राजस्थान के मालवा और मेवाड़ सीमावर्ती इलाकों में अफीम की खेती से जुड़े हजारों ग्रामीण परिवारों की निगाहें अफीम नीति 2026-27 पर टिकी हुई हैं। इस आगामी नीति के तहत राज्य के भीतर 4,261 अतिरिक्त किसानों को अफीम की वैध खेती के लिए नए सरकारी परमिट मिलने की प्रबल संभावना सामने आई है। यदि यह अनुमान पूरी तरह लागू होता है, तो केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की राजस्थान यूनिट के दायरे में पंजीकृत वैध अफीम काश्तकारों का कुल आंकड़ा बढ़कर 53,403 तक पहुंच जाएगा। पिछले फसल वर्ष के दौरान यह आंकड़ा 49,142 किसानों का था। अफीम केवल एक सामान्य नकदी फसल नहीं है, बल्कि इस पूरे इलाके के पारिवारिक अर्थतंत्र, कठोर कानूनी नियमों और गहरी लोक आस्था का केंद्र रही है।
लाइसेंस पात्रता और खेती के कठोर नियम
अफीम की खेती को लेकर किसानों में यह स्पष्ट समझ होना जरूरी है कि केवल पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक होना या अतीत में कभी खेती करना लाइसेंस की गारंटी नहीं बनता है। केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के आधिकारिक रिकॉर्ड और केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले कड़े नियमों के आधार पर ही प्रत्येक आवेदक की अंतिम पात्रता तय की जाती है। केंद्र सरकार की नीति में दो अलग-अलग खेती प्रणालियों को शामिल किया गया है, जिनमें पहली पारंपरिक गम अफीम यानी चीरा लगाने वाली पद्धति है और दूसरी बिना चीरा लगाए पॉपी स्ट्रॉ एकत्र करने वाली यूपीएस पद्धति है। दोनों ही पद्धतियों के लिए खेत के रकबे और उत्पादन की न्यूनतम सीमाएं अलग-अलग तय की गई हैं।
रकबे और न्यूनतम उपज के आधिकारिक मानक
सरकारी नीति के तहत निर्धारित तकनीकी मानकों के मुताबिक, गम अफीम यानी चीरा पद्धति के तहत खेती करने वाले काश्तकारों के लिए न्यूनतम कृषि क्षेत्रफल 0.10 हेक्टेयर निर्धारित है। वहीं दूसरी ओर, बिना चीरा लगाए पॉपी स्ट्रॉ यानी यूपीएस पद्धति के जरिए खेती करने वाले किसानों के लिए यह न्यूनतम क्षेत्रफल 0.05 हेक्टेयर तय किया गया है। केवल खेत का आकार ही नहीं, बल्कि लाइसेंस बरकरार रखने और नया आवंटन पाने के लिए उपज का स्तर भी निर्णायक भूमिका निभाता है।
फसल वर्ष 2026-27 के लिए तय किए गए उपज मानकों के अनुसार, चीरा पद्धति अपनाने वाले किसानों के पास पिछले फसल वर्ष 2025-26 के दौरान प्रति हेक्टेयर कम से कम 4.4 किलोग्राम मॉर्फिन की औसत उपज का रिकॉर्ड होना अनिवार्य है। इसके विपरीत, यूपीएस पद्धति के तहत काश्त करने वाले किसानों के लिए न्यूनतम 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पॉपी स्ट्रॉ की उपज का मानक तय किया गया है। जो किसान इन पैमानों पर खरे उतरते हैं, केवल उनके रिकॉर्ड की समीक्षा करके ही नारकोटिक्स विभाग अंतिम आवंटन सूची तैयार करता है।
चित्तौड़गढ़ के सांवरिया सेठ मंदिर से अनूठा नाता
राजस्थान के मेवाड़ और मध्य प्रदेश से सटे मालवा क्षेत्र में अफीम की खेती का नाता सिर्फ सरकारी दफ्तरों, पटवारी के रिकॉर्ड और नारकोटिक्स महकमे की नाप-जोख तक ही सीमित नहीं है। इसका एक बेहद अनूठा और गहरा पहलू चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया कस्बे में स्थित प्रसिद्ध श्री सांवरिया सेठ मंदिर से जुड़ा हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप सांवरिया सेठ के प्रति पूरे अफीम उत्पादक क्षेत्र के किसानों में अटूट श्रद्धा है। यहां के किसान अपनी फसलों की सुरक्षा, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव और बंपर पैदावार के लिए मंदिर में विशेष मन्नत मांगते हैं। जब फसल सफलतापूर्वक कट जाती है और सरकारी तौल में अच्छा मुनाफा मिलता है, तो किसान आभार जताने के लिए दरबार में पहुंचते हैं।
