जमशेदपुर में हाल ही में आए चक्रवाती तूफान के असर से मौसम का मिजाज बदल गया है, जिससे त्योहार की तैयारियों में जुटे स्थानीय मिट्टी के कारीगर गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। दीपावली के मौके पर मिट्टी के दीये, पारंपरिक खिलौने और कलात्मक सजावटी वस्तुएं तैयार करने वाले परिवारों के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। वायुमंडल में बढ़ी नमी और तेज धूप न निकलने के कारण तैयार किए गए सामान की नमी सूख नहीं पा रही है। यदि समय रहते ये उत्पाद पूरी तरह सूखकर पकने लायक नहीं बने, तो दीपोत्सव के बाजार में इनकी आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
मौसम के उतार-चढ़ाव से बढ़ रही दोहरी मेहनत
मौसम के इस अनिश्चित रवैये के चलते कारीगरों को दिन भर भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। स्थानीय कुम्हार मीरा देवी ने बताया कि जब थोड़ी देर के लिए धूप निकलती है, तो गीले दीयों और खिलौनों को सुखाने के लिए आंगन या खुले मैदान में रखना पड़ता है। जैसे ही बादल घिरते हैं या मौसम ठंडा होता है, सारे सामान को आनन-फानन में दोबारा घर के अंदर सुरक्षित समेटना पड़ता है। दिन भर में कई बार सामान को अंदर-बाहर करने की इस प्रक्रिया से न केवल उनका शारीरिक श्रम बढ़ गया है, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में भी भारी देरी हो रही है।
त्योहारी मांग से ठीक पहले तैयारी में पिछड़ा काम
सामान्य परिस्थितियों में दीपावली से ठीक पहले के इन दिनों में कुम्हारों का अधिकांश माल पूरी तरह सूखकर भट्ठियों में पकने के लिए तैयार हो जाता है। मीरा देवी के मुताबिक, इस साल अभी भी सैकड़ों दीये और मूर्तियां पूरी तरह सूख नहीं पाए हैं। त्योहार के इतने करीब आ जाने के बावजूद माल अधूरा पड़ा रहने से कारीगरों को अपने सालाना व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ने की भारी चिंता सता रही है। अगर धूप खिलने में और देर हुई, तो उनकी महीनों की मेहनत और पूंजी अटक सकती है।
त्योहारी खरीदारी में कारीगरों के समर्थन का आग्रह
प्रकृति की इस मार के बीच कुम्हार परिवारों ने आम जनता से विशेष भावनात्मक और आर्थिक सहयोग का आग्रह किया है। उनका कहना है कि मिट्टी से बनने वाले प्रत्येक दीये और खिलौने के पीछे न केवल उनका कड़ा परिश्रम जुड़ा होता है, बल्कि पूरे परिवार की साल भर की आजीविका भी टिकी होती है। कारीगरों ने अपील की है कि उपभोक्ता इस बार स्थानीय स्तर पर निर्मित मिट्टी के उत्पादों को प्राथमिकता दें और त्योहार की रौनक बढ़ाने के लिए स्वदेशी कला को अपनाएं।
मेहनत का सम्मान और मोलभाव से बचने की पुकार
स्थानीय कारीगरों को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए वोकल फॉर लोकल के विचार को वास्तविक धरातल पर उतारने की जरूरत है। बाजार में खरीदारी करते वक्त लोगों को इन छोटे विक्रेताओं से मोलभाव करने से बचना चाहिए। यदि खरीदार बिना अनुचित मोलतोल के दीये और सजावटी उत्पाद खरीदते हैं, तो इससे विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे कुम्हार परिवारों को अपनी लागत और मेहनत का पूरा मेहनताना मिल सकेगा और उनके घरों में भी पर्व की खुशियां पहुंच सकेंगी।


















