राजस्थान का प्रमुख औद्योगिक शहर पाली कभी समूचे मारवाड़ क्षेत्र में आजीविका, संपन्नता और सुनहरे भविष्य का बड़ा प्रतीक माना जाता था। उस दौर में यहां के कपड़ा कारखानों की बदौलत हजारों कामगारों और व्यापारियों का जीवन संवर रहा था, मगर मौजूदा वक्त में यही इलाका मंदी, रोजी-रोटी के संकट और व्यापक स्तर पर होने वाले पलायन के भंवर में फंस चुका है। शहर भर में कपड़ा प्रोसेस करने वाली सैकड़ों इकाइयों के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं। इस गंभीर ठहराव का सबसे त्रासद पहलू यह है कि फैक्ट्रियों के बंद होने की यह भारी कीमत अब निर्दोष जिंदगियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। स्थानीय स्तर पर रंगाई, छपाई और प्रोसेसिंग की व्यवस्थाएं ध्वस्त होने की वजह से यहां के व्यापारियों और कर्मचारियों को अपने माल का काम करवाने के लिए मजबूरी में दूसरे राज्यों के शहरों का चक्कर काटना पड़ रहा है।
इसी औद्योगिक विवशता के बीच हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। पाली से तैयार कपड़ा प्रोसेस करवाने के लिए रात के वक्त कार से गुजरात के अहमदाबाद जा रहे मामा और भांजे का वाहन रास्ते में एक खड़े ट्रेलर से टकरा गया। इस भीषण सड़क दुर्घटना में दोनों व्यक्तियों की मौके पर ही जान चली गई। स्थानीय नागरिकों, कारोबारियों और श्रमिक संगठनों का स्पष्ट कहना है कि इस घटना को केवल एक सामान्य सड़क हादसा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह वास्तव में पाली के ठप पड़े कल-कारखानों, लड़खड़ाती औद्योगिक नीतियों और स्थानीय लाचारी का ही एक भयावह नतीजा है, जिसने दो हंसते-खेलते परिवारों का सहारा हमेशा के लिए छीन लिया।
‘पॉपलीन सिटी’ के गौरव से अचानक खामोशी के अंधेरे में फिसला शहर
एक जमाना था जब देश के औद्योगिक नक्शे पर पाली को ‘पॉपलीन सिटी’ के सम्मानजनक नाम से जाना और पहचाना जाता था। शहर में आधुनिक कपड़ा उद्योग की नींव 1970 और 1980 के दशक में बेहद छोटे स्तर पर डाली गई थी। इसके बाद स्थानीय उद्यमियों के अथक परिश्रम, हुनर और लगन के बल पर यह इलाका बेहद कम समय में देश के भीतर पॉपलीन और कॉटन फैब्रिक का सबसे बड़ा व विश्वसनीय केंद्र बनकर उभरा। यहां के कारखानों में होने वाली कॉटन प्रोसेसिंग, पॉपलीन की उम्दा रंगाई और आकर्षक छपाई की धाक पूरे भारत के बाजारों में जमी हुई थी।
पाली का यह विशाल औद्योगिक तंत्र केवल राजस्थान तक सीमित नहीं था, बल्कि यह बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे दूरदराज के राज्यों से रोजगार की तलाश में पहुंचे लाखों प्रवासी मजदूरों को भी नियमित आजीविका प्रदान करता था। शहर की हर मुख्य सड़क और औद्योगिक गलियारे पर दिन-रात तैयार माल और कच्चे धागे ढोने वाले भारी वाहनों की चहल-पहल बनी रहती थी। यही व्यापारिक गतिविधियां लंबे समय तक समूचे मारवाड़ की आर्थिक रीढ़ की हड्डी मानी जाती रही हैं। लेकिन आज इसी ऐतिहासिक पहचान पर ग्रहण लग चुका है, फैक्ट्रियों की चिमनियां बुझ चुकी हैं और चारों तरफ केवल सन्नाटा पसरा हुआ है।
सख्त नियमों, प्लांट की तकनीकी दिक्कतों और पानी के संकट ने तोड़ी कमर
पाली के पुराने और वरिष्ठ कारोबारियों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल और शहर के इतिहास में ऐसा अभूतपूर्व संकट कभी नहीं देखा। जानकारों के अनुसार इस तबाही के पीछे कई बड़े संरचनात्मक कारण मौजूद हैं। सबसे पहले एनजीटी के कड़े पर्यावरणीय नियमों ने इकाइयों के संचालन को बेहद मुश्किल बना दिया। इसके साथ ही कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में लगातार आ रही गंभीर तकनीकी खामियों ने औद्योगिक कचरे के निपटान को असंभव बना दिया। इसके अलावा इलाके में पानी की भारी किल्लत ने जल-निर्भर टेक्सटाइल प्रोसेसिंग की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया।
इन बहुस्तरीय चुनौतियों के कारण पाली का समूचा टेक्सटाइल इंफ्रास्ट्रक्चर ताश के पत्तों की तरह ढह गया। जब स्थानीय स्तर पर कपड़े की धुलाई, ब्लीचिंग, रंगाई और फिनिशिंग का पूरा काम बंद हो गया, तो छोटे और बड़े उद्यमियों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। अपने ग्राहकों के ऑर्डर पूरे करने और पूंजी को डूबने से बचाने के लिए वे तैयार कच्चा माल लेकर सैकड़ों किलोमीटर दूर अहमदाबाद की ओर भागने को मजबूर हो गए। यही कारण है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को हर दिन करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है।
रात के अंधेरे में हाईवे का सफर और बना रहता है अनहोनी का डर
पाली की इकाइयों के बंद होने का असर अब केवल बही-खातों और बैंक खातों के नुकसान तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम नागरिकों की सांसों पर भारी पड़ रहा है। कपड़ा व्यापारियों को दिनभर के काम के बाद अक्सर रात के सन्नाटे में निजी गाड़ियों या टैक्सियों से अहमदाबाद की दूरी तय करनी पड़ती है, ताकि अगले दिन वहां की फैक्ट्रियों में काम शुरू करवाया जा सके। ऐसे ही एक सफर में जान गंवाने वाले मामा-भांजे का उदाहरण देकर शहरवासी यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर अपने ही शहर में प्रोसेसिंग यूनिट्स सुचारू रूप से चल रही होतीं, तो किसी को भी अपनी जान जोखिम में डालकर देर रात हाईवे पर दौड़ने की नौबत नहीं आती।
इस दर्दनाक हादसे के बाद से पाली के कपड़ा कारोबारियों, ट्रांसपोर्टरों और वाहन चालकों के घरों में मातम और अनजाना डर फैल गया है। परिवारों के सामने आज एक अत्यंत जटिल संकट खड़ा हो चुका है। एक तरफ अगर वे बाहर नहीं जाते हैं, तो फैक्ट्रियां बंद रहने से भुखमरी, व्यापारिक कर्ज और पूरी तरह बर्बाद होने की आशंका सामने खड़ी है। वहीं दूसरी तरफ, अगर वे माल प्रोसेस कराने के लिए हाईवे का रुख करते हैं, तो दिन-रात दौड़ती तेज रफ्तार गाड़ियों, भारी ट्रकों और अचानक होने वाले जानलेवा हादसों का साया उनका पीछा नहीं छोड़ता। परिवार के लोग अपने सदस्यों को दूर भेजने से डर रहे हैं, मगर पेट पालने और व्यापार को जिंदा रखने की मजबूरी उन्हें इसी जानलेवा रास्ते पर आगे धकेल रही है।
मशीनों के साथ बुझ रहे हैं हजारों परिवारों के चूल्हे और भविष्य के सपने
जब किसी औद्योगिक शहर में कारखाने बंद होते हैं, तो केवल लोहे की मशीनें या बिजली के पहिए ही नहीं रुकते, बल्कि उनके साथ जुड़े हजारों परिवारों के सपने, बच्चों की बेहतर शिक्षा, रोजमर्रा का घरेलू राशन और जीवन की खुशियां भी एक झटके में बिखर जाती हैं। पाली का मौजूदा औद्योगिक गतिरोध अब केवल सरकारी दफ्तरों या उद्योगपतियों की व्यापारिक बैठकों तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी मानवीय त्रासदी का रूप ले चुका है।
हजारों कुशल कारीगर आज पाई-पाई के मोहताज होकर घर बैठने पर मजबूर हैं या फिर मामूली मजदूरी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं। अगर सरकार और स्थानीय प्रशासन ने समय रहते इस संकट की गहराई को नहीं समझा और बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने के लिए तकनीकी, पर्यावरणीय व वित्तीय मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो पलायन, बढ़ती बेरोजगारी और हाईवे पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का यह सिलसिला न जाने कितने और निर्दोष परिवारों के चिराग बुझा देगा।






















