ट्रेन के लंबे सफर में गर्भवती महिलाओं के लिए ऊपर की बर्थ पर चढ़ना या उतरना बेहद जोखिम भरा और थकाऊ साबित होता है। नीचे की सीट यानी लोअर बर्थ मिलना ऐसे समय में किसी बड़ी राहत से कम नहीं होता, ताकि सफर सुरक्षित और आरामदायक बना रहे। अब तक भारतीय रेल की ऑनलाइन टिकट प्रणाली में गर्भवती महिलाओं को सीधे लोअर बर्थ चुनने की सुविधा नहीं मिलती थी। इस सुविधा का लाभ लेने के लिए यात्रियों को रेलवे स्टेशन के पैसेंजर रिजर्वेशन काउंटर के चक्कर काटने पड़ते थे और वहां भी किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कराना अनिवार्य था। इस जटिल प्रक्रिया को समाप्त करते हुए रेलवे बोर्ड ने नीतिगत स्तर पर एक बड़ा सुधार लागू करने का निर्णय लिया है, जिससे आने वाले दिनों में महिलाएं घर बैठे इंटरनेट के माध्यम से लोअर बर्थ का चयन कर सकेंगी।
ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से मिलेगा संयुक्त कोटा
रेलवे बोर्ड द्वारा जारी 28 सितंबर के आधिकारिक आदेश के तहत गर्भवती महिलाओं को अब वरिष्ठ नागरिकों तथा 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र की अकेली महिला यात्रियों के समान ही संयुक्त लोअर बर्थ कोटे का हिस्सा बनाया गया है। इस फैसले के अमल में आने के बाद गर्भवती महिला यात्री न केवल टिकट काउंटर पर बल्कि रेलवे के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी नीचे की सीट का विकल्प चुन सकेंगी। पहले डिजिटल माध्यमों पर यह श्रेणी उपलब्ध न होने के कारण कई महिलाओं को मजबूरी में मिडिल या अपर बर्थ पर यात्रा करनी पड़ती थी, जिससे यात्रा के दौरान उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं बनी रहती थीं।
इस नई व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए रेलवे बोर्ड ने तकनीकी एजेंसियों को निर्देश जारी कर दिए हैं। सेंटर फॉर रेलवे इंफॉर्मेशन सिस्टम्स यानी CRIS और इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन यानी IRCTC को अपनी वेबसाइट्स और मोबाइल ऐप्लिकेशन्स के सॉफ्टवेयर कोड में जरूरी संशोधन करने के लिए कहा गया है। जब तक ये तकनीकी अपडेट पूरी तरह से सिस्टम में लागू नहीं हो जाते, तब तक यात्रियों को ऑनलाइन स्क्रीन पर यह विकल्प तुरंत दिखाई नहीं देगा। सिस्टम तैयार होते ही बुकिंग फॉर्म में गर्भवती महिलाओं के लिए अलग चेकबॉक्स या श्रेणी का विकल्प जोड़ दिया जाएगा।
बुकिंग के समय डॉक्टर के पर्चे की अनिवार्यता समाप्त
इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू आरक्षण काउंटर पर कागजी औपचारिकताओं में दी गई ढील है। पहले काउंटर पर लोअर बर्थ पाने के लिए गर्भवती महिला को डॉक्टर का आधिकारिक प्रमाणपत्र पेश करना होता था, जिसे जमा करने के बाद ही क्लर्क नीचे की सीट आवंटित करता था। नए नियमों के अनुसार बुकिंग के समय ऐसा कोई भी मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाने या जमा करने की आवश्यकता पूरी तरह खत्म कर दी गई है। इससे टिकट लेते समय लगने वाले समय और अनावश्यक भागदौड़ में भारी कमी आएगी।
हालांकि रेलवे बोर्ड ने यह भी बिल्कुल साफ कर दिया है कि रियायत या विशेष कोटे का दुरुपयोग रोकने के लिए यात्रा के दौरान जांच का प्रावधान यथावत रहेगा। यदि ट्रेन में चेकिंग स्टाफ या टिकट चेकर टीटीई यात्रा के दौरान गर्भावस्था से जुड़ा वैध प्रमाण पत्र या मेडिकल दस्तावेज दिखाने को कहता है, तो यात्री को वह प्रस्तुत करना होगा। यदि कोई यात्री कोटे का लाभ लेकर यात्रा कर रहा है और मांगे जाने पर जरूरी चिकित्सकीय दस्तावेज नहीं दिखा पाता है, तो उसके खिलाफ रेलवे अधिनियम 1989 की धारा 138 के तहत आवश्यक दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे यात्रा के समय अपने मूल दस्तावेज हमेशा साथ रखें।
विभिन्न श्रेणियों में उपलब्ध लोअर बर्थ का गणित
भारतीय रेल की नियमित ट्रेनों में विभिन्न श्रेणियों के डिब्बों में वरिष्ठ नागरिकों और पात्र महिला यात्रियों के लिए पहले से ही लोअर बर्थ का एक संयुक्त कोटा निर्धारित रहता है। इसी तय कोटे में अब गर्भवती महिलाओं को भी शामिल किया जा रहा है। अलग-अलग कोचों में सीटों का आवंटन इस प्रकार रहता है
- स्लीपर क्लास: प्रत्येक कोच में लगभग 6 से 7 लोअर बर्थ इस विशेष कोटे के लिए आरक्षित रखी जाती हैं।
- AC 3 टियर: प्रत्येक थ्री टियर वातानुकूलित कोच में करीब 4 से 5 नीचे की सीटें इस कोटे के अंतर्गत आती हैं।
- AC 2 टियर: प्रत्येक टू टियर वातानुकूलित कोच में करीब 3 से 4 लोअर बर्थ इस श्रेणी के यात्रियों के लिए निर्धारित रहती हैं।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये सभी सीटें उपलब्धता के आधार पर ही दी जाती हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि वरिष्ठ नागरिकों और 45 साल से अधिक उम्र की महिलाओं को फॉर्म में कोई विकल्प न भरने पर भी सिस्टम अपने आप खाली लोअर बर्थ आवंटित कर देता है। यही ऑटोमैटिक सुविधा अब गर्भवती महिला यात्रियों के लिए भी लागू करने की योजना है, जिससे उपलब्धता होने पर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर नीचे की सीट मिल सकेगी।
दिव्यांग यात्रियों के लिए मौजूदा आरक्षण व्यवस्था
रेलवे नेटवर्क पर विशेष आवश्यकता वाले यात्रियों के लिए भी अलग से बर्थ और सीटों की व्यवस्था की गई है। मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के स्लीपर क्लास तथा 3AC और 3E श्रेणी में कुल चार-चार बर्थ दिव्यांग यात्रियों के लिए चिन्हित रहती हैं। इन आरक्षित सीटों में दो-दो लोअर बर्थ अनिवार्य रूप से शामिल होती हैं, ताकि शारीरिक रूप से अक्षम यात्रियों को चढ़ने में कोई असुविधा न हो। इसके अलावा आरक्षित सेकंड सिटिंग और AC चेयर कार श्रेणियों में भी ऐसे यात्रियों के लिए चार सीटों का विशेष प्रावधान पहले से तय है।
अदालती सुनवाई और व्यवस्था में सुधार की पहल
रेलवे का यह सुधारात्मक कदम उस समय सामने आया है जब दिल्ली हाईकोर्ट में गर्भवती महिलाओं को ऑनलाइन टिकट बुकिंग के दौरान लोअर बर्थ चुनने का विकल्प उपलब्ध कराने को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर विचार किया जा रहा था। इस याचिका में यह दलील दी गई थी कि डिजिटल दौर में भी गर्भवती महिलाओं को काउंटर तक जाने के लिए मजबूर करना अनुचित है और गर्भावस्था के दौरान सीढ़ियां चढ़ना जच्चा और बच्चा दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। रेलवे बोर्ड के 28 सितंबर के निर्देश ने इस लंबे समय से महसूस की जा रही व्यावहारिक जरूरत को पूरा करने की राह खोल दी है। अब सभी की निगाहें CRIS और IRCTC द्वारा किए जा रहे तकनीकी बदलावों पर हैं, जिनके पूरा होते ही करोड़ों महिला रेल यात्रियों को वास्तविक राहत मिलने लगेगी।

















