बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था के महापर्व छठ की अनूठी छटा अब पारंपरिक परिधानों पर साकार हो रही है। पूर्णिया स्थित हाउस ऑफ मैथिली में स्थानीय महिला और पुरुष कारीगरों की टोली ने मिलकर एक खास पहल शुरू की है। यहां सुप्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग की मदद से साड़ियों पर छठ पूजा के पारंपरिक प्रतीकों, रीति-रिवाजों और लोक आस्था के दृश्यों को कलात्मक रूप से उतारा जा रहा है। इस रचनात्मक प्रयोग को देश भर से सराहना मिल रही है और बड़े शहरों से लगातार मांग सामने आ रही है।
कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक कला का संगम
हाउस ऑफ मैथिली में इन विशेष परिधानों को तैयार करने का सिलसिला पिछले 15 दिनों से लगातार जारी है। संस्थान से जुड़ी महिला कारीगर दिव्या झा, साथी शुभम कुमार तथा अन्य कारीगर पूरी तन्मयता के साथ कपड़ों पर बारीक आकृतियां बना रहे हैं। कपड़े पर रंगों और रेखाओं के समन्वय से लोक आस्था की जीवंत तस्वीरें गढ़ी जा रही हैं। इस कलाकारी में छठ अनुष्ठान के दौरान उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक बांस के सूप, डूबते और उगते सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पण करने के पावन दृश्य तथा व्रतियों के कठोर नियमों से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को खूबसूरती से उकेरा गया है।
कई राज्यों से पहुंचे ऑर्डर और चार लाख का कारोबार
स्थानीय कला के इस नायाब संगम को राष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हासिल हुई है। बिहार के घरेलू बाजार के अतिरिक्त देश की राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मुंबई तथा लखनऊ जैसे प्रमुख महानगरों से ग्राहकों ने इन साड़ियों की मांग की है। अब तक संस्थान को लगभग 35 साड़ियों के आर्डर प्राप्त हो चुके हैं, जिनका कुल मूल्य करीब 4 लाख रुपये आंका गया है। आगामी दो से तीन दिनों के भीतर इन सभी तैयार साड़ियों को संबंधित ग्राहकों तक पहुंचाने की तैयारी पूरी कर ली गई है।
स्थानीय महिलाओं को मिला रोजगार और सम्मान
हाउस ऑफ मैथिली के संस्थापक मनीष रंजन के अनुसार, इस परियोजना का मुख्य ध्येय बिहार के सबसे बड़े लोक पर्व की मर्यादा और लोक कला को एक साथ मंच प्रदान करना है। इस पहल ने पूर्णिया की स्थानीय महिलाओं के लिए सम्मानजनक आजीविका और आत्मनिर्भरता की राह खोली है। अपने पारंपरिक हुनर के दम पर महिलाएं नियमित आमदनी कमा रही हैं। यहां पहले भी तैयार किए गए कई पारंपरिक शिल्पों ने देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बनाई है, और अब छठ आधारित इस नए संग्रह से राज्य की लोक कला को आधुनिक जीवनशैली के साथ एक नई पहचान मिल रही है।



















