राजस्थान के सियासी परिदृश्य में निर्दलीय और बगावती तेवर वाले युवा चेहरों की बढ़ती एकजुटता ने प्रमुख राजनीतिक दलों की पेशानी पर बल ला दिए हैं। किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर बारां में अनशन पर डटे युवा नेता नरेश मीणा के समर्थन में अब पश्चिमी राजस्थान के शिव विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रविन्द्र सिंह भाटी भी खुलकर सामने आ गए हैं। रविवार को रविन्द्र सिंह भाटी ने स्वयं बारां पहुंचकर नरेश मीणा को अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका अनशन समाप्त करवाया। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद राज्य के राजनीतिक हलकों में एक नए राजनीतिक गठजोड़ और संभावित तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अनशन तुड़वाने के सियासी मायने
बारां में आयोजित इस अनशन स्थल पर दोनों युवा नेताओं का मंच साझा करना केवल एक औपचारिक समर्थन तक सीमित नजर नहीं आ रहा है। यद्यपि अनशन समाप्त कराने के दौरान मंच से किसी औपचारिक तीसरे मोर्चे की घोषणा नहीं की गई, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे दोनों नेताओं के जनाधार के विलय और आपसी समन्वय के रूप में देख रहे हैं। नरेश मीणा लगातार किसानों और युवाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ने का दावा करते हुए अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। दूसरी तरफ रविन्द्र सिंह भाटी सामान्य वर्ग के लिए लागू ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण के नियमों के सरलीकरण की मांग को लेकर प्रदेश स्तर पर सक्रिय आंदोलन चला रहे हैं। दोनों नेताओं का यह मिलन पारंपरिक राजनीतिक ढांचों के खिलाफ एक साझा असंतोष का प्रतिबिंब माना जा रहा है।
समरावता थप्पड़ कांड से झालावाड़ आंदोलन तक का सफर
नरेश मीणा का हालिया राजनीतिक उभार बेहद नाटकीय और आक्रामक रहा है। टोंक जिले की उनियारा विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान समरावता गांव में प्रशासनिक व्यवस्थाओं के विरोध में उपखंड अधिकारी (एसडीएम) को थप्पड़ मारने की घटना ने उन्हें रातोंरात पूरे राज्य की सुर्खियों में ला दिया था। इस घटना के बाद उपजे भारी बवाल, पुलिस कार्रवाई और जेल यात्रा ने उन्हें एक आक्रामक और जुझारू चेहरे के रूप में स्थापित किया। जेल में रहने के दौरान जब उन्हें जमानत नहीं मिल रही थी, तब विभिन्न जातीय पंचायतों और स्थानीय समर्थकों का समर्थन मिलने से उनका प्रभाव क्षेत्र और विस्तृत हुआ। आठ महीने बाद जेल से रिहा होते ही वे सीधे समरावता पहुंचे और उसके बाद झालावाड़ में किसानों की समस्याओं पर बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
राजेन्द्र सिंह गुढ़ा का पहले से मिल रहा समर्थन
रविन्द्र सिंह भाटी के साथ आने से पहले शेखावाटी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री राजेन्द्र सिंह गुढ़ा भी नरेश मीणा के आंदोलन को मजबूती दे चुके हैं। बीते 2 अक्टूबर को जब नरेश मीणा ने अपने व्यापक किसान आंदोलन की शुरुआत की थी, तब राजेन्द्र सिंह गुढ़ा व्यक्तिगत रूप से उस मंच पर पहुंचे थे। गुढ़ा पूर्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर और निर्दलीय विधायक के रूप में जीत दर्ज कर चुके हैं। तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार में दो बार मंत्री पद संभालने वाले गुढ़ा बाद में सरकार से मतभेद होने पर बगावती रुख अपना बैठे थे। पूर्ववर्ती सरकार के खिलाफ चर्चित लाल डायरी के खुलासे करने के बाद उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था। गुढ़ा का साथ मिलना इस बात का प्रमाण था कि सत्ता विरोधी तेवर रखने वाले नेता नरेश मीणा के इर्द-गिर्द एकजुट होने लगे हैं।
बाड़मेर से जयपुर तक रविन्द्र सिंह भाटी का प्रभाव
विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की मजबूत लहर के बावजूद बाड़मेर की शिव सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर रविन्द्र सिंह भाटी ने सबको चौंका दिया था। दो सौ सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में वे सबसे कम उम्र के एकमात्र युवा जनप्रतिनिधि हैं। पश्चिमी राजस्थान में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े 'ओरण बचाओ आंदोलन' के जरिए उन्होंने युवाओं की विशाल फौज तैयार की। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2024 में बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरकर उन्होंने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद कड़ा बना दिया था। इस चुनाव में बीजेपी के प्रत्याशी एवं पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री कैलाश चौधरी को तीसरे स्थान पर धकेलने में भाटी सफल रहे थे। भले ही वे संसदीय चुनाव जीतने से चूक गए हों, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी विशाल पहुंच और जनसभाओं में उमड़ने वाली भीड़ ने राज्य के स्थापित राजनीतिक दलों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया था।
क्या राजस्थान में टिक पाएगा कोई तीसरा मोर्चा?
राजस्थान का राजनीतिक इतिहास मुख्य रूप से दो प्रमुख दलों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। राज्य में पहले भी तीसरे मोर्चे के गठन के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन कोई भी गठबंधन लंबी अवधि तक टिक नहीं पाया। हालांकि इस बार का परिदृश्य थोड़ा भिन्न दिखाई दे रहा है क्योंकि इस संभावित गठजोड़ का नेतृत्व स्थापित वरिष्ठ नेताओं के बजाय ऐसे युवा कर रहे हैं जो सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ रखते हैं और सड़कों पर सीधे संघर्ष में यकीन रखते हैं। इसके अतिरिक्त दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचल में भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) का तेजी से बढ़ता जनाधार भी इस बात का संकेत है कि पारंपरिक दलों से इतर युवा नेतृत्व वाले नए विकल्प उभर रहे हैं। ऐसे में नरेश मीणा, रविन्द्र सिंह भाटी और राजेन्द्र सिंह गुढ़ा की यह तिकड़ी राज्य की भावी राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


















