आज के दौर में जब बड़े नाटकों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में आधुनिक एलईडी स्क्रीन और डिजिटल ग्राफिक्स का बोलबाला है, वहीं राजस्थान के सीकर जिले में मौजूद एक ऐतिहासिक रंगमंच अपनी विशुद्ध पारंपरिक मंचीय तकनीक से लोगों को हैरान कर रहा है। सीकर के प्रसिद्ध श्री कल्याण रंगमंच पर जब रामलीला के दृश्य जीवंत होते हैं, तो दर्शक उस पुराने जादू में खो जाते हैं। यहां न तो कोई आधुनिक प्रोजेक्शन स्क्रीन है और न ही कोई डिजिटल इफेक्ट्स, फिर भी भगवान राम का वन गमन, रावण का भव्य दरबार, सूर्योदय का मनोहारी वातावरण और लंका दहन जैसे जटिल दृश्य पलक झपकते ही मंच पर बदल जाते हैं। कलाकारों का जमीन से अचानक प्रकट होना और फिर गायब हो जाना दर्शकों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर देता है। दशकों पुरानी पारंपरिक व्यवस्था और रंगमंच की खास इंजीनियरिंग के कारण यह स्थल समूचे राजस्थान के सबसे चुनिंदा और दुर्लभ नाट्य मंचों में गिना जाता है।
सात पर्दों और ग्यारह रस्सियों का अनूठा समन्वय
इस रंगमंच की सबसे बड़ी पहचान यहां की वह यांत्रिक और मंचीय व्यवस्था है जो पूरी तरह इंसानी हाथों और सूझबूझ से संचालित होती है। पूरे मंच पर सात अलग-अलग विशेष पर्दे लगाए गए हैं। इन पर्दों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि रामकथा के अलग-अलग प्रसंगों के अनुसार पृष्ठभूमि को तुरंत बदला जा सके। जब कथा में घने जंगलों का प्रसंग आता है तो जंगल का दृश्य सामने आ जाता है, और अगले ही क्षण दरबार का दृश्य तैयार हो जाता है। प्राकृतिक घटनाओं जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त को दर्शाने के लिए भी इन्हीं पर्दों के विशेष विन्यास का उपयोग किया जाता है। मुख्य पर्दे को नीचे से ऊपर उठाने और व्यवस्थित करने के लिए ठीक 11 रस्सियों का संचालन किया जाता है। इसके अलावा मंच पर तीन हिस्सों में बंटे विशेष शटर लगाए गए हैं, जिनके खुलने और बंद होने का एक सटीक क्रम होता है। इन सभी पारंपरिक प्रणालियों के बीच कलाकारों का भावपूर्ण अभिनय कथा को सजीव बना देता है, जिसमें लंका दहन का दृश्य देखने के लिए सबसे अधिक उत्सुकता रहती है।
वैज्ञानिक बनावट और दो फीट का विशेष ढलान
श्री कल्याण रंगमंच का स्थापत्य भी बेहद सोच-समझकर तैयार किया गया है। यह मंच 31 फीट चौड़ा और 50 फीट लंबा है। इसकी फर्श की रचना सामान्य समतल मंचों जैसी नहीं है, बल्कि फर्श को आगे से पीछे की दिशा में लगभग दो फीट का ढलान देकर बनाया गया है। इस ढलानदार संरचना का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मंच के सबसे पिछले हिस्से में खड़ा कलाकार भी आगे बैठे दर्शकों को बिना किसी रुकावट के पूरी स्पष्टता से दिखाई देता है। इसी चतुर बनावट और मंचीय युक्तियों की बदौलत पात्रों के धरती से अचानक प्रकट होने और फिर उसमें समा जाने जैसे विस्मयकारी दृश्यों को आसानी से अंजाम दिया जाता है।
मंच के पीछे संचालित होता है व्यवस्थाओं का मजबूत तंत्र
दर्शकों को सामने केवल कलाकारों का अभिनय और दृश्य दिखाई देते हैं, लेकिन उसके पीछे एक बहुत बड़ा सहायक तंत्र लगातार सक्रिय रहता है। मंच के दोनों किनारों पर विशेष नियंत्रण कक्ष बनाए गए हैं, जहां से ध्वनि, माइक और प्रकाश व्यवस्था को नियंत्रित किया जाता है। मुख्य मंच के ठीक पीछे एक विशाल हॉल मौजूद है, जहां कलाकार अपनी प्रस्तुति की बारी की प्रतीक्षा करते हैं। इसके अलावा रंगमंच के बेसमेंट में कई अलग-अलग कक्ष तैयार किए गए हैं। इन भूमिगत कमरों में कलाकारों की रूप-सज्जा, वस्त्र-सज्जा और नाटकीय हथियारों व उपकरणों के लिए समर्पित शस्त्रागार बनाया गया है। पर्दे के पीछे की यह मुस्तैदी ही हर दृश्य को समय पर दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने में मदद करती है।
माजी साहब के कुएं से कल्याण रंगमंच तक का छह दशक लंबा सफर
सीकर में इस समृद्ध नाट्य परंपरा की नींव वर्ष 1953 में रखी गई थी, जब यहां सांस्कृतिक मंडल का गठन हुआ। शुरुआत में रामलीला का मंचन माझी साहब के कुएं पर खुले में किया जाता था। बाद में एक स्थाई और सुसज्जित रंगमंच की आवश्यकता महसूस हुई, जिसके बाद रावराजा और स्थानीय भामाशाहों के आर्थिक व सामाजिक सहयोग से सांस्कृतिक मंडल के अधीन श्री कल्याण रंगमंच का निर्माण शुरू हुआ। यह मंच वर्ष 1962 में पूरी तरह बनकर तैयार हुआ था। सांस्कृतिक मंडल से जुड़े जानकी प्रसाद इन्दौरिया बताते हैं कि यह रंगमंच केवल रामलीला का स्थान नहीं है, बल्कि सीकर नगर की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर और सांस्कृतिक पहचान है। यहां प्रत्येक वर्ष नौ दिनों की रामलीला के साथ विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। 11 अक्टूबर से शुरू होने जा रही आगामी नौ दिवसीय रामलीला में एक बार फिर वही 7 पर्दे, 11 रस्सियां और कलाकारों का जीवंत अभिनय मंच पर उतरेगा।



















