राजस्थान के खेतों में रबी फसल की बुवाई का चक्र शुरू होते ही रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर खींचतान तेज हो गई है। राज्य भर में यूरिया और डीएपी खाद की भारी तंगी, अधिक वसूली और खाद के कट्टों के साथ अनावश्यक उत्पाद जबरन बेचने यानी अटैचमेंट के आरोपों को केंद्र में रखकर आंदोलन कर रहे नेता नरेश मीणा ने बुधवार को समर्थकों के साथ जयपुर कूच का बिगुल फूंक दिया। निवाई से शुरू हुआ यह पैदल और वाहन मार्च चाकसू पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में एकत्र किसानों को संबोधित करने के बाद प्रदर्शनकारियों ने राजधानी जयपुर स्थित शहीद स्मारक पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरना देने की रणनीति की घोषणा की। किसानों के राजधानी में दाखिल होने की घोषणा के तुरंत बाद प्रशासनिक हलकों में सतर्कता बढ़ा दी गई और सीमावर्ती शिवदासपुरा टोल प्लाजा पर मजबूत सुरक्षा बंदोबस्त तैनात कर दिए गए।
शिवदासपुरा टोल पर पुलिस की कड़ी घेराबंदी और सुरक्षा इंतजाम
राजधानी जयपुर की ओर बढ़ रहे मार्च को रोकने के लिए प्रशासन ने सीमावर्ती शिवदासपुरा टोल नाके को सुरक्षा छावनी में बदल दिया। जयपुर कमिश्नरेट और जिला पुलिस की ओर से भारी संख्या में जवानों को तैनात किया गया है। मौके पर भीड़ नियंत्रण के लिए वाटर कैनन की गाड़ियां खड़ी की गई हैं, जबकि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और राजस्थान आर्म्ड कांस्टेबुलरी (RAC) के सैकड़ों जवानों को रणनीतिक बिंदुओं पर मुस्तैद रखा गया है। इलाके में कई आरपीएस (RPS) अधिकारी और पुलिस इंस्पेक्टर सीधे मौके पर कमान संभालते हुए हर गतिविधि की निगरानी कर रहे हैं। पुलिस ने टोल प्लाजा पर बैरिकेडिंग कर रास्ता रोक दिया है ताकि आंदोलनकारी शहर की मुख्य सड़कों पर आगे न बढ़ सकें।
चाकसू की सभा और किसानों के प्रमुख मांग बिंदु
बुधवार सुबह जब नरेश मीणा ने टोंक जिले के निवाई से जयपुर की तरफ प्रस्थान किया, तो रास्ते के गांवों और कस्बों से कई किसान जत्थे उनके काफिले में शामिल होते चले गए। चाकसू पहुंचने पर एक बड़ी सभा आयोजित की गई, जिसमें आंदोलनकारियों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। नरेश मीणा ने सभा में साफ कहा कि उनका यह आंदोलन किसानों के बुनियादी अधिकारों और खेती की रक्षा के लिए है। आंदोलनकारी किसानों की प्रमुख मांगों में डीएपी और यूरिया खाद की सहज उपलब्धता सुनिश्चित करना, सरकार द्वारा निर्धारित सरकारी दरों पर ही खाद की बिक्री की गारंटी देना, खाद बैग के साथ कीटनाशक या अन्य गैर-जरूरी सामान जबरन थमाने के अटैचमेंट खेल पर पूरी तरह रोक लगाना और रबी फसलों की सिंचाई के लिए दिन के समय पर्याप्त कृषि बिजली आपूर्ति देना शामिल है। इस आंदोलन से पहले नरेश मीणा बारां से जयपुर तक किसान पदयात्रा निकाल चुके हैं और आमरण अनशन का रास्ता भी अपना चुके हैं, जिसके संदर्भ में हाल के दिनों में प्रशासनिक स्तर पर उनसे बातचीत के प्रयास भी हुए थे।
तीसरे मोर्चे के नेताओं की गोलबंदी और राजनीतिक समर्थन
जयपुर कूच के दौरान इस आंदोलन को व्यापक राजनीतिक फलक देने की कोशिशें भी नजर आ रही हैं। नरेश मीणा ने राजस्थान के तीसरे मोर्चे से ताल्लुक रखने वाले प्रमुख राजनीतिक चेहरों से इस किसान आंदोलन के मंच पर एकजुट होने की अपील की है। उन्होंने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल और पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा समेत कई नेताओं के समर्थन का दावा किया। मार्च के दौरान पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा खुद भी आंदोलनकारियों के साथ मौजूद रहे, जिससे इस प्रदर्शन को अतिरिक्त राजनीतिक भार मिला है। नेताओं का कहना है कि वे किसानों की जायज मांगों को लेकर जयपुर के शहीद स्मारक पर अपनी आवाज बुलंद करके ही दम लेंगे।
खाद के साथ अटैचमेंट और वितरण व्यवस्था पर उठते सवाल
