राजस्थान की सांस्कृतिक नगरी जोधपुर में जन्माष्टमी का पर्व इस बार एक नए अंदाज में मनाया जा रहा है। शहर के परिवारों के बीच नन्हे बच्चों को भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप में सजाकर तस्वीरें खिंचवाने की एक नई लहर देखने को मिल रही है। इस अभिनव पहल को अमलीजामा पहनाया है लवली फोटो स्टूडियो की संचालक संगीता परिहार और उनकी बहू हिमाक्षी परिहार ने। इस सास-बहू की जोड़ी ने अपनी कलात्मक सोच से एक ऐसा हैंडमेड स्टूडियो सेटअप तैयार किया है, जिसने शहर भर के माता-पिता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। महज 15 दिनों के भीतर 50 से अधिक बच्चों की मनमोहक तस्वीरें इस खास परिवेश में उतारी जा चुकी हैं।
पारंपरिक कला और ग्रामीण माहौल का अनोखा ताना-बाना
इस विशेष फोटोशूट की सबसे बड़ी खूबी इसका पूरी तरह से हस्तनिर्मित होना है। आमतौर पर भव्य और विस्तृत थीम बेस्ड फोटोशूट बड़े मेट्रो शहरों तक ही सीमित रहते थे, लेकिन जोधपुर में इस जोड़ी ने इसे बेहद संजीदगी से साकार किया है। इस सेटअप में भारतीय ग्रामीण जीवन और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है। स्टूडियो के भीतर हाथ से रंगे मिट्टी के रंग-बिरंगे मटके, कृत्रिम गायें, मोर, हिरण और छोटी बांसुरियां सजाई गई हैं। इसके साथ ही एक नन्हा झूला और पुराने जमाने का पारंपरिक लकड़ी का पलंग भी रखा गया है, जो पूरे माहौल को एक प्राचीन और जीवंत रूप प्रदान करता है।
बाल कान्हा और यशोदा मैया के वात्सल्य का जीवंत रूप
फोटोशूट के दौरान छोटे-छोटे बच्चों को पीतांबरी वस्त्र पहनाए जाते हैं। सिर पर मोर मुकुट, हाथों में बांसुरी और चेहरे पर नटखट मुस्कान लिए ये नन्हे कान्हा माखन चुराने के भाव में तस्वीरें खिंचवाते हैं। लेकिन इस पूरे कॉन्सेप्ट का सबसे भावुक और आकर्षक हिस्सा यशोदा मैया और बाल कृष्ण के रिश्ते को दर्शाना है। इस थीम में बच्चों की माताओं को भी पारंपरिक राजस्थानी पोशाक में सजाया जाता है। मां और बच्चे के इस पावन रिश्ते को कई तरह के दृश्यों में कैमरे के जरिए कैद किया जाता है, जहाँ कहीं माता अपने बालक को माखन खिला रही हैं तो कहीं दोनों झूले के पास बैठकर दुलार कर रहे हैं।
संस्कृति को सहेजने और नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास
संगीता परिहार और हिमाक्षी परिहार का कहना है कि इस सेटअप को तैयार करने के पीछे उनका मकसद केवल व्यावसायिक तस्वीरें खींचना भर नहीं है। वे चाहती हैं कि इस तरह की पहलों के माध्यम से आज की नई पीढ़ी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं को करीब से समझे और उनसे जुड़ी रहे। आधुनिक फोटोग्राफी के इस दौर में अपनी जड़ों से जुड़े रहना और उसे एक सुंदर याद के रूप में जीवन भर के लिए सहेज कर रखना हर परिवार के लिए गर्व की बात है। इस पहल की बदौलत जोधपुर के अनेक परिवारों को अपने बच्चों के बचपन के इन अनमोल पलों को हमेशा के लिए खूबसूरत फ्रेम में सुरक्षित करने का अवसर मिल रहा है।
सोशल मीडिया पर खूब पसंद की जा रही हैं तस्वीरें
इस थीम फोटोशूट की लोकप्रिय तस्वीरों को जब माता-पिता अपने रिश्तेदारों और सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, तो उन्हें खूब सराहना मिलती है। मटकी से माखन चुराते और नटखट अंदाज़ में मुस्कुराते बच्चों की मासूमियत देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। महज दो हफ्तों में 50 से ज्यादा फोटोशूट पूरे कर लेना यह साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर इस सांस्कृतिक पहल को कितना जबरदस्त समर्थन मिला है। यह अभिनव प्रयास न केवल पारंपरिक मूल्यों को संजो रहा है, बल्कि छोटे शहरों में रचनात्मक फोटोग्राफी की असीम संभावनाओं को भी दर्शा रहा है।


