कई किसान अपनी मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में अफीम या चांदी से बने अफीम के पौधे और डोडे की विशेष प्रतिकृतियां भेंट स्वरूप चढ़ाते हैं। अफीम की फसल संवेदनशील होती है, जिसमें मौसम की मार या बीमारी लगने पर पूरा परिवार कर्ज के संकट में आ सकता है। इसलिए किसान भगवान को अपनी खेती में साझीदार मानकर इस अनूठी परंपरा को पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।
मन्नत और लाइसेंस बहाली के चर्चित वाकये
सांवरिया सेठ के दरबार में मन्नत पूरी होने के कई दिलचस्प मामले सामने आते रहे हैं। फरवरी 2026 में एक काश्तकार परिवार ने लगभग 28 साल पुरानी मन्नत पूरी होने पर भगवान सांवरिया सेठ को चांदी के बने अफीम के डोडे अर्पित किए थे। इस परिवार के दो अफीम लाइसेंस 1995-96 में सरकारी नियमों के तहत निरस्त हो गए थे। परिवार ने लाइसेंस की बहाली के लिए सांवरिया सेठ के मंदिर में अर्जी लगाई थी। वर्ष 2025 में जब 28 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद दोनों लाइसेंस दोबारा बहाल हुए, तो पूरे परिवार ने मंदिर पहुंचकर अपनी मन्नत पूरी की और चांदी के डोडे चढ़ाए।
मंदिर में वास्तविक अफीम चढ़ाए जाने का मामला भी कानूनी रूप से सुर्खियों में आ चुका है। फरवरी 2025 में मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा कई वर्षों से चढ़ावे के तौर पर अर्पित की गई अफीम का बड़ा जत्था सामने आया था। केंद्रीय नारकोटिक्स विभाग की टीमों ने जांच पड़ताल के बाद मंदिर भंडार में एकत्र 58 किलोग्राम से अधिक अफीम को अपने आधिकारिक नियंत्रण में लेकर जब्त किया था। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस अधिनियम के तहत बिना अनुमति अफीम रखना गैरकानूनी है, इसलिए विभाग ने उस भंडार को सुरक्षित किया था।
मंदिर के दानपात्र में रिकॉर्ड तोड़ चढ़ावा
मंडफिया का सांवरिया सेठ मंदिर अपनी आर्थिक संपन्नता और श्रद्धालुओं के विशाल दान के लिए भी पूरे देश में जाना जाता है। मंदिर के मासिक भंडार की जब भी गणना होती है, उसमें करोड़ों रुपये की नकदी, सोना और चांदी निकलती है। उदाहरण के लिए, जून 2026 में मासिक भंडार की आधिकारिक गिनती के दौरान 40 करोड़ 81 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध नकद राशि प्राप्त हुई थी, जिसके साथ भारी मात्रा में सोने और चांदी के आभूषण भी मिले थे। इससे पहले अप्रैल 2026 में भी जब दानपात्र खोले गए थे, तब 41 करोड़ 67 लाख रुपये से अधिक की नकद राशि सामने आई थी।
यद्यपि इस विशाल दान में अफीम उत्पादक किसानों का व्यक्तिगत या सामूहिक हिस्सा अलग से कितना है, इसका कोई पृथक आधिकारिक रिकॉर्ड मंदिर ट्रस्ट के पास मौजूद नहीं है। फिर भी, अफीम बेल्ट की संपन्नता, कृषि आमदनी और मंदिर के चढ़ावे का सीधा मेल राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक विशिष्ट तस्वीर पेश करता है। अफीम नीति 2026-27 के आने से जहां हजारों नए परिवारों के घरों में आर्थिक खुशहाली की उम्मीद जगी है, वहीं मंडफिया के दरबार में आस्था और मन्नतों का सिलसिला भी तेज हो गया है।





















