिर में जाने का मौका मिला था। सच में वहाँ का माहौल और वास्तुकला बहुत अलग और शांत थी, आज इस बारे में पढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गईं।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

अद्भुत मंदिर है, पर चरवाले की एक आवाज़ से मूर्ति का बाहर आना रुक जाना थोड़ा अजीब लगता है। क्या सच में ऐसा हुआ होगा?

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

रविकेश जी, लोक कथाएँ ऐसी ही होती हैं, सदियों से चली आ रही हैं तो लोग मान लेते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

राजस्थान की लोक परंपराएं सचमुच हैरान करती हैं। यूपी के ग्रामीण इलाकों में भी कई अनोखे स्थानीय मंदिर और मान्यताएं हैं, पर घुटनों की पूजा वाली यह बात बिल्कुल अलग लगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, लोककथाओं में चमत्कार मान भी लें, पर चरवाले की एक आवाज़ से मूर्ति रुक जाना थोड़ा अजीब लगता है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp