राजस्थान के धौलपुर इलाके को भले ही लंबे समय तक बीहड़ों के आतंक और बंदूकों की आवाजों से जोड़कर देखा जाता रहा हो, लेकिन इसी मिट्टी में सदियों पुरानी सनातन संस्कृति भी रची-बसी है। चंबल नदी के तट पर खड़े शेरगढ़ किले के अंदर स्थापित पंचमुखी हनुमान मंदिर बीते दो सौ से अधिक वर्षों से अध्यात्म का बड़ा केंद्र बना हुआ है। अशांत वातावरण के बीच भी यह पावन स्थल अपनी आध्यात्मिक गरिमा और ऐतिहासिक पहचान को पूरी मजबूती से सहेजे हुए है।
जाट रियासत के संस्थापक ने 1805 में रखी थी आधारशिला
धौलपुर शहर के मुख्य केंद्र से लगभग 5 किलोमीटर दक्षिण की तरफ बने इस देवालय का इतिहास क्षेत्रीय राजघराने से सीधे जुड़ता है। इस प्राचीन स्थल का निर्माण धौलपुर की जाट रियासत के संस्थापक महाराज राना कीरत सिंह ने वर्ष 1805 में कराया था। गोहद का क्षेत्र छोड़ने के पश्चात जब महाराज राना कीरत सिंह चंबल के तटवर्ती शेरगढ़ किले में आए और इसे अपनी हुकूमत का केंद्र बनाया, तब उन्होंने अपनी धार्मिक निष्ठा के प्रमाण स्वरूप इस मंदिर की नींव रखी थी।
राजपरिवार में बजरंगबली के प्रति सम्मान और आस्था का स्तर कितना अटूट था, इसका सबसे बड़ा साक्ष्य धौलपुर रियासत के आधिकारिक राजचिह्न में दिखता है, जिसमें विशेष रूप से हनुमान जी का प्रतीक उकेरा गया था।
अशांत दौर में भी अनवरत गूंजती रही रामधुन और चालीसा
बीते दौर में जब यह पूरा बीहड़ी अंचल कुख्यात गिरोहों और डकैतों के आतंक से थर्राता था, तब भी इस देवस्थान की पवित्रता और प्रभाव कभी मंद नहीं पड़ा। स्थानीय बुजुर्गों और पुरानी कथाओं के अनुसार, घाटियों में गूंजने वाले बारूदी शोर के बीच भी इस परिसर से उठने वाली राम नाम की स्वर लहरियां और हनुमान चालीसा का पाठ समूचे वातावरण में शांति का संचार करते थे।
उस जमाने में महाराज राना कीरत सिंह नित्य प्रति स्वयं यहां उपस्थित होकर आराधना में लीन होते थे। कालांतर में रियासत की राजधानी बदलकर कीर्तिनगर ले जाई गई, किंतु भक्तों की श्रद्धा में रत्ती भर कमी नहीं आई। बीहड़ के अत्यंत बीहड़ और पथरीले रास्तों की परवाह किए बिना श्रद्धालु लगातार शीश नवाने आते रहे।
पांच दिव्य मुखों वाली प्रतिमा और बेजोड़ स्थापत्य
इस परिसर का मुख्य आकर्षण पवनपुत्र की वह दुर्लभ मूर्ति है, जिसमें प्रभु के पांच अलौकिक मुखों के एक साथ दर्शन होते हैं। यह पावन धाम आज भी तत्कालीन रियासत की शिल्पकला, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना का एक सजीव दस्तावेज माना जाता है। डकैतों के दौर के खौफनाक अतीत के बिल्कुल उलट, चंबल के कछार में बसा यह मंदिर आज भी शांति, दिव्यता और अटूट जनविश्वास की अनुपम मिसाल प्रस्तुत कर रहा है।



















