राजस्थान के मारवाड़ अंचल में स्थित पाली जिले का श्री सोनाणा खेतलाजी धाम अपनी अनूठी धार्मिक रीतियों और स्थापत्य कला के लिए विख्यात है। अरावली की पहाड़ियों के बीच सारंगवास में स्थित यह तीर्थ स्थल प्राकृतिक छटा के साथ-साथ अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति से देशभर के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस पहाड़ी मंदिर की सबसे चौंकाने वाली बात इसका बाहरी ढांचा है, जिसे दूर से देखने पर यह पूरी तरह से एक विशालकाय सर्प के आकार में दिखाई पड़ता है। पहाड़ को इस तरह तराशा गया है कि उसमें सर्प की विशाल आंखें साफ नजर आती हैं, जो पहली ही नजर में आने वाले हर श्रद्धालु को विस्मित कर देती हैं।
800 वर्षों का प्राचीन इतिहास और लोक मान्यताएं
सारंगवास स्थित श्री सोनाणा खेतलाजी धाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग 800 वर्ष पुरानी मानी जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, खेतलाजी बावसी को देवाधिदेव भगवान शिव के पांचवें अवतार भगवान भैरव यानी क्षेत्रपाल के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन मान्यताओं के मुताबिक, अरावली पर्वतमाला की दुर्गम गुफाओं में जब ऋषि-मुनि साधना और तपस्या में लीन रहते थे, तब भगवान भैरव उनकी रक्षा किया करते थे। समय बीतने के साथ साधु-संतों की सुरक्षा से जुड़ा यही गुफा स्थल आम लोगों की अगाध आस्था का स्थायी केंद्र बन गया, जहां आज भी बड़ी संख्या में लोग शीश नवाने पहुंचते हैं।
नाग स्वरूप बनावट और शेषनाग मुद्रा में महाआरती
पहाड़ी चट्टान को कुशलता से तराशकर सांप की विशाल आकृति और जीवंत आंखों का स्वरूप देना इस धाम की सबसे प्रमुख पहचान है। मंदिर में सबसे अलौकिक क्षण सुबह और शाम की नियमित पूजा के दौरान देखने को मिलता है। आरती के समय मुख्य पुजारी शेषनाग का स्वरूप धारण करते हैं और एक विशिष्ट पारंपरिक मुद्रा में खड़े होकर महाआरती संपन्न करते हैं। इस आध्यात्मिक दृश्य की भव्यता को देखने और उस दिव्य पल का हिस्सा बनने के लिए प्रांगण में सैकड़ों भक्तों का तांता लगा रहता है।
काला भैरव, श्वान सवारी और अन्य देवी-देवता
क्षेत्रपाल के रक्षक और पहरेदार के रूप में मंदिर प्रांगण में भगवान काला भैरव की दो विशालकाय प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इन प्रतिमाओं के साथ उनके वफादार वाहन के रूप में श्वान भी विराजमान हैं, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का बड़ा केंद्र हैं। इसके अलावा, इस पावन परिसर में भक्तों को प्रभु श्री हनुमान जी और शनिदेव महाराज के दर्शन भी एक ही जगह प्राप्त होते हैं, जिससे यहां आने वाले लोगों को विभिन्न देवी-देवताओं का सामूहिक आशीर्वाद मिलता है।
मुंडन संस्कार और बावड़ी चढ़ाने का ऐतिहासिक रिवाज
मारवाड़ के इस प्रसिद्ध धाम में मन्नत मांगने और मनोकामनाएं पूरी होने पर आभार व्यक्त करने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। श्रद्धालु अपने नवजात शिशुओं के सुखी जीवन, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के साथ उनका पहला बाल उतरवाने यानी मुंडन संस्कार (झड़ूला) कराने यहां नंगे पांव चलकर पहुंचते हैं। इसके अलावा परिवार में शुभ विवाह संपन्न होने या कोई विशेष मन्नत पूरी होने पर भक्त ‘बावड़ी चढ़ाने’ की रस्म निभाते हैं, जिसके तहत खेतलाजी बावसी को विशिष्ट पोशाक अथवा आंगी श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाती है।
परिसर के भीतर ही चूरमा प्रसाद ग्रहण करने की पाबंदी
श्री सोनाणा खेतलाजी मंदिर से जुड़ा एक बेहद कड़ा और अनोखा धार्मिक नियम यहां मिलने वाले भोग से संबंधित है। मंदिर में चढ़ाया जाने वाला पारंपरिक चूरमा-प्रसाद किसी भी परिस्थिति में धाम के मुख्य परिसर से बाहर ले जाना पूरी तरह वर्जित माना गया है। जो भी श्रद्धालु यहां भोग लगाते हैं, उन्हें वह चूरमा-प्रसाद मंदिर की परिधि के भीतर ही ग्रहण करना अनिवार्य होता है। सदियों से चली आ रही इस सख्त परंपरा का पालन आज भी हर आने वाला भक्त पूरी निष्ठा के साथ करता है।



