किसानों का यह रोष केवल दुकानों पर खाद की थैलियों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि सहकारी समितियों और खुदरा दुकानों पर जारी अनैतिक व्यापारिक दबाव भी असंतोष की बड़ी वजह है। किसानों का आरोप है कि डीएपी या यूरिया का एक बैग खरीदने के लिए उन्हें महंगे सल्फर, बायो-फर्टिलाइजर या अन्य उत्पाद जबरन खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे बोलचाल में 'अटैचमेंट' कहा जाता है। यदि किसान इस अतिरिक्त सामान को लेने से इनकार करते हैं, तो उन्हें खाद देने से मना कर दिया जाता है। दूसरी तरफ, कृषि विभाग और सरकार का दावा है कि राज्य में रासायनिक खादों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण इलाकों में खाद बिक्री केंद्रों पर भोर से ही किसानों की लंबी कतारें लग रही हैं। सरकारी दावों और जमीनी किल्लत के बीच का यही अंतर इस बड़े जनआंदोलन की मुख्य वजह बन गया है।
राजस्थान में खाद संकट का इतिहास और पुरानी राजनीतिक खींचतान
राजस्थान की राजनीति और खेती-किसानी में खाद वितरण का विवाद कोई नया घटनाक्रम नहीं है। वर्ष 2021 के रबी बुवाई सत्र में भी अक्टूबर और नवंबर के महीनों के दौरान किसानों को डीएपी और यूरिया के एक-एक कट्टे के लिए केंद्रों पर कई-कई दिन कतारों में खड़ा रहना पड़ा था। उस समय राज्य की तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने केंद्र सरकार पर आवश्यकतानुसार आवंटन न करने का ठीकरा फोड़ा था। नवंबर 2021 के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए तत्कालीन गहलोत सरकार ने रेखांकित किया था कि अक्टूबर और नवंबर की जरूरतों के लिए 8 लाख मीट्रिक टन यूरिया की मांग भेजी गई थी, जिसके मुकाबले राज्य को केवल 5.52 लाख मीट्रिक टन यूरिया ही मिल पाया, जिससे सीधे तौर पर करीब 2.48 लाख मीट्रिक टन की बड़ी कमी पैदा हो गई थी।
उस दौर में कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार पर भेदभावपूर्ण रवैये का आरोप लगाया था, जबकि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने पलटवार करते हुए राज्य प्रशासन पर कुप्रबंधन, वितरण विफलता और कालाबाजारी रोकने में नाकामी के गंभीर आरोप मढ़े थे। उस समय श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे नहरी व अत्यधिक उपजाऊ कृषि जिलों में किसानों के तीव्र आक्रोश और सड़कों पर धरने-प्रदर्शन दर्ज किए गए थे। राजस्थान में जब भी बुवाई का मौसम आता है, खाद की मांग और आपूर्ति का अंतर राजनीतिक बयानबाजी और आंदोलन का जरिया बनता रहा है।
छात्र राजनीति से लेकर जन आंदोलनों तक नरेश मीणा का सफर
किसानों के इस वर्तमान धरने की अगुवाई कर रहे नरेश मीणा इससे पहले भी सार्वजनिक जीवन में कई आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके हैं। पूर्वी राजस्थान के किसानों के सिंचाई संकट को लेकर उन्होंने पांचना बांध के पानी के बंटवारे और जल समझौते को लागू करवाने के लिए व्यापक जन आंदोलन किया था। अपने शुरुआती राजनीतिक दौर में वे राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र राजनीति में सक्रिय रहे, जहां वे नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) से जुड़े प्रमुख छात्र नेता और राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ (RUSU) के महासचिव पद पर निर्वाचित हुए थे। छात्रों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने 9 दिनों तक लगातार आमरण अनशन भी किया था। इसके अलावा जुलाई 2025 में उन्होंने क्षेत्रीय समस्याओं को शासन तक पहुंचाने के लिए लगभग 150 किलोमीटर लंबी 'जन क्रांति यात्रा' निकाली थी, जिसे बाद में झालावाड़ में हुए एक सरकारी स्कूल हादसे के बाद स्थगित कर वे पीड़ित परिजनों की मदद के लिए पहुंचे थे।
समरावता गांव का प्रशासनिक विवाद और उपचुनाव का टकराव
नरेश मीणा के हालिया आंदोलनों में सबसे चर्चित घटनाक्रम नवंबर 2024 के देवली-उनियारा विधानसभा उपचुनाव के दौरान सामने आया था। उस समय समरावता गांव के निवासियों ने अपने गांव को उनियारा उपखंड में शामिल करने की पुरानी मांग को लेकर मतदान का बहिष्कार करने का ऐलान किया था। नरेश मीणा ग्रामीणों के समर्थन में गांव पहुंचे और धरने पर बैठ गए। इसी गतिरोध के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों के साथ तनाव चरम पर पहुंच गया और ड्यूटी पर तैनात एसडीएम (SDM) को थप्पड़ मारने की हिंसक घटना सामने आई थी, जिसके बाद इलाके में भारी पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक बवाल हुआ था। अब उसी आक्रामक तेवर के साथ नरेश मीणा ने खाद और बिजली के सवालों पर राज्य सरकार के सामने नई चुनौती पेश की है।




















